श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 966, कुल 1299 में से
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- साधक-संजीवनी *
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'एव' पदका तात्पर्य है कि दूसरे सब आश्रयोंका त्याग
करके एकमात्र भगवान्का ही आश्रय ले। यही भाव गीतामें
'मामेव ये प्रपद्यन्ते' (७। १४), 'तमेव शरणं गच्छ'
(१८। ६२) और 'मामेकं शरणं व्रज' (१८। ६६)
पदोंमें भी आया है।
'प्रपद्ये' कहनेका अर्थ है - 'मैं शरण हूँ।' यहाँ शंका
हो सकती है कि भगवान् कैसे कहते हैं कि 'मैं शरण हूँ'?
क्या भगवान् भी किसीके शरण होते हैं? यदि शरण होते
हैं तो किसके शरण होते हैं? इसका समाधान यह है कि
भगवान् किसीके शरण नहीं होते; क्योंकि वे सर्वोपरि हैं।
केवल लोकशिक्षाके लिये भगवान् साधककी भाषामें
बोलकर साधकको यह बताते हैं कि वह 'मैं शरण हूँ'
ऐसी भावना करे।
'परमात्मा है' और 'मैं (स्वयं) हूँ' - इन दोनोंमें 'है'
के रूपमें एक ही परमात्मसत्ता विद्यमान है। 'मैं' के साथ
होनेसे ही 'है' का 'हूँ' में परिवर्तन हुआ है। यदि 'मैं'-
रूप एकदेशीय स्थितिको सर्वदेशीय 'है' में विलीन कर
दें, तो 'है' ही रह जायगा, 'हूँ' नहीं रहेगा। जबतक
'स्वयं' के साथ बुद्धि, मन, इन्द्रियाँ, शरीर आदिका सम्बन्ध
मानते हुए 'हूँ' बना हुआ है, तबतक व्यभिचार-दोष होनेके
कारण अनन्य शरणागति नहीं है।
परमात्माका अंश होनेके कारण जीव वास्तवमें सदा
परमात्माके ही आश्रित रहता है; परन्तु परमात्मासे विमुख
होनेके बाद (आश्रय लेनेका स्वभाव न छूटनेके कारण)
वह भूलसे नाशवान् संसारका आश्रय लेने लगता है, जो
कभी टिकता नहीं। अतः वह दुःख पाता रहता है। इसलिये
साधकको चाहिये कि वह परमात्मासे अपने वास्तविक
सम्बन्धको पहचानकर एकमात्र परमात्माके शरण हो जाय।
परिशिष्ट भाव - संसार नित्यनिवृत्त है, इसलिये उसका त्याग होता है - 'असंगशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा' और
परमात्मा नित्यप्राप्त हैं, इसलिये उनकी खोज होती है - 'ततः पदं तत्परिमार्गितव्यम्'। निर्माण और खोज - दोनोंमें
बहुत अन्तर है। निर्माण उस वस्तुका होता है, जिसका पहलेसे अभाव होता है और खोज उस वस्तुकी होती है, जो
पहलेसे ही विद्यमान होती है। परमात्मा नित्यप्राप्त और स्वतःसिद्ध हैं, इसलिये उनकी खोज होती है, निर्माण नहीं
होता। जब साधक परमात्माकी सत्ताको स्वीकार करता है, तब खोज होती है। खोज करनेके दो प्रकार हैं - एक
तो कण्ठी कहीं रखकर भूल जायँ तो हम जगह-जगह उसकी खोज करते हैं और दूसरा, कण्ठी गलेमें ही हो, पर
वहम हो जाय कि कण्ठी खो गयी तो हम जगह-जगह उसकी खोज करते हैं। परमात्माकी खोज गलेमें पड़ी कण्ठीकी
खोजके समान है। वास्तवमें परमात्मा खोया नहीं है। संसारमें अपने रागके कारण परमात्माकी तरफ दृष्टि नहीं जाती।
उधर दृष्टि न जाना ही उसका खोना है। तात्पर्य है कि जिस परमात्माको हम चाहते हैं और जिसकी हम खोज करते
हैं, वह परमात्मा नित्य-निरन्तर अपनेमें ही मौजूद है! परन्तु संसार अपनेमें नहीं है। जो अपनेमें है, उसकी खोज
करनेसे परिणाममें वह मिल जाता है। परन्तु जो अपनेमें नहीं है, उसकी खोज करनेसे परिणाममें वह मिलता नहीं;
क्योंकि वास्तवमें उसकी सत्ता ही नहीं है।
परमात्मा कभी अप्राप्त हुए ही नहीं, अप्राप्त हैं ही नहीं, अप्राप्त होना सम्भव ही नहीं। उनकी अप्राप्ति नहीं हुई है,
प्रत्युत विस्मृति हुई है। यह विस्मृति अनादि और सान्त (अन्त होनेवाली) है। जैसे दो व्यक्ति आपसमें एक-दूसरेको पहचानते
नहीं तो यह अपरिचय कबसे है - इसको कोई बता नहीं सकता। हम संस्कृत भाषाको नहीं जानते तो यह अनजानपना कबसे
है - इसको हम बता नहीं सकते। तात्पर्य है कि व्यक्तियोंकी सत्ता, हमारी सत्ता, संस्कृत भाषाकी सत्ता तो पहलेसे ही है,
पर उनका परिचय पहलेसे नहीं है। ऐसे ही विस्मृतिके समय भी परमात्माकी सत्ता ज्यों-की-त्यों है। परमात्मा तो नित्यप्राप्त
हैं, पर उनकी विस्मृति है अर्थात् उधर दृष्टि नहीं है, उनसे विमुखता है, उनसे अपरिचय है, उनकी अप्राप्तिका वहम है!
परमात्माकी खोज करनेपर यह विस्मृति मिट जाती है और उनकी प्राप्ति हो जाती है। परमात्माकी खोज करनेका उपाय
है - जो मौजूद नहीं है, उसको छोड़ते जाना - 'असंगशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा।' छोड़नेका तात्पर्य है - उसकी सत्ता और महत्ता
न मानकर उससे सम्बन्ध न जोड़ना, उसको अस्वीकार करना। अतः संसारके त्यागमें ही परमात्माकी खोज निहित है।
श्रीमद्भागवतमें आया है - 'अतस्त्यजन्तो मृगयन्ति सन्तः' (१०। १४। २८)।
'तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये' - संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर भावरूप स्वरूपमें स्थिति हो जाती है और साधक
मुक्त हो जाता है। मुक्त होनेपर संसारकी कामना तो मिट जाती है, पर प्रेमकी भूख नहीं मिटती। ब्रह्मसूत्रमें आया है -
'मुक्तोपसृप्यव्यपदेशात्' (१। ३। २)। 'उस प्रेमस्वरूप भगवान्को मुक्त पुरुषोंके लिये भी प्राप्तव्य बताया गया है।'
तात्पर्य है कि स्वरूप जिसका अंश है, उस अंशी (परमात्मा)-के प्रेमकी प्राप्तिमें ही मानव-जीवनकी पूर्णता है। स्वरूपमें