श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- साधक-संजीवनी *
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स्थित हैं ही; परन्तु जड़ता-(शरीर आदि-) से तादात्म्य, | उसमें अपनी स्वाभाविक स्थितिका अनुभव नहीं हो सकता और कामनाके कारण हमें उसकी प्राप्ति अथवा | रहा है।
परिशिष्ट भाव— हम भगवान्के अंश हैं—‘ममैवांशो जीवलोकै ’ (गीता १५।७)। इसलिये भगवान्का जो धाम है, वही हमारा धाम है। इसी कारण उस धामकी प्राप्ति होनेपर फिर लौटकर संसारमें नहीं आना पड़ता। जबतक हम अपने उस धाममें नहीं जायेंगे, तबतक हम मुसाफिरकी तरह अनेक योनियोंमें और अनेक लोकोंमें घूमते ही रहेंगे, कहीं भी ठहर नहीं सकेंगे। अगर हम ऊँचे-से-ऊँचे ब्रह्मलोकमें भी चले जायें तो वहाँसे भी लौटकर आना पड़ेगा—‘आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन ’ (गीता ८।१६)। कारण कि यह सम्पूर्ण संसार (मात्र ब्रह्माण्ड) परदेश है, स्वदेश नहीं। यह पराया घर है, अपना घर नहीं। विभिन्न योनियोंमें और लोकोंमें हमारा घूमना, भटकना तभी बन्द होगा, जब हम अपने असली घरमें पहुँच जायेंगे।
परमपदको प्राप्त होकर फिर लौटकर संसारमें न आनेकी बात गीतामें तीन जगह कही गयी है—
१-यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्द्वाम परमं मम। (८।२१)
२-ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं यस्मिन्नाता न निवर्तन्ति भूयः। (१५।४)
३-यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्द्वाम परमं मम। (१५।६)
भगवान्ने ज्ञानमार्गमें तो अपुनरावृत्तिकी प्राप्ति बतायी है—‘गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धूतकल्पसाः ’ (गीता ५।१७), पर भक्तिमार्गमें अपने धामकी प्राप्ति बतायी है—यह भक्तिकी विशेषता है! भगवान्के धाममें प्रेमका विशेष आस्वादन होता है।
परमपदको न तो आधिभौतिक प्रकाश (सूर्य, चन्द्र आदि) प्रकाशित कर सकता है और न आधिदैविक प्रकाश (नेत्र, मन, बुद्धि, वाणी आदि) ही प्रकाशित कर सकता है। कारण कि यह स्वयंप्रकाश है। इसमें प्रकाश्य-प्रकाशकका भेद नहीं है।
‘गत्वा ’ में गति है, प्रवृत्ति नहीं; क्योंकि अंशकी अंशीकी ओर गति होती है, प्रवृत्ति नहीं। प्रवृत्ति तो परतः होती है, पर गति स्वतः होती है।
गति और प्रवृत्ति— गति स्वतः-स्वाभाविक होती है और उसमें परिश्रम (प्रयत्न), उद्योग तथा कर्तृत्व नहीं होता। परन्तु प्रवृत्ति अस्वाभाविक और श्रमसाध्य, उद्योगसाध्य तथा कर्तृत्वसहित होती है। प्रवृत्ति तो अहंकारयुक्त होनेपर होती है, पर गति अहंकाररहित होनेपर होती है। इसलिये गति ‘स्व’ की तरफ होती है और प्रवृत्ति ‘पर’ की तरफ होती है। गति परमात्माकी तरफ होती है और प्रवृत्ति संसारकी तरफ होती है। गति चिन्मयताकी तरफ होती है और प्रवृत्ति जड़ताकी तरफ होती है। गति असौमकी तरफ ले जाती है और प्रवृत्ति सौमितकी तरफ ले जाती है। गति स्वाधीन करती है और प्रवृत्ति पराधीन करती है। भोग तथा संग्रहका सुख चाहनेपर प्रवृत्ति होती है और दूसरेको सुख देनेपर गति होती है।
गतिका उदगम-स्थान ‘सत्’ है और प्रवृत्तिका उदगम-स्थान ‘असत्’ है। जैसे, गंगाका उदगम-स्थान गंगोत्री है। अगर गंगाको रोककर एक ऐसा बाँध बना दिया जाय, जो गंगोत्रीसे भी ऊँचा हो तो गंगाका जल स्वतः अपने उदगम-स्थान गंगोत्रीकी तरफ जायगा। इस प्रकार गंगाका अपने उदगम-स्थानकी ओर जाना ‘गति’ है। अतः गति दो तरहसे होती है—संसार (भोग और संग्रह)-की तरफ जाना बन्द करनेसे अर्थात् उससे विमुख होनेसे अथवा अपने उद्देश्य परमात्माकी तरफ जानेसे अर्थात् उनके सम्मुख होनेसे। नित्यप्राप्त परमात्माकी जो अप्राप्ति मानी है, उसका मिटना ही परमात्माकी तरफ गति होना है। गतियों परमात्मासे मानी हुई दूरी मिटती है और वास्तविक एकता प्रकट होती है।
साधकको ऐसा अनुभव होता है कि कई वर्ष पहले जैसे भाव तथा आचरण थे, वैसे अब नहीं रहे, प्रत्युत पहलेसे अधिक श्रेष्ठ हो गये तो यह साधककी गति हुई है। साधनावस्थामें जो गति होती है, उसमें अहम्का सूक्ष्म संस्कार रह सकता है, पर मुक्त होनेके बाद प्रतिक्षण वर्धमान प्रेमकी तरफ जो गति होती है, उसमें अहम्का सूक्ष्म संस्कार भी नहीं रहता अर्थात् अहम्का अत्यन्त अभाव हो जाता है। इसका कारण यह है कि जीव परमात्मासे जितना दूर होता है, उतना ही उसमें अहंकार रहता है। स्वरूपमें स्थित होनेपर भी सूक्ष्म अहंकार रहता है, जो मुक्तियों तो बाधक नहीं होता, पर अन्य दार्शनिकोंसे मतभेद करनेवाला होता है। परमात्मासे अभिन्नता होनेपर अहंकार सर्वथा मिट जाता है।