श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 979, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ें९७८
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १५ ]
शरीरं यदवाप्नोति यच्छाष्युत्क्रामतीश्वरः ।
गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धान्वाशयात् ॥ ८ ॥
जैसे—
| वायुः | = वायु | अपि | = भी | गृहीत्वा | = ग्रहण करके |
|---|---|---|---|---|---|
| आशयात् | = गन्धके स्थानसे | यत् | = जिस | च | = फिर |
| गन्धान् | = गन्धको (ग्रहण करके | ||||
| ले जाती है), | शरीरम् | = शरीरको | यत् | = जिस (शरीर)-को | |
| इव | = ऐसे ही | उत्क्रामति | = छोड़ता है, | ||
| (वहाँसे) | अवाप्नोति | = प्राप्त होता है | |||
| (उसमें) | |||||
| ईश्वरः | = शरीरादिका स्वामी | ||||
| बना हुआ जीवात्मा | एतानि | = इन (मनसहित | |||
| इन्द्रियों)-को | संयाति | = चला | |||
| जाता है। |
व्याख्या —‘वायुर्गन्धान्वाशयात्’—जिस प्रकार वायु इत्रके फोहेसे गन्ध ले जाती है; किन्तु वह गन्ध स्थायीरूपसे वायुमें नहीं रहती; क्योंकि वायु और गन्धका सम्बन्ध नित्य नहीं है, इसी प्रकार इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, स्वभाव आदि—(सूक्ष्म और कारण—दोनों शरीरों—) को अपना माननेके कारण जीवात्मा उनको साथ लेकर दूसरी योनियें जाता है।
जैसे वायु तत्त्वतः गन्धसे निर्लिप्त है, ऐसे ही जीवात्मा भी तत्त्वतः मन, इन्द्रियाँ, शरीरादिसे निर्लिप्त है; परन्तु इन मन, इन्द्रियाँ, शरीरादिमें मैं-मेरेपनकी मान्यता होनेके कारण वह (जीवात्मा) इनका आकर्षण करता है।
जैसे वायु आकाशका कार्य होते हुए भी पृथ्वीके अंश गन्धको साथ लिये घूमती है, ऐसे ही जीवात्मा परमात्माका सनातन अंश होते हुए भी प्रकृतिके कार्य (प्रतिक्षण बदलनेवाले) शरीरोंको साथ लिये भिन्न-भिन्न योनियोंमें घूमता है। जड़ होनेके कारण वायुमें यह विवेक नहीं है कि वह गन्धको ग्रहण न करे; परन्तु जीवात्माको तो यह विवेक और सामर्थ्य मिला हुआ है कि वह जब चाहे, तब शरीरसे सम्बन्ध मिटा सकता है। भगवान्ने मनुष्यमात्रको यह स्वतन्त्रता दे रखी है कि वह चाहे जिससे सम्बन्ध जोड़ सकता है और चाहे जिससे सम्बन्ध तोड़ सकता है। अपनी भूल मिटानेके लिये केवल अपनी मान्यता बदलनेकी आवश्यकता है कि प्रकृतिके अंश इन स्थूल, सूक्ष्म और कारण-शरीरोंसे मेरा (जीवात्माका) कोई सम्बन्ध नहीं है।
फिर जन्म-मरणके बन्धनसे सहज ही मुक्ति है।
भगवान्ने यहाँ तीन शब्द दृष्टान्तके रूपमें दिये हैं—(१) वायु, (२) गन्ध और (३) आशय। ‘आशय’ कहते हैं स्थानको; जैसे—जलाशय (जल+आशय) अर्थात् जलका
स्थान। यहाँ आशय नाम स्थूलशरीरका है। जिस प्रकार गन्धके स्थान (आशय) इत्रके फोहेसे वायु गन्ध ले जाती है और फोहा पीछे पड़ा रहता है, इसी प्रकार वायुरूप जीवात्मा गन्धरूप सूक्ष्म और कारण-शरीरोंको साथ लेकर जाता है, तब गन्धका आशय-रूप स्थूलशरीर पीछे रह जाता है।
‘शरीरं यदवाप्नोति’...‘गृहीत्वैतानि संयाति’— यहाँ ‘ईश्वरः’ पद जीवात्माका वाचक है। इस जीवात्मासे तीन खास भूलें हो रही हैं—
(१) अपनेको मन, बुद्धि, शरीरादि जड़ पदार्थोंका स्वामी मानता है, पर वास्तवमें बन जाता है स्वयं उनका दास।
(२) अपनेको उन जड़ पदार्थोंका स्वामी मान लेनेके कारण अपने वास्तविक स्वामी परमात्माको भूल जाता है।
(३) जड़ पदार्थोंसे माने हुए सम्बन्धका त्याग करनेमें स्वाधीन होनेपर भी उनका त्याग नहीं करता।
परमात्माने जीवात्माको शरीरादि सामग्रीका सदुपयोग करनेकी स्वाधीनता दी है। उनका सदुपयोग करके अपना उद्धार करनेके लिये वे वस्तुएँ दी हैं, उनका स्वामी बननेके लिये नहीं। परन्तु जीवसे यह बहुत बड़ी भूल होती है कि वह उस सामग्रीका सदुपयोग नहीं करता; प्रत्युत अपनेको उनका मालिक मान लेता है, पर वास्तवमें उनका गुलाम बन जाता है।
जीवात्मा जड़ पदार्थोंसे माने हुए सम्बन्धका त्याग तभी कर सकता है, जब उसे यह मालूम हो जाय कि इनका मालिक बननेसे मैं सर्वथा पराधीन हो गया हूँ और मेरा पतन हो गया है। यह जिनका मालिक बनता है, उनकी गुलामी इसमें आ ही जाती है। इसे केवल वहम होता है कि मैं इनका मालिक हूँ। जड़ पदार्थोंका मालिक बन