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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १५ ]

निजानन्द (अखण्ड आनन्द) है और अंशोंमें परमानन्द (अनन्त आनन्द) है। जो मुक्तिकमें नहीं अटकता, उसमें सन्तोष नहीं करता, उसको प्रतिक्षण वर्धमान प्रेमकी प्राप्ति होती है—‘मद्वृत्तिं लभते पराम् ’ (गीता १८।५४)। इसीलिये भगवान्ने संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद करने अर्थात् मुक्त होनेके बाद परमात्माकी खोज करके उनकी शरण ग्रहण करनेकी बात कही है।

सम्बन्ध—जो महापुरुष आदिपुरुष परमात्माके शरण होकर परमपदको प्राप्त होते हैं, उनके लक्षणोंका वर्णन आगेके श्लोकमें करते हैं।

निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः ।

द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसञ्जैर्गच्छन्त्यमूहाः पदमव्ययं तत् ॥ ५ ॥

निर्मानमोहाः = जो मान और मोहसे रहित हो गये हैं,विनिवृत्तकामाः = जो (अपनी दृष्टिसे) सम्पूर्ण कामनाओंसे रहित हो गये हैं,अमूहाः = (ऊँची स्थितिवाले) मोहरहित साधक
जितसङ्गदोषाः = जिन्होंने आसक्तिसे होनेवाले दोषोंको जीत लिया है,सुखदुःखसञ्जैः = जो सुख-दुःख नामवालेभक्त
अध्यात्मनित्याः = जो नित्य- निरन्तर परमात्मामें ही लगे हुए हैं,द्वन्द्वैः = द्वन्द्वोंसेतत् = उस
विमुक्ताः = मुक्त हो गये हैं, (ऐसे)अव्ययम् = अविनाशी
पदम् = परमपद (परमात्मा)- को
गच्छन्ति = प्राप्त होते हैं।

व्याख्या—‘निर्मानमोहाः’ —शरीरमें मैं-मेरापन होनेसे ही मान, आदर-सत्कारकी इच्छा होती है। शरीरसे अपना सम्बन्ध माननेके कारण ही मनुष्य शरीरके मान-आदरको भूलसे स्वयंका मान-आदर मान लेता है और फँस जाता है। जिन भक्तोंका केवल भगवान्में ही अपनापन होता है, उनका शरीरमें मैं-मेरापन नहीं रहता; अतः वे शरीरके मान-आदरसे प्रसन्न नहीं होते। एकमात्र भगवान्के शरण होनेपर उनका शरीरसे मोह नहीं रहता, फिर मान-आदरकी इच्छा उनमें हो ही कैसे सकती है?

केवल भगवान्का ही उद्देश्य, ध्येय होनेसे और केवल भगवान्के ही शरण, परायण रहनेसे वे भक्त संसारसे विमुख हो जाते हैं। अतः उनमें संसारका मोह नहीं रहता।

‘जितसंगदोषाः’ —‘भगवान्में आकर्षण होना ‘प्रेम’ और संसारमें आकर्षण होना ‘आसक्ति’ कहलाती है। ममता, स्मृहा, वासना, आशा आदि दोष आसक्तिके कारण ही होते हैं। केवल भगवान्के ही परायण होनेके कारण भक्तोंकी सांसारिक भोगोंमें आसक्ति नहीं रहती। आसक्ति न रहनेके कारण भक्त आसक्तिसे होनेवाले ममता आदि

दोषोंको जीत लेते हैं।

आसक्ति प्राप्त और अप्राप्त—दोनोंकी होती है; किन्तु कामना अप्राप्तकी ही होती है। इसलिये इस श्लोकमें ‘विनिवृत्तकामाः ’ पद अलगसे आया है।

‘अध्यात्मनित्याः’ —केवल भगवान्के ही शरण रहनेसे भक्तोंकी अहंता बदल जाती है। मैं भगवान्का हूँ और भगवान् मेरे हैं, मैं संसारका नहीं हूँ और संसार मेरा नहीं है—इस प्रकार अहंता बदलनेसे उनकी स्थिति निरन्तर भगवान्में ही रहती है*। कारण कि मनुष्यकी जैसी अहंता होती है, उसकी स्थिति वहाँ ही होती है। जैसे मनुष्य जन्मके अनुसार अपनेको ब्राह्मण मानता है, तो उसकी ब्राह्मणपनकी मान्यता नित्य-निरन्तर रहती है अर्थात् वह नित्य-निरन्तर ब्राह्मणपनमें स्थित रहता है, चाहे याद करे या न करे। ऐसे ही जो भक्त अपना सम्बन्ध केवल भगवान्के साथ ही मानते हैं, वे नित्य-निरन्तर भगवान्में ही स्थित रहते हैं।

‘विनिवृत्तकामाः’ —संसारका ध्येय, लक्ष्य रहनेसे ही संसारकी वस्तु, परिस्थिति आदिकी कामना होती है अर्थात् ‘अमुक वस्तु, व्यक्ति आदि मुझे मिल जाय’—इस तरह

  • यद्यपि मात्र प्राणियोंकी स्थिति निरन्तर उसी सर्वव्यापक, सर्वप्रकाशक, सर्वेश्वर भगवान्में ही रहती है, तथापि वे भूलसे अपनी स्थिति भगवान्में न मानकर संसारमें मान लेते हैं; जैसे—मैं अमुक वर्ण, आश्रम, सम्प्रदाय, नाम, जाति आदिका हूँ। अपनी इस विपरीत मान्यताके कारण ही वे बँध जाते हैं और बार-बार जन्मते-मरते हैं।