श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 968, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्लोक ५ ]
- साधक-संजीवनी *
१६७
अप्राप्तकी कामना होती है। परन्तु जिन भक्तोंका सांसारिक वस्तु आदिको प्राप्त करनेका उद्देश्य है ही नहीं, वे कामनाओंसे सर्वथा रहित हो जाते हैं।
शरीरमें ममता होनेसे कामना पैदा हो जाती है कि मेरा शरीर स्वस्थ रहे, बीमार न हो जाय; शरीर हृष्टपुष्ट रहे, कमजोर न हो जाय। इसीसे सांसारिक धन, पदार्थ, मकान आदिकी अनेक कामनाएँ पैदा होती हैं। शरीर आदिमें ममता न रहनेसे भक्तोंकी कामनाएँ मिट जाती हैं।
भक्तोंका यह अनुभव होता है कि शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि और अहम् (मैं-पन)—ये सभी भगवान्के ही हैं। भगवान्के सिवाय उनका अपना कुछ होता ही नहीं। ऐसे भक्तोंकी सम्पूर्ण कामनाएँ विशेष और निःशेषरूपसे नष्ट हो जाती हैं। इसलिये उन्हें यहाँ ‘विनिवृत्तकामाः’ कहा गया है।
विशेष बात
वास्तवमें शरीर आदिका वियोग तो प्रतिक्षण हो ही रहा है। साधकको प्रतिक्षण होनेवाले इस वियोगको स्वीकारमात्र करना है। इन वियुक्त होनेवाले पदार्थोंसे संयोग माननेसे ही कामनाएँ पैदा होती हैं। जन्मसे लेकर आजतक निरन्तर हमारी प्राणशक्ति नष्ट हो रही है और शरीरसे प्रतिक्षण वियोग हो रहा है। जब एक दिन शरीर मर जायगा, तब लोग कहेंगे कि आज यह मर गया। वास्तवमें देखा जाय तो शरीर आज नहीं मरा है, प्रत्युत प्रतिक्षण मरनेवाले शरीरका मरना आज समाप्त हुआ है! अतः कामनाओंसे निवृत्त होनेके लिये साधकको चाहिये कि वह प्रतिक्षण वियुक्त होनेवाले शरीरादि पदार्थोंको स्थिर मानकर उनसे कभी अपना सम्बन्ध न माने।
वास्तवमें कामनाओंकी पूर्ति कभी होती ही नहीं। जबतक एक कामना पूरी होती हुई दीखती है, तबतक दूसरी अनेक कामनाएँ उत्पन्न हो जाती हैं। उन कामनाओंमेंसे जब किसी एक कामनाकी पूर्ति होनेपर मनुष्यको सुख प्रतीत होता है, तब वह दूसरी कामनाओंकी पूर्तिके लिये चेष्टा करने लग जाता है। परन्तु यह नियम है कि चाहे कितने ही भोग-पदार्थ मिल जायँ, पर कामनाओंकी पूर्ति कभी हो ही नहीं सकती। कामनाओंकी पूर्तिके सुखभोगसे नयी-नयी कामनाएँ पैदा होती रहती हैं—‘जिमि प्रतिलाभ लोभ अधिकाई’। संसारके सम्पूर्ण व्यक्ति, पदार्थ एक साथ मिलकर एक व्यक्तिकी भी कामनाओंकी पूर्ति नहीं कर सकते, फिर सीमित पदार्थोंकी
कामना करके सुखकी आशा रखना महान् भूल ही है। कामनाओंके रहते हुए कभी शान्ति नहीं मिल सकती—‘स शान्तिमाप्नोति न कामकामी’ (गीता २।७०)। अतः कामनाओंकी निवृत्ति ही परम-शान्तिका उपाय है। इसलिये कामनाओंकी निवृत्ति ही करनी चाहिये, न कि पूर्तिकी चेष्टा।
सांसारिक भोग-पदार्थोंके मिलनेसे सुख होता है—यह मान्यता कर लेनेसे ही कामना पैदा होती है। यह कामना जितनी तेज होगी, उस पदार्थके मिलनेमें उतना ही सुख होगा। वास्तवमें कामनाकी पूर्तिसे सुख नहीं होता। जब मनुष्य किसी पदार्थके अभावका दुःख मानकर कामना करके उस पदार्थका मनसे सम्बन्ध जोड़ लेता है, तब उस पदार्थके मिलनेपर अर्थात् उस पदार्थका मनसे सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर (अभावकी मान्यताका दुःख मिट जानेपर) सुख प्रतीत होता है। यदि वह पहलेसे ही कामना न करे तो पदार्थके मिलनेपर सुख और न मिलनेपर दुःख होगा ही नहीं।
मूलमें कामनाकी सत्ता है ही नहीं क्योंकि जब काम्यपदार्थकी ही स्वतन्त्र सत्ता नहीं है, तब उसकी कामना कैसे रह सकती है? इसलिये सभी साधक निष्काम होनेमें समर्थ हैं।
‘द्रन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसज्ज्ञैः’—वे भक्त सुख-दुःख, हर्ष-शोक, राग-द्वेष आदि द्रन्द्वोंसे रहित हो जाते हैं। कारण कि उनके सामने अनुकूल-प्रतिकूल जो भी परिस्थिति आती है, उसको वे भगवान्का ही दिया हुआ प्रसाद मानते हैं। उनकी दृष्टि केवल भगवत्कृपापर ही रहती है, अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितिपर नहीं। अतः ‘जो कुछ होता है, वह हमारे प्यारे प्रभुका ही मंगलमय विधान है’—ऐसा भाव होनेसे उनके द्रन्द्व सुगमतापूर्वक मिट जाते हैं।
भगवान् सबके सुहृद् हैं—‘सुहृदं सर्वभूतानाम्’ (गीता ५।२९)। उनके द्वारा अपने अंश-(जीवात्मा-) का कभी अहित हो ही नहीं सकता। उनके मंगलमय विधानसे जो भी परिस्थिति हमारे सामने आती है, वह हमारे परमहितके लिये ही होती है। इसलिये भक्त भगवान्के विधानमें परम प्रसन्न रहते हैं। शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धिको अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितिका ज्ञान होनेपर भी ‘ऐसी परिस्थिति क्यों आ गयी? ऐसी परिस्थिति आती रहे’ आदि विकार, द्रन्द्व उनमें नहीं होते।