श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 976, कुल 1299 में से
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- साधक-संजीवनी *
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भगवान्का दास होनेपर भगवान् कहते हैं—‘मैं तो हूँ भगतनका दास, भगत मेरे मुकुटमणि’! परंतु जिनके हम दास बने हुए हैं, वे धनादि जड़ पदार्थ कभी नहीं कहते—‘लोभी मेरे मुकुटमणि’! वे तो केवल हमें अपना दास ही बनाते हैं। वास्तवमें भगवान्को अपना जानकर उनके शरण हो जानेसे ही मनुष्य बड़ा बनता है, ऊँचा उठता है। इतना ही नहीं; भगवान् ऐसे भक्तको अपनेसे भी बड़ा मान लेते हैं और कहते हैं—
अहं भक्तपराधीनो ह्यस्वतन्त्र इव द्विज। साधुभिर्गस्तह्वयो भक्तैर्भक्तजनप्रियः ॥
(श्रीमद्भागवत १।४।६३)
हे द्विज! मैं भक्तोंके पराधीन हूँ, स्वतन्त्र नहीं। भक्तजन मेरेको अत्यन्त प्यारे हैं। मेरे हृदयपर उनका पूर्ण अधिकार है। कोई भी सांसारिक व्यक्ति, पदार्थ क्या हमें इतनी बड़ाई दे सकता है?
यह जीव परमात्माका अंश होते हुए भी प्रकृतिके अंश शरीरादिको अपना मानकर स्वयं अपना अपमान करता है और अपनेको नीचे गिराता है। अगर मनुष्य इन शरीर, इन्द्रियाँ, मन आदि सांसारिक पदार्थोंका दास न बने, तो वह भगवान्का भी इष्ट हो जाय—‘इष्टोऽसि मे दृढमिति’ (गीता १८।६४)। जिन्होंने भगवान्को प्राप्त कर लिया है, उनको भगवान् अपना प्रिय कहते हैं (गीता—बारहवें अध्यायके तेरहवेंसे उन्नीसवें श्लोकतक)। परंतु जिन्होंने भगवान्को प्राप्त नहीं किया है; किंतु जो भगवान्को प्राप्त करना चाहते हैं, उन साधकोंको तो वे अपना ‘अत्यन्त प्रिय’ कहते हैं—‘भक्तास्तेऽतीव मे प्रियाः’ (गीता १२।२०)। ऐसे परम दयालु भगवान्को, जो साधकोंको ‘अत्यन्त प्रिय’ और सिद्ध भक्तोंको केवल ‘प्रिय’ कहते हैं, मनुष्य अपना नहीं मानता—यह उसका कितना प्रमाद है!
(२)
संसारका एक छोटा-सा अंश शरीर है और परमात्माका अंश स्वयं (जीवात्मा) है। भूल यह होती है कि परमात्माका अंश संसारके अंशके साथ मिलकर संसार और परमात्मा—दोनोंको अपने अनुकूल बनाना चाहता है! साधकका काम है—इस भूलको मिटाना। इसके लिये वह शरीरको तो संसारके अनुकूल बना दे और स्वयं परमात्माके अनुकूल बन जाय। तात्पर्य है कि शरीरको संसारपर छोड़ दे कि जैसी संसारकी मरजी हो, वैसे रखे;
और अपनेको परमात्मापर छोड़ दे कि जैसी परमात्माकी मरजी हो, वैसे रखे।
संसारकी चीज संसारको दे दे और परमात्माकी चीज परमात्माको दे दे—यह ईमानदारी है। इस ईमानदारीका नाम ही ‘मुक्ति’ है। जिसकी चीज है, उसको न दे; संसारकी चीज भी ले ले और परमात्माकी चीज भी ले ले—यह बेईमानी है। इस बेईमानीका नाम ही ‘बन्धन’ है।
संसारकी चीज संसारपर और परमात्माकी चीज परमात्मापर छोड़कर निश्चिन्त हो जाय। अपनी कोई कामना न रखे। न जीनेकी कामना रखे, न मरनेकी। भगवान् ऐसा कर देते तो ठीक रहता; भगवान् वर्षा कर देते तो ठीक रहता; गरमी ज्यादा पड़ रही है, थोड़ी कम कर देते तो अच्छा था; बाढ़ आ गयी, वर्षा कम करते तो ठीक रहता—इस तरह मनुष्य परमात्माको भी अपने अनुकूल बनाना चाहता है और संसारको भी। इस बातको छोड़कर अपने-आपको सर्वथा भगवान्के अर्पित कर दे और भगवान्से कह दे कि हे नाथ! आप मेरेको पृथ्वीपर रखें या स्वर्गमें रखें अथवा नरकोंमें रखें; बालक रखें या जवान रखें अथवा बूढ़ा रखें; अपमानित रखें या सम्मानित रखें; सुखी रखें या दुःखी रखें; जैसी परिस्थितिमें रखना चाहें, वैसे रखें, पर मैं आपको भूलूँ नहीं।
मनुष्य जिस घरको अपना मानता है, जिस कुटुम्बको अपना मानता है, जिन रूपयोंको अपना मानता है, उनकी ही चिन्ता उसको होती है। संसारमें लाखों-करोड़ों घर हैं, अरबों आदमी हैं, अनगिनत रूपये हैं, पर उनकी चिन्ता नहीं होती; क्योंकि उनको वह अपना नहीं मानता। जिनको अपना नहीं मानता, उनसे तो मुक्त है ही। अतः ज्यादा मुक्ति तो हो चुकी है, थोड़ी-सी ही मुक्ति बाकी है!
विचार करना चाहिये कि जिन थोड़ी-सी चीजोंको हम अपनी मानते हैं, वे कौन-सी सदा साथ रहनेवाली हैं! चीजें तो रहेंगी नहीं, पर बन्धन (उनका सम्बन्ध) रह जायगा, जो जन्म-जन्मान्तरतक साथ रहेगा। इसलिये साधकको चाहिये कि वह या तो शरीरको संसारके अर्पण कर दे, जो कर्मयोग है; चाहे अपनेको शरीर-संसारसे सर्वथा अलग कर ले, जो ज्ञानयोग है; और चाहे अपनेको भगवान्के अर्पण कर दे, जो भक्तियोग है। इन तीनोंमेंसे कोई भी साधन अपना ले, तीनोंका फल एक ही होगा।