श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १५ ]
यद्यपि इस छठे श्लोकका बारहवें श्लोकसे घनिष्ठ सम्बन्ध है, तथापि पाँचवें और सातवें श्लोकोंको जोड़नेके लिये इसको यहाँ दिया गया है। इस श्लोकमें भगवान्ने दो खास बातें बतायी हैं—(१) उस धामको सूर्यादि प्रकाशित नहीं कर सकते (जिसका कारणरूपसे विवेचन भगवान्ने इसी अध्यायके बारहवें श्लोकमें किया है) और (२) उस धामको प्राप्त हुए जीव पुनः लौटकर संसारमें नहीं आते (जिसका कारणरूपसे विवेचन भगवान्ने इसी अध्यायके सातवें श्लोकमें किया है)।]
‘न तद्द्रासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः’—दृश्य जगत्में सूर्यके समान तेजस्वी, प्रकाशस्वरूप कोई चीज नहीं है। वह सूर्य भी उस परमधामको प्रकाशित करनेमें असमर्थ है; फिर सूर्यसे प्रकाशित होनेवाले चन्द्र और अग्नि उसे प्रकाशित कर ही कैसे सकते हैं! इसी अध्यायके बारहवें श्लोकमें भगवान् स्पष्ट कहेंगे कि सूर्य, चन्द्र और अग्निमें मेरा ही तेज है। मेरेसे ही प्रकाश पाकर ये भौतिक जगत्को प्रकाशित करते हैं। अतः जो उस परमात्मतत्त्वे प्रकाश पाते हैं, उनके द्वारा परमात्मस्वरूप परमधाम कैसे प्रकाशित हो सकता है? * तात्पर्य यह है कि परमात्मतत्त्व चेतन है और सूर्य, चन्द्र तथा अग्नि जड़ (प्राकृत) हैं। ये सूर्य, चन्द्र और अग्नि क्रमशः नेत्र, मन और वाणीको प्रकाशित करते हैं। ये तीनों (नेत्र, मन और वाणी) भी जड़ ही हैं। इसलिये नेत्रोंसे उस परमात्मतत्त्वको देखा नहीं जा सकता, मनसे उसका चिन्तन नहीं किया जा सकता और वाणीसे उसका वर्णन नहीं किया जा सकता; क्योंकि जड़ तत्त्वेसे चेतन परमात्मतत्त्वको अनुभूति नहीं हो सकती। वह चेतन (प्रकाशक) तत्त्व इन सभी प्रकाशित पदार्थोंमें सदा परिपूर्ण है। उस तत्त्वमें अपनी प्रकाशकताका अभिमान नहीं है।
चेतन जीवात्मा भी परमात्माका ही अंश होनेके कारण ‘स्वयं प्रकाशस्वरूप’ है; अतः उसको भी जड़ पदार्थ (मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ आदि) प्रकाशित नहीं कर सकते। मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ आदि जड़-पदार्थीका उपयोग (भगवान्के
नाते दूसरोंकी सेवा करके) केवल जड़तासे सम्बन्ध-विच्छेद करनेमें ही है।
एक बात ध्यान देनेकी है कि यहाँ सूर्यको ‘भगवान्’ या ‘देव’ की दृष्टिसे न देखकर केवल प्रकाश करनेवाले पदार्थीकी दृष्टिसे देखा गया है। तात्पर्य है कि सूर्य तैजस-तत्त्वोंमें श्रेष्ठ है; अतः यहाँ केवल सूर्यकी बात नहीं, प्रत्युत चन्द्र आदि सभी तैजस-तत्त्वोंकी बात चल रही है। जैसे, दसवें अध्यायके सौतीसवें श्लोकमें भगवान्ने कहा कि ‘वृष्णिवंशियोंमें मैं वासुदेव हूँ’, तो वहाँ ‘वासुदेव’का भगवान्के रूपसे वर्णन नहीं, प्रत्युत वृष्णिवंशके श्रेष्ठ पुरुषके रूपसे ही वर्णन है।
‘यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्भ्राम परमं मम’—जीव परमात्माका अंश है। वह जबतक अपने अंशी परमात्माको प्राप्त नहीं कर लेता, तबतक उसका आवागमन नहीं मिट सकता। जैसे नदियोंके जलको अपने अंशी समुद्रसे मिलनेपर ही स्थिरता मिलती है, ऐसे ही जीवको अपने अंशी परमात्मासे मिलनेपर ही वास्तविक, स्थायी शान्ति मिलती है। वास्तवमें जीव परमात्मासे अभिन्न ही है, पर संसारके (माने हुए) संगके कारण उसको ऊँच-नीच योनियोंमें जाना पड़ता है।
यहाँ ‘परमधाम’ शब्द परमात्माका धाम और परमात्मा—दोनोंका ही वाचक है। यह परमधाम प्रकाशस्वरूप है। जैसे सूर्य अपने स्थान-विशेषपर भी स्थित है और प्रकाशरूपसे सब जगह भी स्थित है अर्थात् सूर्य और उसका प्रकाश परस्पर अभिन्न हैं, ऐसे ही परमधाम और सर्वव्यापी परमात्मा भी परस्पर अभिन्न हैं।
भक्तोंकी भिन्न-भिन्न मान्यताओंके कारण ब्रह्मलोक, साकेत धाम, गोलीक धाम, देवीद्वीप, शिवलोक आदि सब एक ही परमधामके भिन्न-भिन्न नाम हैं। यह परमधाम चेतन, ज्ञानस्वरूप, प्रकाशस्वरूप और परमात्मस्वरूप है।
यह अविनाशी परमपद आत्मरूपसे सबमें समानरूपसे अनुस्यूत (व्याप्त) है। अतः स्वरूपसे हम उस परमपदमें
- (१) न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः।
तमेव भान्तमुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति॥
(कठेपनिषद् २।२।१५; मुण्डकोपनिषद् २।२।१०; श्वेताश्वतरोपनिषद् ६।१४)
‘उस परमात्माको सूर्य प्रकाशित नहीं करता, चन्द्र और तारे प्रकाशित नहीं करते, विद्युत् भी प्रकाशित नहीं करती, फिर यह अग्नि उसे कैसे प्रकाशित करेगी? यह सम्पूर्ण जगत् उस परमात्माके प्रकाशसे ही प्रकाशित होता है।’
(२) ‘जगत प्रकास्य प्रकासक राम्।’ (मानस १।११७।४)