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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १५ ]

परिस्थिति पैदा कर रहे हैं; हमें अपनी ओर खींच रहे हैं। ऐसा मानकर साधक प्रत्येक परिस्थितिमें विशेष भगवत्-कृपाको देखकर मस्त रहे और भगवान्को कभी भूलें नहीं।

अंशीको प्राप्त करनेमें अंशको कठिनाई और देरी नहीं लगती। कठिनाई और देरी इसलिये लगती है कि अंशने अपने अंशीसे विमुखा मानकर उन शरीरादिको अपना मान रखा है, जो अपने नहीं हैं। अतः भगवान्के सम्मुख होते ही उनकी प्राप्ति स्वतःसिद्ध है। सम्मुख होना जीवका काम है; क्योंकि जीव ही भगवान्से विमुख हुआ है। भगवान् तो जीवको अपना मानते ही हैं; जीव भगवान्को अपना मान ले—यही सम्मुखता है।

मनुष्यसे यह बड़ी भारी भूल हो रही है कि जो व्यक्ति, वस्तु, परिस्थिति अभी नहीं है अथवा जिसका मिलना निश्चित भी नहीं है और जो मिलनेपर भी सदा नहीं रहेगी—उसकी प्राप्तिमें वह अपना पूर्ण पुरुषार्थ और उन्नति मानता है। यह मनुष्यका अपने साथ बड़ा भारी धोखा है! वास्तवमें जो नित्यप्राप्त और अपना है, उस परमात्माको प्राप्त करना ही मनुष्यका परम पुरुषार्थ है, शूरवीरता है। हम धन, सम्पत्ति आदि सांसारिक पदार्थ कितने ही क्यों न प्राप्त कर लें, पर अन्तमें या तो वे नहीं रहेंगे अथवा हम नहीं रहेंगे। अन्तमें ‘नहीं’ ही शेष रहेगा। वास्तवमें जो सदा ‘है’, उस—(अविनाशी परमात्मा—)को प्राप्त कर लेनेमें ही शूरवीरता है। जो ‘नहीं’ है, उसको प्राप्त करनेमें कोई शूरवीरता नहीं है।

जीव जितना ही नाशवान् पदार्थोंको महत्त्व देता है, उतना ही वह पतनकी तरफ जाता है और जितना ही अविनाशी परमात्माको महत्त्व देता है, उतना ही वह ऊँचा उठता है। कारण कि जीव परमात्माका ही अंश है।

नाशवान् सांसारिक पदार्थोंको प्राप्त करके मनुष्य कभी भी बड़ा नहीं हो सकता। केवल बड़े होनेका वहम या धोखा हो जाता है और वास्तवमें असली बड़पन—(परमात्मप्राप्ति)—से वंचित हो जाता है। नाशवान् पदार्थोंके कारण माना गया बड़पन कभी टिकता नहीं और परमात्माके कारण होनेवाला बड़पन कभी मिटता नहीं! इसलिये जीव जिसका अंश है, उस सर्वोपरि परमात्माको प्राप्त करनेसे ही वह बड़ा होता है। इतना बड़ा होता है कि देवतालोग भी उसका आदर करते हैं और कामना करते हैं कि वह हमारे लोकमें आये। इतना ही नहीं, स्वयं

भगवान् भी उसके अधीन हो जाते हैं!

‘मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति’—

भगवान्ने जिस प्रकार इसी श्लोकके पूर्वार्धमें जीवको अपनेमें स्थित न कहकर उसको अपना अंश बताया है, उसी प्रकार श्लोकके उत्तरार्धमें मन तथा इन्द्रियोंको प्रकृतिका अंश न कहकर उनको प्रकृतिमें स्थित बताया है। तात्पर्य है कि भगवान्का अंश जीव सदा भगवान्में ही स्थित है और प्रकृतिमें स्थित मन तथा इन्द्रियाँ प्रकृतिके ही अंश हैं। मन और इन्द्रियोंको अपना मानना, उनसे अपना सम्बन्ध मानना ही उनको आकर्षित करना है।

यहाँ बुद्धिका अन्तर्भाव ‘मन’ शब्दमें (जो अन्तः—करणका उपलक्षण है) और पाँच कर्मैन्द्रियों तथा पाँच प्राणोंका अन्तर्भाव ‘इन्द्रिय’ शब्दमें मान लेना चाहिये। उपर्युक्त पदोंमें भगवान् कहते हैं कि मेरा अंश जीव मेरेमें स्थित रहता हुआ भी भूलसे अपनी स्थिति शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धिमें मान लेता है। जैसे शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि प्रकृतिका अंश होनेसे कभी प्रकृतिसे पृथक् नहीं होते, ऐसे ही जीव भी मेरा अंश होनेसे कभी मेरेसे पृथक् होता नहीं, हो सकता नहीं। परन्तु यह जीव मेरेसे विमुख होकर मुझे भूल गया है।

यहाँ मन और पाँच ज्ञानैन्द्रियोंका नाम लेनेका तात्पर्य यह है कि इन छहोंसे सम्बन्ध जोड़कर ही जीव बँधता है। अतः साधकको चाहिये कि वह शरीर-इन्द्रियाँ—मन—बुद्धिको संसारके अर्पण कर दे अर्थात् संसारकी सेवामें लगा दे और अपने—आपको भगवान्के अर्पण कर दे।

विशेष बात

(१)

मनुष्य भूलसे शरीर, स्त्री, पुत्र, धन, मकान, मान, बड़ाई आदि नाशवान् वस्तुओंको अपनी और अपने लिये मानकर दुःखी होता है। इससे भी नीची बात यह है कि इस सामग्रीके भोग और संग्रहको लेकर वह अपनेको बड़ा मानने लगता है; जबकि वास्तवमें इनको अपना मानते ही इनका गुलाम हो जाता है। हमें पता लगे या न लगे, हम जिन पदार्थोंकी आवश्यकता समझते हैं, जिनमें कोई विशेषता या महत्त्व देखते हैं या जिनकी हम गरज रखते हैं, वे (धन, विद्या आदि) पदार्थ हमसे बड़े और हम उनसे तुच्छ हो ही गये। पदार्थोंके मिलनेमें जो अपना महत्त्व समझता है, वह वास्तवमें तुच्छ ही है, चाहे उसे पदार्थ मिलें या न मिलें।

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