श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १५ ]
परिशिष्ट भाव —यहाँ भगवान्ने जिसको अपना अंश कहा है, उसीको सातवें अध्यायके पाँचवें श्लोकमें अपनी 'परा प्रकृति' कहा है। इसलिये दोनों ही जगह 'जीवभूत' (जीव बना हुआ) शब्द आया है—'जीवभूतः', 'जीवभूताम्'। परा और अपरा—दोनों भगवान्की शक्तियाँ हैं (गीता—सातवें अध्यायका चौथा-पाँचवाँ श्लोक)। जबसे पराकी दृष्टि भगवान्से हटकर अपराकी तरफ चली गयी, तबसे परा जन्म-मरणके चक्रमें पड़ गयी। इसी बातको सातवें अध्यायमें 'यथेदं धार्यते जगत्' पदोंसे और यहाँ 'मनःषष्ठीनीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति ॥' पदोंसे कहा गया है।
यद्यपि अपरा भी भगवान्की है, तथापि उसका स्वभाव अलग (परिवर्तनशील) है। इसलिये भगवान्ने अपनेको अपरासे अतीत बताया है—'यस्मात्क्षरमतीतोऽहम्' (गीता १५।१८)। परन्तु परा और भगवान् एक स्वभाववाले (अपरिवर्तनशील) हैं। इसलिये 'ममैवांशः' पदमें 'एव' कहनेका तात्पर्य है कि जीव केवल मेरा (भगवान्का) अंश है, इसमें प्रकृतिका अंश किंचिन्मात्र भी नहीं है। जैसे शरीरमें माता और पिता—दोनोंके अंशका मिश्रण होता है, ऐसे जीवमें मेरा और प्रकृतिके अंशका मिश्रण (संयोग) नहीं है, प्रत्युत यह केवल मेरा अंश है। अतः इसका सम्बन्ध केवल मेरे साथ है, प्रकृतिके साथ नहीं। प्रकृतिके साथ सम्बन्ध तो यह खुद जोड़ता है—'मनःषष्ठीनीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति ॥'
अपरा प्रकृति परमात्माकी है, पर जीवने उसको अपना मान लिया और उससे सुख लेने लग गया, तभी वह बन्धनमें पड़ा है। अपनी न होनेके कारण ही न वस्तुएँ ठहरती हैं, न सुख ठहरता है।
स्थूल, सूक्ष्म और कारण-शरीरके साथ अपना सम्बन्ध मानना ही अनर्थका कारण है। जीव शरीरको अपनी तरफ खींचता है (कर्षति) अर्थात् अपना मानता है, पर जो वास्तवमें अपना है, उस परमात्माको अपना मानता ही नहीं। यही जीवकी मूल भूल है।
जीव ब्रह्म (निर्गुण)-का अंश नहीं है, प्रत्युत ईश्वर (सगुण)-का अंश है—'ईस्वर अंस जीव अबिनासी' (मानस ७।११७।१)। कारण कि ब्रह्म चिन्मय सत्तामात्र है; अतः उसमें अंश-अंशीभाव हो सकता ही नहीं। जीवकी ब्रह्मसे एकता (साधर्म्य) है अर्थात् अनेक रूपसे जो जीव है, वही एक रूपसे ब्रह्म है। शरीरके साथ सम्बन्ध होनेसे वह जीव है और शरीरके साथ सम्बन्ध न होनेसे वह ब्रह्म है। अतः वास्तवमें जीव और ब्रह्म—दोनों ही समग्र भगवान्के अंश हैं। इसलिये भगवान्ने अपनेको ब्रह्मकी प्रतिष्ठा (आधार) बताया है—'ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहम्' (१४।२७) और ब्रह्मको अपने ही समग्र रूपका एक अंग बताया है—'ते ब्रह्म तद्विदुः……' (७।२९-३०)।
मन और इन्द्रियाँ जिसके अंश हैं, उसीमें रहते हैं—'प्रकृतिस्थानि'। इससे जीवको यह शिक्षा लेनी चाहिये कि मैं भी जिसका अंश हूँ, उसीमें निरन्तर रहना चाहिये, उसीके साथ सम्बन्ध जोड़ना चाहिये। यह सम्बन्ध स्वयंको ही जोड़ना पड़ेगा, दूसरा नहीं जोड़ेगा। कारण कि स्वयंने ही जगत्से सम्बन्ध जोड़ा है और स्वयं ही परमात्मासे विमुख हुआ है। जगत्के सम्मुख होने (सम्बन्ध जोड़ने)—में जगत् कारण नहीं है और परमात्मासे विमुख होनेमें परमात्मा कारण नहीं है, प्रत्युत दोनोंमें स्वयं ही कारण है। परमात्माका अंश होनेसे जीव स्वतन्त्र है और इसी स्वतन्त्रताका उसने दुरुपयोग किया है। इसलिये इसका सदुपयोग स्वयंको ही करना पड़ेगा—'उद्धरेदात्मनात्मानम्' (गीता ६।५)।
प्रकृतिके साथ मन और इन्द्रियाँका नित्य और वास्तविक सम्बन्ध है, पर मन और इन्द्रियोंके साथ स्वयं (आत्मा)-का अनित्य और माना हुआ सम्बन्ध है। अनित्य सम्बन्ध कभी स्थायी नहीं रहता, प्रत्युत बदलता और मिटता रहता है। स्वयंका नित्य सम्बन्ध परमात्माके साथ है, जो कभी बदलता और मिटता नहीं। परन्तु अनित्य सम्बन्धको स्वीकार कर लेनेसे उस नित्य सम्बन्धसे विमुखता हो जाती है, जिससे उसका अनुभव नहीं होता।
'ममैवांशो जीवलोकै' पदोंसे यह भाव निकलता है कि हम तो प्रभुको अपना मानते हैं, पर प्रभु हमें अपना जानते हैं! जब जीव भगवान्के शरण हो जाता है, तब वह भी प्रभुको अपना जान लेता है—'मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते' (गीता ७।१४)।
जीव भगवान्का सनातन अंश है; अतः भगवान्के साथ अपना सम्बन्ध जोड़ना अर्थात् उनको अपना मानना ही इसका वास्तविक पुरुषार्थ है। शरीरसे होनेवाले पुरुषार्थमें तो क्रिया मुख्य है, जो केवल संसारके लिये ही होती है; क्योंकि शरीर संसारका अंश है। परन्तु स्वयंसे होनेवाले पुरुषार्थमें भाव मुख्य है। इसलिये बुराईरहित होना, असंग होना, भगवान्को अपना मानना—ये स्वयंके पुरुषार्थ हैं। बुराईरहित होनेसे मनुष्य संसारके लिये उपयोगी हो जाता है।