श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 974, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्लोक ७ ]
- साधक-संजीवनी *
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विचार करना चाहिये कि शरीरादि पदार्थोंको हम अपने साथ लाये नहीं, इच्छानुसार उनमें परिवर्तन कर सकते नहीं, इच्छानुसार उनको अपने पास स्थिर रख सकते नहीं, हम भी उनके साथ सदा रह सकते नहीं, उनको अपने साथ ले जा सकते नहीं, फिर भी उनको अपना मानते हैं—यह हमारी कितनी बड़ी भूल है!
बचपनमें हमारे मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ, शरीर जैसे थे, वैसे अब नहीं हैं, सब-के-सब बदल गये हैं, फिर भी हम 'मैं जो बचपनमें था, वही अब हूँ' ऐसा मानते हैं। कारण यही है कि शरीरादिमें परिवर्तन होनेपर भी हमारेमें परिवर्तन नहीं हुआ। इस प्रकार शरीरादिमें हमें स्पष्ट परिवर्तन दीखता है। जिसको परिवर्तन दीखता है, वह स्वयं परिवर्तनरहित होता ही है। अतः संसारके पदार्थ, व्यक्ति हमारे साथी नहीं हैं।
'मैं भगवान्का हूँ'—ऐसा भाव रखना अपने-आपको भगवान्में लगाना है। साधकोंसे भूल यही होती है कि वे अपने-आपको भगवान्में न लगाकर मन-बुद्धिको भगवान्में लगानेकी कोशिश करते हैं। 'मैं भगवान्का हूँ'—इस वास्तविकताको भूलकर 'मैं ब्राह्मण हूँ; मैं साधु हूँ' आदि भी मानते रहें और मन-बुद्धिको भगवान्में लगाते रहें तो यह दुविधा कभी मिटेगी नहीं और बहुत प्रयत्न करनेपर भी मन-बुद्धि जैसे भगवान्में लगने चाहिये, वैसे लगेंगे नहीं। भगवान्ने भी इस अध्यायके चौथे श्लोकमें 'मैं उस परमात्मके शरण हूँ' पदोंसे अपने-आपको परमात्मामें लगानेकी बात ही कही है। गोस्वामी तुलसीदासजी भी कहते हैं कि पहले भगवान्का होकर फिर नाम-जप आदि साधन करें तो अनेक जन्मोंकी बिगड़ी हुई स्थिति आज अभी सुधर सकती है—
बिगरी जनम अनेक की सुधरै अबहीं आजु। होहि राम को नाम जपु तुलसी तजि कुसमाजु॥
(दोहावली २२)
तात्पर्य यह है कि भगवान्में केवल मन-बुद्धि लगानेकी अपेक्षा अपने-आपको भगवान्में लगाना श्रेष्ठ है। अपने-आपको भगवान्में लगानेसे मन-बुद्धि स्वतः सुगमतापूर्वक भगवान्में लग जाते हैं। नाटकका पात्र हजारों दर्शकोंके सामने यह कहता है कि 'मैं रावणका बेटा मेघनाद हूँ' और मेघनादकी तरह ही वह बाहरी सब क्रियाएँ करता है। परन्तु उसके भीतर यह भाव हरदम रहता है कि यह तो स्वॉंग है; वास्तवमें मैं मेघनाद हूँ ही नहीं। इसी तरह साधकोंको भी
नाटकके स्वॉंगकी तरह इस संसाररूपी नाट्यशालामें अपने-अपने कर्तव्यका पालन करते हुए भीतरसे 'मैं तो भगवान्का हूँ' ऐसा भाव हरदम जाग्रत् रखना चाहिये।
जीव सदासे ही भगवान्का है—'सनातनः।' भगवान्ने न तो कभी जीवका त्याग ही किया, न कभी उससे विमुख हो हुए। जीव भी भगवान्का त्याग नहीं कर सकता। भगवान्के द्वारा मिली हुई स्वतन्त्रताका दुरुपयोग करके वह भगवान्से विमुख हुआ है। जिस प्रकार सोनेका गहना तत्त्वतः सोनेसे अलग नहीं हो सकता, उसी प्रकार जीव भी तत्त्वतः परमात्मासे कभी अलग नहीं हो सकता।
बुद्धिमान् कहलानेवाले मनुष्यकी यह बहुत बड़ी भूल है कि वह अपने अंशी भगवान्से विमुख हो रहा है। वह इधर खयाल ही नहीं करता कि भगवान् इतने सुहृद (दयालु और प्रेमी) हैं कि हमारे न चाहनेपर भी हमें चाहते हैं, न जाननेपर भी हमें जानते हैं। वे कितने उदार, दयालु और प्रेमी हैं—इसका वर्णन भाषा, भाव, बुद्धि आदिके द्वारा हो ही नहीं सकता। ऐसे सुहृद भगवान्को छोड़कर अन्य नाशवान् जड़ पदार्थोंको अपना मानना बुद्धिमानी नहीं, प्रत्युत महान् मूर्खता है।
जब मनुष्य भगवान्के आज्ञानुसार अपने कर्तव्यका पालन करता है, तब वे उसकी इतनी उन्नति कर देते हैं कि जीवन सफल हो जाता है और जन्म-मरणरूप बन्धन सदाके लिये मिट जाता है। जब मनुष्य भूलसे कोई निषिद्ध आचरण (पाप) कर बैठता है, तब वे दुःखोंको भेजकर उसको चेताते हैं, पुराने पापोंको भुगताकर उसको शुद्ध करते हैं और नये पापोंमें प्रवृत्तिसे रोकते हैं।
जीव कहीं भी क्यों न हो, नरकमें हो अथवा स्वर्गमें, मनुष्ययोनियें हो अथवा पशुयोनियें, भगवान् उसको अपना ही अंश मानते हैं। यह उनकी कितनी अहेतुकी कृपा, उदारता और महत्ता है! जीवके पतनको देखकर भगवान् दुःखी होकर कहते हैं कि मेरे पास आनेका उसका पूरा अधिकार था, पर वह मेरेको प्राप्त किये बिना ('माम् अप्राप्य ') नरकोंमें जा रहा है (गीता—सोलहवें अध्यायका बीसवाँ श्लोक)।
मनुष्य चाहे किसी भी स्थितिमें क्यों न हो, भगवान् उसे वहाँ स्थिर नहीं रहने देते; उसे अपनी ओर खींचते ही रहते हैं। जब हमारी सामान्य स्थितिमें कुछ भी परिवर्तन (सुख-दुःख, आदर-निरादर आदि) हो, तब यह मानना चाहिये कि भगवान् हमें विशेषरूपसे याद करके नयी