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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १५ ]

लिये पाप करनेमें कोई खराबी नहीं; यह तो व्यापार है, इसमें झूठ बोलना, ठगना आदि सब उचित है' इत्यादि। इस दुर्भावका होना ही तादात्म्य, ममता और कामनारूप मूलोंका दृढ़ होना है। इस प्रकारके दूषित भावोंके दृढ़मूल होनेसे मनुष्य वैसा ही बन जाता है (गीता—सत्रहवें अध्यायका तीसरा श्लोक)।

ये तादात्म्य, ममता और कामनारूप मूल अन्तःकरणमें इतनी दृढ़तासे जमे हुए हैं कि पढ़ने, सुनने तथा विचार-विवेचन करनेपर भी सर्वथा नष्ट नहीं होते। साधक प्रायः कहा करते हैं कि सत्संग-चर्चा सुनते समय तो इन दोषोंके त्यागकी बात अच्छी और सुगम लगती है; परन्तु व्यवहारमें आनेपर ऐसा होता नहीं। इनको छोड़ना तो चाहते हैं, पर ये छूटते नहीं। इन दोषोंके न छूटनेमें खास कारण है—सांसारिक सुख लेनेकी इच्छा। साधकसे भूल यह होती है कि वह सांसारिक सुख भी लेना चाहता है और साथ ही दोषोंसे भी बचना चाहता है। जैसे लोभी व्यक्ति विषयुक लड़्डुओंकी मिठासको भी लेना चाहे और साथ ही विषसे भी बचना चाहे! ऐसा कभी सम्भव नहीं है। संसारसे कभी किंचिन्मात्र भी सुखकी आशा न रखनेपर इसका दृढ़मूल स्वतः नष्ट हो जाता है।

दूसरी बात यह है कि 'तादात्म्य, ममता और कामनाका मिटना बहुत कठिन है'—साधककी यह मान्यता ही इन दोषोंको मिटने नहीं देती। वास्तवमें तो ये स्वतः मिट रहे हैं। किसी भी मनुष्यमें ये दोष सदा नहीं रहते; उत्पन्न और नष्ट होते रहते हैं; किंतु अपनी मान्यताके कारण ये स्थायी दीखते हैं। अतः साधकको चाहिये कि वह इन दोषोंके मिटनेको कभी कठिन न माने।

'असंगशस्त्रेण दृढेन छिन्त्वा' —भगवान् कहते हैं कि यद्यपि इस संसारवृक्षके अवान्तर मूल बहुत दृढ़ हैं, फिर भी इनको दृढ़ असंगतारूप शस्त्रके द्वारा काटा जा सकता है। किसी भी स्थान, व्यक्ति, वस्तु, परिस्थिति आदिके प्रति मनमें आकर्षण, सुख-बुद्धिका होना और उनके सम्बन्धसे अपने-आपको बड़ा तथा सुखी मानना; पदार्थोंके प्राप्त होने अथवा संग्रह होनेपर प्रसन्न होना—यही 'संग' कहलाता है। इसका न होना ही असंगता अर्थात् वैराग्य है। वैराग्यके दो प्रकार हैं—(१) साधारण वैराग्य और (२) दृढ़ वैराग्य। दृढ़ वैराग्यको उपरति अथवा 'पर वैराग्य' भी कहते हैं।

वैराग्य-सम्बन्धी विशेष बात

वैराग्यके अनेक रूप हैं, जो इस प्रकार हैं—

पहला वैराग्य धन, मकान, जमीन आदि पदार्थोंसे होता है। इन पदार्थोंका स्वरूपसे त्याग कर देनेपर भी अगर मनमें उनका महत्त्व बना हुआ है और 'मैं त्यागी हूँ'—ऐसा अभिमान है, तो वास्तवमें यह वैराग्य नहीं है। अन्तःकरणमें जड़-पदार्थोंका किंचिन्मात्र भी महत्त्व और आकर्षण न रहे—यही वैराग्य है।

दूसरा वैराग्य अपने कहलानेवाले माता, पिता, स्त्री, पुत्र, भाई, भौजाई आदि-(परिवार-से) होता है। उनकी सेवा करने या उनको सुख पहुँचानेके लिये ही उनसे अपना सम्बन्ध मानना चाहिये। अपने सुखके लिये उनसे किंचिन्मात्र भी अपना सम्बन्ध न मानना ही बन्धु-बान्धवोंसे वैराग्य है।

तीसरा और वास्तविक वैराग्य अपने शरीरसे होता है। अगर शरीरसे सम्बन्ध बना हुआ है तो सम्पूर्ण संसारसे सम्बन्ध बना हुआ है; क्योंकि शरीर संसारका ही बीज अथवा अंश है। शरीरसे तादात्म्य न रहना ही शरीरसे वैराग्य है।

तादात्म्य (शरीरके साथ मानी हुई एकता अर्थात् अहंता)-का नाश करनेके लिये साधकको पहले मान, प्रतिष्ठा, पूजा, धन आदिकी कामनाका त्याग करना चाहिये। इनकी कामनाका त्याग करनेपर भी (शरीरके) 'नाम' में ममता रहनेके कारण यश, कीर्ति, बड़ाई आदिकी कामना रह जाती है। इसके कारण मरनेके बाद भी अपने नामकी कीर्ति, अपना स्मारक बननेकी चाह आदि सूक्ष्म कामनाएँ रह जाती हैं। इन सब कामनाओंका नाश करना आवश्यक है। कहीं-कहीं साधकके भीतर दूसरोंकी प्रशंसा सुनकर, दूसरोंकी बड़ाई देखकर ईर्ष्याका भाव जाग्रत् हो जाता है। अतः इसका भी नाश करना आवश्यक है।

उपर्युक्त कामनाओंका नाश करनेके बाद शरीरमें ममता रह जाती है। यह ममताका सम्बन्ध मृत्युके बाद भी बना रहता है। इसी कारण मृत शरीरको जला देनेके बाद भी हडिडयोंको गंगाजीमें डालनेसे जीव-(जिसने शरीरमें ममता की है)-की आगे गति होती है। 'विवेक' (जड़-चेतन, प्रकृति-पुरुष अथवा शरीर-शरीरीकी भिन्नताका ज्ञान) जाग्रत् होनेपर ममताका नाश हो जाता है। कामना और ममता—दोनोंका नाश होनेके बाद तादात्म्य (अहंता) नष्टप्राय हो जाता है अर्थात् बहुत सूक्ष्म रह जाता है। तादात्म्यका अत्यन्ताभाव भगवत्प्रेमकी प्राप्ति होनेपर होता है।

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