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भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १५ ]

विशेष बात

द्रन्द् (राग-द्वेषादि) ही विषमता है, जिनसे सब प्रकारके पाप पैदा होते हैं। अतः विषमताका त्याग करनेके लिये साधकको नाशवान् पदार्थोंके माने हुए महत्त्वको अन्तःकरणसे निकाल देना चाहिये। द्रन्द्को दो भेद हैं—

(१) स्थूल (व्यावहारिक) द्रन्द्—सुख-दुःख, अनुकूलता-प्रतिकूलता आदि स्थूल द्रन्द् हैं। प्राणी सुख, अनुकूलता आदिकी इच्छा तो करते हैं, पर दुःख, प्रतिकूलता आदिकी इच्छा नहीं करते। यह स्थूल द्रन्द् मनुष्य, पशु, पक्षी, वृक्ष आदि सभीमें देखनेमें आता है।

(२) सूक्ष्म (आध्यात्मिक) द्रन्द्—यद्यपि अपनी उपासना और उपास्यको सर्वश्रेष्ठ मानकर उसको आदर (महत्त्व) देना आवश्यक एवं लाभप्रद है, तथापि दूसरोंकी उपासना और उपास्यको नीचा बताकर उसका खण्डन, निन्दा आदि करना 'सूक्ष्म द्रन्द्' है जो साधकके लिये हानिकारक है।

वास्तवमें सभी उपासनाओंका एकमात्र उद्देश्य संसार-(जडता- ) से सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद करना है। साधकोंकी रुचि, श्रद्धा-विश्वास और योग्यताके अनुसार उपासनाओंमें भिन्नता होती है, जिसका होना उचित भी है। अतः साधकको उपासनाओंकी भिन्नतापर दृष्टि न रखकर 'उद्देश्य'की अभिन्नतापर ही दृष्टि रखनी चाहिये। दूसरोंकी उपासनाको न देखकर अपनी उपासनामें तत्परतापूर्वक लगे रहनेसे उपासना-सम्बन्धी 'सूक्ष्म द्रन्द्' स्वतः मिट जाता है।

गीतामें 'स्थूल द्रन्द्' को 'मोहकलिलम्' (२।५२) और 'सूक्ष्म द्रन्द्' को 'श्रुतिविवप्रतिपन्ना'* (२।५३) पदोंसे कहा गया है। साधकके अन्तःकरणमें जबतक संसार-(जडता- ) का सम्बन्ध या महत्त्व रहता है, तभीतक ये द्रन्द् रहते हैं। 'स्थूल द्रन्द्' संसारको विशेषरूपसे सत्ता और महत्ता देता है। अतः 'स्थूल द्रन्द्' को मिटाना बहुत जरूरी है।

जबतक मूढ़ता रहती है, तभीतक द्रन्द् रहते हैं। वास्तवमें देखा जाय तो अपनेमें द्रन्द् मानना ही मूढ़ता है। राग-द्वेष, सुख-दुःख, हर्ष-शोक आदि द्रन्द् अन्तःकरणमें होते हैं, स्वयं-(अपने स्वरूप- ) में नहीं। अन्तःकरण जड है और 'स्वयं' चेतन एवं जडका प्रकाशक है। अतः

अन्तःकरणसे 'स्वयं' का सम्बन्ध है ही नहीं। केवल मान्यतासे ही यह सम्बन्ध प्रतीत होता है।

यह सभीका अनुभव है कि सुख-दुःखादि द्रन्द्ोंके आनेपर हम तो वही रहते हैं। ऐसा नहीं होता कि सुख आनेपर हम और होते हैं तथा दुःख आनेपर और। परन्तु मूढ़तावश इन सुख-दुःखादिसे मिलकर सुखी और दुःखी होने लगते हैं। यदि हम इन आने-जानेवालोंसे न मिलकर अपने स्वरूपमें स्थित (स्वस्थ) रहें, तो सुख-दुःखादि द्रन्द्ोंसे स्वतः रहित हो जायेंगे। इसलिये साधकको बदलनेवाली अर्थात् आने-जानेवाली अवस्थाओं-(सुख-दुःख, हर्ष-शोकादि-) पर दृष्टि न रखकर कभी न बदलनेवाले अपने स्वरूपपर ही दृष्टि रखनी चाहिये, जो सब अवस्थाओंसे अतीत है।

गीतामें भगवान्ने राग-द्वेष आदि द्रन्द्ोंसे मुक्त होनेका बड़ा सुगम उपाय बताया है कि अनुकूलता-प्रतिकूलतामें राग-द्वेष छिपे हुए हैं। उनसे बचनेके लिये साधकको केवल इतनी सावधानी रखनी है कि वह इनके वशमें न हो (गीता—तीसरे अध्यायका चौंतीसवाँ श्लोक)। तात्पर्य यह है कि राग-द्वेष दीखनेपर भी साधक इनके वशीभूत होकर तदनुसार क्रिया न करे; क्योंकि क्रिया करनेसे ही ये पुष्ट होते हैं।

'गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत्'—आने-जानेवाले पदार्थोंको प्राप्त करनेकी इच्छा या चेष्टा करना तथा उनसे सुखी-दुःखी होना 'मूढ़ता' है। वास्तवमें संसार निरन्तर परिवर्तनशील है और परमात्मा नित्य रहनेवाला है। परमात्माकी सत्तासे ही संसारकी सत्ता दीखती है। परन्तु अविनाशी परमात्मा और विनाशी संसारकी सत्ताको मिलाकर 'संसार है' ऐसा मान लेना 'मूढ़ता' है।

जिस प्रकार मूढ़ (अज्ञानी) मनुष्योंको 'संसार है' ऐसा स्पष्ट दिखायी देता है, उसी प्रकार अमूढ़ (मोहरहित) भक्तोंको 'परमात्मा है' ऐसा स्पष्ट अनुभव होता है। संसार जैसा दिखायी देता है, वैसा ही है—इस प्रकार संसारको स्थायी मान लेना 'मूढ़ता' (मोह) है। जिनकी यह मूढ़ता चली गयी, उन भक्तोंको यहाँ 'अमूढ़ाः' कहा गया है। मूढ़ता चले जानेके बाद सुख-दुःखका असर नहीं पड़ता। जिसपर सुख-दुःख आदि द्रन्द्ोंका असर नहीं पड़ता, वह

  • 'श्रुतिविवप्रतिपन्ना' का अर्थ है—शास्त्रोंमें ज्ञान, कर्म और भक्ति; द्वैत, अद्वैत, शुद्धाद्वैत, द्वैताद्वैत आदि सिद्धान्त; विष्णु, राम, कृष्ण, शिव, शक्ति, गणेश आदि उपास्यदेव; सकाम और निष्कामभाव इत्यादि भिन्न-भिन्न विचारोंको देखकर किसी एक विचारपर अपना निश्चय या निर्णय नहीं कर सकना अर्थात् किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाना।