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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १५ ]

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें भगवान्ने अपने परमधामका वर्णन करते हुए यह बताया कि उसको प्राप्त होकर जीव लौटकर संसारमें नहीं आते। उसके विवेचनके रूपमें अपने अंश जीवात्माको भी (परमधामकी ही तरह) अपनेसे अभिन्न बताते हुए, जीवसे क्या भूल हो रही है कि जिससे उसको नित्यप्राप्त परमात्मस्वरूप परमधामका अनुभव नहीं हो रहा है—इसका हेतुसहित वर्णन आगेके श्लोकमें करते हैं।

ममैवांशो जीवलोकं जीवभूतः सनातनः।

मनःषष्ठीनीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति ॥ ७ ॥

जीवलोकं= इस संसारमेंएव= हीमनःषष्ठीनि= मन और पाँचों
जीवभूतः= जीव बना हुआसनातनः= सनातनइन्द्रियाणि= इन्द्रियोंको
आत्मा (स्वयं)अंशः= अंश है; (परन्तु वह)कर्षति= आकर्षित करता है
मम= मेराप्रकृतिस्थानि= प्रकृतिमें स्थित(अपना मान लेता है)।

व्याख्या—‘ममैवांशो जीवलोकं जीवभूतः सनातनः’— जिनके साथ जीवकी तात्त्विक अथवा स्वरूपकी एकता नहीं है, ऐसे प्रकृति और प्रकृतिके कार्यमात्रका नाम ‘लोक’ है। तीन लोक, चौदह भुवनोंमें जीव जितनी योनियोंमें शरीर धारण करता है, उन सम्पूर्ण लोकों तथा योनियोंको ‘जीवलोक’ पदके अन्तर्गत समझना चाहिये। आत्मा परमात्माका अंश है; परन्तु प्रकृतिके कार्य शरीर, इन्द्रियाँ, प्राण, मन आदिके साथ अपनी एकता मानकर वह ‘जीव’ हो गया है—‘जीवभूतः।’ उसका यह जीवपना बनावटी है, वास्तविक नहीं। नाटकमें कोई पात्र बननेकी तरह ही यह आत्मा जीवलोकमें ‘जीव’ बनता है।

सातवें अध्यायके पाँचवें श्लोकमें भगवान्ने कहा है कि इस सम्पूर्ण जगत्को मेरी ‘जीवभूता’ परा प्रकृतिने धारण कर रखा है अर्थात् अपरा प्रकृति-(संसार-) से वास्तविक सम्बन्ध न होनेपर भी जीवने उससे अपना सम्बन्ध मान रखा है।

भगवान् जीवके प्रति कितनी आत्मीयता रखते हैं कि उसको अपना ही मानते हैं—‘ममैवांशः।’ मानते ही नहीं, प्रत्युत जानते भी हैं। उनकी यह आत्मीयता महान् हितकारी, अखण्ड रहनेवाली और स्वतःसिद्ध है।

यहाँ भगवान् यह वास्तविकता प्रकट करते हैं कि जीव केवल मेरा ही अंश है; इसमें प्रकृतिका किंचिन्मात्र भी अंश नहीं है। जैसे सिंहका बच्चा भेड़ोंमें मिलकर अपनेको भेड़ मान ले, ऐसे ही जीव शरीरादि जड़ पदार्थोंके साथ मिलकर अपने असली चेतनस्वरूपको भूल जाता है। अतः इस भूलको मिटाकर उसे अपनेको सदा सर्वथा चेतनस्वरूप ही अनुभव करना चाहिये। सिंहका बच्चा भेड़ोंके साथ

मिलकर भी भेड़ नहीं हो जाता। जैसे कोई दूसरा सिंह आकर उसे बोध करा दे कि ‘देख! तेरी और मेरी आकृति, स्वभाव, जाति, गर्जना आदि सब एक समान हैं; अतः निश्चितरूपसे तू भेड़ नहीं, प्रत्युत मेरे—जैसा ही सिंह है।’ ऐसे ही भगवान् यहाँ ‘मम एव’ पदोंसे जीवको बोध कराते हैं कि हे जीव! तू मेरा ही अंश है। प्रकृतिके साथ तेरा सम्बन्ध कभी हुआ नहीं, है नहीं, होगा नहीं और हो सकता भी नहीं।

भगवत्प्राप्तिके सभी साधनोंमें ‘अहंता’ (मैं-पन) और ‘ममता’-(मेरा-पन-) का परिवर्तन-रूप साधन बहुत सुगम और श्रेष्ठ है। अहंता और ममता—दोनोंमें साधककी जैसी मान्यता होती है, उसके अनुसार उसका भाव तथा क्रिया भी स्वतः होती है। साधककी ‘अहंता’ यह होनी चाहिये कि ‘मैं भगवान्का ही हूँ’ और ‘ममता’ यह होनी चाहिये कि ‘भगवान् ही मेरे हैं।’

यह सबका अनुभव है कि हम अपनेको जिस वर्ण, आश्रम, सम्प्रदाय आदिका मानते हैं, उसीके अनुसार हमारा जीवन बनता है। पर यह मान्यता (जैसे-मैं ब्राह्मण हूँ; मैं साधु हूँ आदि) केवल (नाटकके स्वोंगकी तरह) कर्तव्य-पालनके लिये है; क्योंकि यह सदा रहनेवाली नहीं है। परन्तु ‘मैं भगवान्का हूँ’ यह वास्तविकता सदा रहनेवाली है। ‘मैं ब्राह्मण हूँ; मैं साधु हूँ’ आदि भाव कभी हमसे ऐसा नहीं कहते कि ‘तुम ब्राह्मण हो’ या ‘तुम साधु हो।’ इसी प्रकार मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ, शरीर, धन, जमीन, मकान आदि जिन पदार्थोंको हम भूलसे अपना मान रहे हैं, वे हमें कभी भी ऐसा नहीं कहते कि तुम हमारे हो, पर सम्पूर्ण सृष्टिके रचयिता परमात्मा स्पष्ट घोषणा करते हैं कि जीव मेरा ही है!