श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 970, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्लोक ६ ]
- साधक-संजीवनी *
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मुक्तिका पात्र होता है (गीता—दूसरे अध्यायका पन्द्रहवों श्लोक)। इसीलिये इस श्लोकमें भगवान्ने दो बार मूढ़ताके त्यागकी बात (‘निर्मानमोहाः’ और ‘अमूहाः’) कहकर मूढ़ताके त्यागपर विशेष जोर दिया है।
मूढ़ता अर्थात् मोह दो प्रकारका होता है—(१) परमात्माकी ओर न लगकर संसारमें ही लग जाना और (२) परमात्माको ठीक तरहसे न जानना। इस श्लोकमें पहले ‘निर्मानमोहाः’ पदसे संसारका मोह चले जानेकी बात कही है और यहाँ ‘अमूहाः’* पदसे परमात्माको ठीक तरहसे जान लेनेकी बात कही है।
जिस परमात्माको इसी अध्यायके पहले श्लोकमें ‘ऊर्ध्वमूलम्’ पदसे कहा गया तथा जिस परमपदरूप परमात्माकी खोज करनेके लिये चौथे श्लोकमें प्रेरणा की गयी और आगे छठे श्लोकमें जिसकी महिमाका वर्णन किया गया है, उसी परमात्मरूप परमपदको यहाँ ‘अव्ययम् पदम्’ कहा है। जो ऊँची स्थितिके साधक भक्त मान, मोह, ममता आदि दोषोंसे सर्वथा रहित हो जाते हैं, वे उस
अविनाशी परमपदको अवश्य प्राप्त होते हैं, जिसको प्राप्त कर लेनेपर मनुष्य लौटकर नाशवान् संसारमें नहीं आता।
वास्तवमें तो मनुष्यमात्र उस पदको स्वतः प्राप्त है, पर उधर दृष्टि न रहनेसे उसको वैसा अनुभव नहीं होता। इसे एक उदाहरणसे समझना चाहिये। हम रेलगाडीसे यात्रा कर रहे हैं। हमारी गाड़ी एक स्टेशनपर रुक जाती है। हमारी गाड़ीके पास (दूसरी पटरीपर) खड़ी हुई दूसरी गाड़ी सहसा चलने लगती है। उस समय (उस चलती हुई गाड़ीपर दृष्टि रहनेसे) भ्रमसे हमें अपनी गाड़ी चलती हुई देखने लगती है। परन्तु जब हम वहाँसे अपनी दृष्टि हटाकर स्टेशनकी तरफ देखते हैं, तब पता लगता है कि हमारी गाड़ी तो ज्यों-की-त्यों (अपने स्थानपर) खड़ी हुई है। इसी प्रकार संसारसे सम्बन्ध होनेपर मनुष्य अपनेको संसारकी तरह क्रियाशील (आने-जानेवाला) देखने लगता है। पर जब वह संसारसे दृष्टि हटाकर अपने स्वरूपको देखता है, तो उसको पता लगता है कि मैं स्वयं तो ज्यों-का-त्यों ही हूँ।
परिशिष्ट भाव —ज्ञानयोग और कर्मयोगके अन्तर्गत भक्ति नहीं आती, पर भक्तिके अन्तर्गत ज्ञानयोग और कर्मयोग दोनों आ जाते हैं (गीता—दसवें अध्यायका दसवाँ-ग्यारहवाँ श्लोक)। इसीलिये यहाँ ‘अध्यात्मनित्याः’ पदसे ज्ञानयोग और ‘विनिवृत्तकामाः’ पदसे कर्मयोग ले सकते हैं।
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें वर्णित जिस अविनाशी पदको भक्तलोग प्राप्त होते हैं, वह अविनाशी पद कैसा है—इसका भगवान् विवेचन करते हैं।
न तद्वासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः।
यदगत्वा न निवर्तन्ते तद्भ्राम परमं मम ॥६॥
| तत् | = उस (परमपद)-को | पावकः | = अग्नि ही | न, निवर्तन्ते | = लौटकर (संसारमें) |
|---|---|---|---|---|---|
| न | = न | भासयते | = प्रकाशित कर सकती है (और) | नहीं आते, | |
| सूर्यः | = सूर्य, | यत् | = जिसको | तत् | = वही |
| न | = न | गत्वा | = प्राप्त होकर | मम | = मेरा |
| शशाङ्कः | = चन्द्र (और) | (जीव) | परमम् | = परम | |
| न | = न | धाम | = धाम है। |
व्याख्या —[छठा श्लोक पाँचवें और सातवें श्लोकोंको जोड़नेवाला है। इन श्लोकोंमें भगवान् यह बताते हैं कि वह अविनाशी पद मेरा ही धाम है, जो मेरेसे अभिन्न है और जीव भी मेरा अंश होनेके कारण मेरेसे अभिन्न है। अतः जीवकी भी उस धाम-(अविनाशी पद-) से अभिन्नता है अर्थात् वह उस धामको नित्यप्राप्त है।
- जैसे निर्गुण तत्त्वको जाननेवाला अमूह (मोहरहित) हो जाता है (पाँचवें अध्यायका बीसवाँ श्लोक), ऐसे ही सगुण-साकारको दृढ़तापूर्वक माननेवाला भी अमूह हो जाता है (दसवें अध्यायका तीसरा और पन्द्रहवें अध्यायका उन्नीसवाँ श्लोक)।