श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 960, कुल 1299 में से
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- साधक-संजीवनी *
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मनुष्य किसी विशाल प्रदर्शनीमें तरह-तरहकी वस्तुओंको देखकर मुग्ध हुआ घूमता रहे, तो वह उस प्रदर्शनीका आदि-अन्त नहीं जान सकता। उस प्रदर्शनीसे बाहर निकलनेपर ही वह उसके आदि-अन्तको जान सकता है। इसी तरह संसारसे सम्बन्ध मानकर भोगोंकी तरफ वृत्ति रखते हुए इस संसारका आदि-अन्त कभी जाननेमें नहीं आ सकता।
मनुष्यके पास संसारके आदि-अन्तका पता लगानेके लिये जो साधन (इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि) हैं, वे सब संसारके ही अंश हैं। यह नियम है कि कार्य अपने कारणमें विलीन तो हो सकता है, पर उसको जान नहीं सकता। जैसे मिट्टीका घड़ा पृथ्वीको अपने भीतर नहीं ला सकता, ऐसे ही व्यक्ति इन्द्रियों-मन-बुद्धि समष्टि संसार और उसके कार्यको अपनी जानकारीमें नहीं ला सकते। अतः संसारसे (मन, बुद्धि, इन्द्रियोंसे भी) अलग होनेपर ही संसारका स्वरूप ('स्वयं' के द्वारा) ठीक-ठीक जाना जा सकता है।
वास्तवमें संसारकी स्वतन्त्र सत्ता (स्थिति) है ही नहीं। केवल उत्पत्ति और विनाशका क्रममात्र है। संसारका यह उत्पत्ति-विनाशका प्रवाह ही 'स्थिति' रूपसे प्रतीत होता है। वास्तवमें देखा जाय तो उत्पत्ति भी नहीं है, केवल नाश-ही-नाश है। जिसका स्वरूप एक क्षण भी स्थायी न रहता हो, ऐसे संसारकी प्रतिष्ठा (स्थिति) कैसी? संसारसे अपना माना हुआ सम्बन्ध छोड़ते ही उसका अपने लिये अन्त हो जाता है और अपने वास्तविक स्वरूप अथवा परमात्मामें स्थिति हो जाती है।
विशेष बात
इस संसारके आदि, मध्य और अन्तका पता आजतक कोई वैज्ञानिक नहीं लगा सका और न ही लगा सकता है। संसारसे सम्बन्ध रखते हुए अथवा सांसारिक भोगोंको भोगते हुए संसारके आदि, मध्य और अन्तको ढूँढ़ना चाहें, तो कोल्हूके बैलकी तरह उग्रभर घूमते रहनेपर भी कुछ हाथ आनेका नहीं।
वास्तवमें इस संसारके आदि, मध्य और अन्तका पता लगानेकी जरूरत भी नहीं है। जरूरत संसारसे अपने माने हुए सम्बन्धका विच्छेद करनेकी ही है।
संसार अनादि-सान्त है या अनादि-अनन्त है अथवा
प्रतीतिमात्र है, इत्यादि विषयोंपर दार्शनिकोंमें अनेक मतभेद हैं; परन्तु संसारके साथ हमारा सम्बन्ध असत् है, जिसका विच्छेद करना आवश्यक है—इस विषयपर सभी दार्शनिक एकमत हैं।
संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद करनेका सुगम उपाय है—संसारसे प्राप्त (मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ, शरीर, धन, सम्पत्ति आदि) सम्पूर्ण सामग्रीको 'अपनी' और 'अपने लिये' न मानते हुए उसको संसारकी ही सेवामें लगा देना।
सांसारिक स्त्री, पुत्र, मान, बड़ाई, धन, सम्पत्ति, आयु, नीरोगता आदि कितने ही प्राप्त हो जायें; यहाँतक कि संसारके समस्त भोग एक ही मनुष्यको मिल जायें, तो भी उनसे मनुष्यको तृप्ति नहीं हो सकती; क्योंकि जीव स्वयं अविनाशी है और सांसारिक भोग नाशवान् हैं। नाशवान्से अविनाशी कैसे तृप्त हो सकता है?
'अश्वत्थमेन सुविरूढमूलम्' —संसारको 'सुविरूढ-मूलम्' कहनेका तात्पर्य यह है कि तादात्म्य, ममता और कामनाके कारण यह संसार (प्रतिष्ठा रहित होनेपर भी) दृढ़ मूलोंवाला प्रतीत हो रहा है।
व्यक्ति, पदार्थ, क्रिया आदिमें राग, ममता होनेसे सांसारिक बन्धन अधिक-से-अधिक दृढ़ होता चला जाता है। जिन पदार्थों, व्यक्तियोंमें राग, ममताका घनिष्ठ सम्बन्ध हो जाता है, उनको मनुष्य अपना स्वरूप ही मानने लग जाता है। जैसे, धनमें ममता होनेसे उसकी प्राप्तिमें मनुष्यको बड़ी प्रसन्नता होती है और 'मैं बड़ा धनवान् हूँ'—ऐसा अभिमान हो जाता है। धनके नाशसे वह अपना नाश मानने लग जाता है। लोभ बढ़नेसे धनकी प्राप्तिके लिये वह अन्याय, पाप आदि न करनेलायक काम भी कर बैठता है। फिर इतना लोभ बढ़ जाता है कि उसके भीतर यह दृढ़ निश्चय हो जाता है कि झूठ, कपट, बेईमानी आदिके बिना धन कमाया ही नहीं जा सकता। उसे यह विचार ही नहीं होता कि 'पापसे धन कमाकर मैं यहाँ कितने दिन ठहरूँगा? पापसे कमाया धन तो शरीरके साथ यहाँ छूट जायगा; किंतु धनके लिये किये झूठ, कपट, बेईमानी, चोरी आदि पाप तो मेरे साथ जायेंगे*', जिससे परलोकमें मेरी कितनी दुर्गति होगी!' आदि। इतना ही नहीं, वह दूसरोंको भी प्रेरणा करने लग जाता है कि 'धन कमानेके
- धनानि भूमौ पशवश्च गोष्ठे नारी गृहद्वारि सुताः श्मशाने। देहिश्रुततायां परलोकमार्गं धर्मानुगो गच्छति जीव एकः ॥
'शरीरको छोड़ते समय धन तिजोरीमें पड़ा रह जाता है; पशु जहाँ-तहाँ बँधे रह जाते हैं; स्त्री घरके दरवाजेतक ही साथ देती है; पुत्र श्मशानतक साथ देते हैं तथा शरीर चितातक ही साथ रहता है। उसके बाद परलोकके मार्गमें केवल धर्म ही जीवके साथ जाता है।'