श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 980, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्लोक ८ ]
- साधक-संजीवनी *
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जानेसे एक तो इसे उन पदार्थोंकी 'कमी' का अनुभव होता है और दूसरा यह अपनेको 'अनाथ' मान लेता है।
जिसे मालिकपना या अधिकार प्यारा लगता है, वह परमात्माको प्राप्त नहीं कर सकता; क्योंकि जो किसी व्यक्ति, वस्तु, पद आदिका स्वामी बनता है, वह अपने स्वामीको भूल जाता है—यह नियम है। उदाहरणार्थ, जिस समय बालक केवल माँको अपना मानकर उसे ही चाहता है, उस समय वह माँके बिना रह ही नहीं सकता। किन्तु वही बालक जब बड़ा होकर गृहस्थ बन जाता है और अपनेको स्त्री, पुत्र आदिका स्वामी मानने लगता है, तब उसी माँका पास रहना उसे सुहाता नहीं। यह स्वामी बननेका ही परिणाम है! इसी प्रकार यह जीवात्मा भी शरीरादि जड़ पदार्थोंका स्वामी (ईश्वर) बनकर अपने वास्तविक स्वामी परमात्माको भूल जाता है—उन्से विमुख हो जाता है। जबतक यह भूल या विमुखता रहेगी, तबतक जीवात्मा दुःख पाता ही रहेगा।
'ईश्वरः' पदके साथ 'अपि' पद एक विशेष अर्थ रखता है कि यह ईश्वर बना जीवात्मा वायुके समान असमर्थ, जड़ और पराधीन नहीं है। इस जीवात्मामें ऐसी सामर्थ्य और विवेक है कि यह जब चाहे, तब माने हुए सम्बन्धको छोड़ सकता है और परमात्माके साथ नित्य सम्बन्धका अनुभव कर सकता है। परन्तु संयोगजन्य सुखकी लोलुपताके कारण यह संसारसे माने हुए सम्बन्धको छोड़ता नहीं और छोड़ना चाहता भी नहीं। जड़ता-(शरीरादि-) से तादात्म्य छूटनेपर जीवात्मा (गन्धकी तरह) शरीरोंको साथ ले जा सकता ही नहीं।
जीवको दो शक्तियाँ प्राप्त हैं—(१) प्राणशक्ति, जिससे श्वासोंका आवागमन होता है और (२) इच्छाशक्ति, जिससे भोगोंको पानेकी इच्छा करता है। प्राणशक्ति हरदम (श्वासोच्छ्वासके द्वारा) क्षीण होती रहती है। प्राणशक्तिका खत्म होना ही मृत्यु कहलाती है। जड़का संग करनेसे कुछ करने और पानेकी इच्छा बनी रहती है। प्राणशक्तिके रहते हुए इच्छाशक्ति अर्थात् कुछ करने और पानेकी इच्छा मिट जाय, तो मनुष्य जीवन्मुक्त हो जाता है। प्राणशक्ति नष्ट हो जाय और इच्छाएँ बनी रहें, तो दूसरा जन्म लेना ही पड़ता है। नया शरीर मिलनेपर इच्छाशक्ति तो वही (पूर्वजन्मको) रहती है, प्राणशक्ति नयी मिल जाती है। प्राणशक्तिका व्यय इच्छाओंको मिटानेमें होना चाहिये। निःस्वार्थभावसे सम्पूर्ण प्राणियोंके हितमें रत रहनेसे इच्छाएँ सुगमतापूर्वक मिट जाती हैं।
यहाँ 'गृहीत्वा' पदका तात्पर्य है—जो अपने नहीं हैं, उनसे राग, ममता, प्रियता करना। जिन मन, इन्द्रियोंके साथ अपनापन करके जीवात्मा उनको साथ लिये फिरता है, वे मन, इन्द्रियाँ कभी नहीं कहतीं कि हम तुम्हारी हैं और तुम हमारे हो। इनपर जीवात्माका शासन भी चलता नहीं; जैसा चाहे वैसा रख सकता नहीं, परिवर्तन कर सकता नहीं; फिर भी इनके साथ अपनापन रखता है, जो कि भूल ही है। वास्तवमें यह अपनेपनका (राग, ममतायुक्त) सम्बन्ध ही बाँधनेवाला होता है।
वस्तु हमें प्राप्त हो या न हो, बढ़िया हो या घटिया हो, हमारे काममें आये या न आये, दूर हो या पास हो, यदि उस वस्तुको हम अपनी मानते हैं तो उससे हमारा सम्बन्ध बना हुआ ही है।
अपनी तरफसे छोड़े बिना शरीरादिमें ममताका सम्बन्ध मरनेपर भी नहीं छूटता। इसलिये मृत शरीरकी हड्डियोंको गंगाजीमें डालनेसे उस जीवकी आगे गति होती है। इस माने हुए सम्बन्धको छोड़नेमें हम सर्वथा स्वतन्त्र तथा सबल हैं। यदि शरीरके रहते हुए ही हम उससे अपनापन हटा दें, तो जीते-जी ही मुक्त हो जायँ!
जो अपना नहीं है, उसको अपना मानना और जो अपना है, उसको अपना न मानना—यह बहुत बड़ा दोष है, जिसके कारण ही पारमार्थिक मार्गमें उन्मति नहीं होती।
इस श्लोकमें आया 'एतानि' पद सातवें श्लोकके 'मनःषष्ठीनीन्द्रियाणि' (पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ तथा मन-) का वाचक है। यहाँ 'एतानि' पदको सत्रह तत्त्वोंके समुदायरूप सूक्ष्मशरीर एवं कारणशरीर-(स्वभाव-) का भी छोटक मानना चाहिये। इन सबको ग्रहण करके जीवात्मा दूसरे शरीरमें जाता है। जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रोंका त्याग करके नये वस्त्र धारण करता है, ऐसे ही जीवात्मा पुराने शरीरका त्याग करके नये शरीरको प्राप्त होता है(गीता—दूसरे अध्यायका बाईसवाँ श्लोक)।
वास्तवमें शुद्ध चेतन-(आत्मा-)का किसी शरीरको प्राप्त करना और उसका त्याग करके दूसरे शरीरमें जाना हो नहीं सकता; क्योंकि आत्मा अचल और समानरूपसे सर्वत्र व्याप्त है (गीता—दूसरे अध्यायका सत्रहवाँ और चौबीसवाँ श्लोक)। शरीरोंका ग्रहण और त्याग परिच्छिन्न (एकदेशीय) तत्त्वके द्वारा ही होना सम्भव है, जबकि आत्मा कभी किसी भी देश-कालादिमें परिच्छिन्न नहीं हो सकता। परन्तु जब यह आत्मा प्रकृतिके कार्य शरीरसे तादात्म्य कर लेता है अर्थात् प्रकृतिस्थ हो जाता है, तब