श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 985, कुल 1299 में से
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १५ ]
प्रतिबिम्ब पड़ता है, उसका वैसा ही चित्र अंकित हो जाता है। इसी प्रकार मृत्युके समय अन्तःकरणमें जिस भावका चिन्तन होता है, उसी आकारका सूक्ष्मशरीर बन जाता है। जैसे कैमरेपर पड़े प्रतिबिम्बके अनुसार चित्रके तैयार होनेमें समय लगता है, ऐसे ही अन्तकालीन चिन्तनके अनुसार भावी स्थूलशरीरके बननेमें (शरीरके अनुसार कम या अधिक) समय लगता है।
आठवें श्लोकमें जिसका ‘यदवाप्नोति ’ पदसे वर्णन हुआ है, उसीको यहाँ ‘स्थितम् ’ पदसे कहा गया है।
‘अपि भुञ्जानं वा ’—मनुष्य जब विषयोंको भोगता है, तब अपनेको बड़ा सावधान मानता है और विषय-सेवनमें सावधान रहता भी है। विषयी मनुष्य शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध—इनमेंसे एक-एक विषयको अच्छी तरह जानता है। अपनी जानकारीसे एक-एक विषयको भी बड़ी स्पष्टतासे वर्णन करता है। इतनी सावधानी रखनेपर भी वह ‘मृदु’ (अज्ञानी) ही है; क्योंकि विषयोंके प्रति यह सावधानी किसी कामकी नहीं है, प्रत्युत मरनेपर नरकों और नीच योनियोंमें ले जानेवाली है।
परमात्मा, जीवात्मा और संसार—इन तीनोंके विषयमें शास्त्रों और दार्शनिकोंके अनेक मतभेद हैं; परन्तु जीवात्मा संसारके सम्बन्धसे महान् दुःख पाता है और परमात्माके सम्बन्धसे महान् सुख पाता है—इसमें सभी शास्त्र और दार्शनिक एकमत हैं।
संसार एक क्षण भी स्थिर नहीं रहता—यह अकाट्य नियम है। संसार क्षणभंगुर है—यह बात कहते, सुनते और पढ़ते हुए भी मृदु मनुष्य संसारको स्थिर मानते हैं। भोग-सामग्री, भोक्ता और भोगरूप क्रिया—इन सबको स्थायी माने बिना भोग हो ही नहीं सकता। भोगी मनुष्यकी बुद्धि इतनी मृदु हो जाती है कि वह ‘इन भोगोंसे बढ़कर कुछ है ही नहीं’—ऐसा दृढ़ निश्चय कर लेता है (गीता—सोलहवें अध्यायका ग्यारहवाँ श्लोक)। इसलिये ऐसे मनुष्योंके ज्ञाननेत्र बंद ही रहते हैं। वे मौतको निश्चित जानते हुए भी भोग भोगनेके लिये (मरनेवालोंके लोकमें रहते हुए भी) सदा जीते रहनेकी इच्छा रखते हैं।
‘अपि ’ पदका भाव है कि जीवात्मा जिस समय स्थूल-शरीरसे निकलकर (सूक्ष्म और कारणशरीरसहित) जाता है, दूसरे शरीरको प्राप्त होता है तथा विषयोंका उपभोग करता है—इन तीनों ही अवस्थाओंमें गुणोंसे लिप्त दीखनेपर भी वास्तवमें वह स्वयं निलिप्त ही रहता है। वास्तविक स्वरूपमें न ‘उत्क्रमण’ है, न ‘स्थिति’ है और
न ‘भोक्तापन’ ही है।
पिछले श्लोकके ‘विषयानुपसेवते ’ पदको ही यहाँ ‘भुञ्जानम् ’ पदसे कहा गया है।
‘गुणान्वितम् ’—यहाँ ‘गुणान्वितम् ’ पदका तात्पर्य यह है कि गुणोंसे सम्बन्ध मानते रहनेके कारण ही जीवात्मामें उत्क्रमण, स्थिति और भोग—ये तीनों क्रियाएँ प्रतीत होती हैं।
वास्तवमें आत्माका गुणोंसे सम्बन्ध है ही नहीं। भूलसे ही इसने अपना सम्बन्ध गुणोंसे मान रखा है, जिसके कारण इसे बारम्बार ऊँच-नीच योनियोंमें जाना पड़ता है। गुणोंसे सम्बन्ध जोड़कर जीवात्मा संसारसे सुख चाहता है—यह उसकी भूल है। सुख लेनेके लिये शरीर भी अपना नहीं है, फिर अन्यकी तो बात ही क्या है!
मनुष्य मानो किसी-न-किसी प्रकारसे संसारमें ही फँसना चाहता है! व्याख्यान देनेवाला व्यक्ति श्रोताओंको अपना मानने लग जाता है। किसीका भाई-बहन न हो, तो वह धर्मका भाई-बहन बना लेता है। किसीका पुत्र न हो, तो वह दूसरेका बालक गोद ले लेता है। इस तरह नये-नये सम्बन्ध जोड़कर मनुष्य चाहता तो सुख है, पर पाता दुःख ही है। इसी बातको भगवान् कह रहे हैं कि जीव स्वरूपसे गुणातीत होते हुए भी गुणों—(देश, काल, व्यक्ति, वस्तु—) से सम्बन्ध जोड़कर उनसे बँध जाता है।
इसी अध्यायके सातवें श्लोकमें आये ‘प्रकृतिस्थानि ’ पदको ही यहाँ ‘गुणान्वितम् ’ पदसे कहा गया है।
मामिक बात
जबतक मनुष्यका प्रकृति अथवा उसके कार्य—गुणोंसे किंचिन्मात्र भी सम्बन्ध रहता है, तबतक गुणोंके अधीन होकर उसे कर्म करनेके लिये बाध्य होना पड़ता है (गीता—तीसरे अध्यायका पाँचवाँ श्लोक)। चेतन होकर गुणोंके अधीन रहना अर्थात् जड़की परतन्त्रता स्वीकार करना व्यभिचार-दोष है। प्रकृति अथवा गुणोंसे सर्वथा मुक्त होनेपर जो स्वाधीनताका अनुभव होता है, उसमें भी साधक जबतक (अहम्की गन्ध रहनेके कारण) रस लेता है, तबतक व्यभिचार-दोष रहता ही है। रस न लेनेसे जब वह व्यभिचार-दोष मिट जाता है, तब अपने प्रेमास्पद भगवान्के प्रति स्वतः प्रियता जाग्रत् होती है। फिर प्रेम-ही-प्रेम रह जाता है, जो उत्तरोत्तर वृद्धिको प्राप्त होता रहता है। इस प्रेमको प्राप्त करना ही जीवका अन्तिम लक्ष्य है। इस प्रेमकी प्राप्तिमें ही पूर्णता है। भगवान् भी भक्तको अपना अलौकिक प्रेम देकर ही राजी होते हैं और ऐसे प्रेमी