श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 962, कुल 1299 में से
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- साधक-संजीवनी *
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जब मनुष्य स्वयं यह अनुभव कर लेता है कि 'मैं शरीर नहीं हूँ; शरीर मेरा नहीं है', तब कामना, ममता और तादात्म्य—तीनों मिट जाते हैं। यही वास्तविक वैराग्य है।
जिसके भीतर दृढ़ वैराग्य है उसके अन्तःकरणमें सम्पूर्ण वासनाओंका नाश हो जाता है। अपने स्वरूपसे विजातीय (जड़) पदार्थ—शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदिसे किंचिन्मात्र भी अपना सम्बन्ध न मानकर—'सबका कल्याण हो, सब सुखी हों, सब नीरोग हों, कभी किसीको किंचिन्मात्र भी दुःख न हो'—इस भावका रहना ही दृढ़ वैराग्यका लक्षण है।
'यह'-(इदम्-) रूपसे जाननेमें आनेवाले स्थूल, सूक्ष्म और कारण-शरीरसहित सम्पूर्ण संसारको जाननेवाला 'मैं' (अहम्) कहलाता है। 'यह' (जाननेमें आनेवाला दृश्य) और 'मैं' (जाननेवाला द्रष्टा) कभी एक नहीं हो सकते—यह नियम है। इस प्रकार संसार और शरीर नष्ट होनेवाले हैं और मैं (स्वयं) अविनाशी हैं—इस विवेकका आदर करते हुए अपने-आपको संसार और शरीरसे सर्वथा अलग अनुभव करना ही असंग-शस्त्रके द्वारा संसारवृक्षका छेदन करना है। इस विवेकको महत्त्व न देनेके कारण ही संसार दृढ़ मूलोंवाला प्रतीत होता है।
सांसारिक वस्तुओंका अत्यन्ताभाव अर्थात् सर्वथा नाश तो नहीं हो सकता, पर उनमें रागका सर्वथा अभाव हो सकता है। अतः 'छेदन' का तात्पर्य सांसारिक वस्तुओंका नाश करना नहीं, प्रत्युत उनसे अपना राग हटा लेना है। संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर संसारका अपने लिये सर्वथा अभाव हो जाता है, जिसे 'आत्यन्तिक प्रलय' भी कहते हैं। जो हमारा स्वरूप नहीं है तथा जिसके साथ हमारा वास्तविक सम्बन्ध नहीं है, उसीका त्याग (छेदन) होता है। हम स्वरूपतः चेतन और अविनाशी हैं एवं संसार जड़ और विनाशी है; अतः संसारसे हमारा सम्बन्ध अवास्तविक और भूलसे माना हुआ है। स्वरूपसे हम संसारसे असंग ही हैं। पहलेसे ही जो असंग है, वही असंग होता है—यह नियम है।
परिशिष्ट भाव —भगवान्ने अपने विषयमें कहा है—'अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च' (गीता १०।२०), 'सर्गाणामादिन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुन' (गीता १०।३२) और यहाँ संसारके विषयमें कहते हैं—'नान्तो न चादिनं च सम्प्रतिष्ठता।' तात्पर्य है कि भगवान् आदिमें भी हैं, अन्तमें भी हैं और मध्यमें भी हैं; परन्तु संसार न आदिमें है, न अन्तमें है और न मध्यमें ही है; अर्थात् संसार है ही नहीं—'नासतो विद्यते भावः' (गीता २।१६)। अतः एक
अतः संसारसे हमारी असंगता स्वतःसिद्ध है—इस वास्तविकताको दृढ़तासे मान लेना चाहिये। संसार कितना ही सुविरुद्धमूल क्यों न हो, उसके साथ अपना सम्बन्ध न माननेसे वह स्वतः कट जाता है; क्योंकि संसारके साथ अपना सम्बन्ध है नहीं, केवल माना हुआ है। अतः संसारके साथ अपना सम्बन्ध न माननेसे उसका छेदन हो जाता है—इसमें साधकको सन्देह नहीं करना चाहिये; चाहे (आरम्भमें) व्यवहारमें ऐसा दिखायी दे या न दे।
जीवने अपनी भूलसे शरीर-संसारसे सम्बन्ध माना था। इसलिये इसका छेदन करनेकी जिम्मेवारी भी जीवपर ही है। अतः भगवान् इसे ही छेदन करनेके लिये कह रहे हैं।
संसारसे सम्बन्ध-विच्छेदके कुछ सुगम उपाय
(१) कुछ भी लेनेकी इच्छा न रखकर संसारसे प्राप्त सामग्रीको संसारकी सेवामें ही लगा देना।
(२) सांसारिक सुख-(भोग और संग्रह-) की कामनाका सर्वथा त्याग करना।
(३) संसारके आश्रयका सर्वथा त्याग करना।
(४) शरीर-संसारसे 'मैं' और 'मेरा'-पनको बिलकुल हटा लेना।
(५) मैं भगवान्का हूँ; भगवान् मेरे हैं—इस वास्तविकतापर दृढ़तासे डटे रहना।
(६) मुझे एक परमात्माकी तरफ ही चलना है—ऐसे दृढ़ निश्चय-(व्यवसायात्मिका बुद्धि-) का होना।
(७) शास्त्रविहित अपने-अपने कर्तव्य-कर्मो-(स्वधर्म-) का तत्परतापूर्वक पालन करना१ (गीता १८।४५)।
(८) बचपनमें शरीर, पदार्थ, परिस्थिति, विद्या, सामर्थ्य आदि जैसे थे, वैसे अब नहीं हैं अर्थात् वे सब-के-सब बदल गये, पर मैं 'स्वयं' वही हूँ, बदला नहीं—अपने इस अनुभवको महत्त्व देना।
(९) संसारसे माने हुए सम्बन्धका सदभाव (सत्ताभाव) मिटाना।
१-सर्वं भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग् भवेत्॥
२-धर्मं ते बिरति जोगं ते ग्याना। ग्यान मोच्छप्रदं वेदं बखाना॥ (मानस ३।१६।१)