श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १५ ]
जिस वृक्षमें सुन्दर फूल-पत्ते तो हों, पर फल नहीं हों तो वह वृक्ष अनुपयोगी है; क्योंकि वास्तवमें तृप्ति तो फलसे ही होती है, फूल-पत्तोंकी सजावटसे नहीं। इसी प्रकार सुख-भोग चाहनेवाले सकाम पुरुषको भोग-ऐश्वर्यरूप फूल-पत्तोंसे सम्पन्न यह संसारवृक्ष बाहरसे तो सुन्दर प्रतीत होता है, पर इससे सुख चाहनेके कारण उसको अक्षय सुखरूप तृप्ति अर्थात् महान् आनन्दकी प्राप्ति नहीं होती। वेदविहित पुण्यकर्मोंका अनुष्ठान स्वर्गादि लोकोंकी कामनासे किया जाय तो वह निषिद्ध कर्मोंको करनेकी अपेक्षा श्रेष्ठ तो है, पर उन कर्मोंसे मुक्ति नहीं हो सकती; क्योंकि फलभोगके बाद पुण्यकर्म नष्ट हो जाते हैं और उसे पुनः संसारमें आना पड़ता है (गीता—नवें अध्यायका इक्कीसवाँ श्लोक)। इस प्रकार सकाम-कर्म और उसका फल—दोनों ही उत्पन्न और नष्ट होनेवाले हैं। अतः साधकको इन (दोनों) से सर्वथा असंग होकर एकमात्र परमात्मतत्त्वको ही प्राप्त करना चाहिये।
पते वृक्षकी शाखासे उत्पन्न होनेवाले तथा वृक्षकी रक्षा और वृद्धि करनेवाले होते हैं। पत्तोंसे वृक्ष सुन्दर दीखता है तथा दृढ़ होता है (पत्तोंके हिलनेसे वृक्षका मूल, तना एवं शाखाएँ दृढ़ होती हैं)। वेद भी इस संसारवृक्षकी मुख्य शाखारूप ब्रह्माजीसे प्रकट हुए हैं और वेदविहित कर्मोंसे ही संसारकी वृद्धि और रक्षा होती है। इसलिये वेदोंको पत्तोंका स्थान दिया गया है। संसारमें सकाम (काम्य) कर्मोंसे स्वर्गादिमें देव-योनियों प्राप्त होती हैं—यह संसारवृक्षका बड़ना है। स्वर्गादिमें नन्दनवन, सुन्दर विमान, रमणीय अप्सराएँ आदि हैं—यह संसारवृक्षके सौन्दर्यकी प्रतीति है। सकाम-कर्मोंको करते रहनेसे बारम्बार जन्म-मरण होता रहता है—यह संसारवृक्षका दृढ़ होना है।
इन पदोंसे भगवान् यह कहना चाहते हैं कि साधकको सकामभाव, वैदिक सकाम-कर्मानुष्ठानरूप पत्तोंमें न फँसकर संसारवृक्षके मूल—परमात्माका ही आश्रय लेना चाहिये। परमात्माका आश्रय लेनेसे वेदोंका वास्तविक तत्त्व भी जाननेमें आ जाता है। वेदोंका वास्तविक तत्त्व संसार या स्वर्ग नहीं, प्रत्युत परमात्मा ही हैं (गीता—पन्द्रहवें अध्यायका पन्द्रहवाँ श्लोक)।१)
‘यस्तं वेद स वेदवित्’—उस संसारवृक्षको जो
मनुष्य जानता है, वह सम्पूर्ण वेदोंके यथार्थ तात्पर्यको जाननेवाला है। संसारको क्षणभंगुर (अनित्य) जानकर इससे कभी किंचिन्मात्र भी सुखकी आशा न रखना—यही संसारको यथार्थरूपसे जानना है। वास्तवमें संसारको क्षणभंगुर जान लेनेपर सुखभोग हो ही नहीं सकता। सुखभोगके समय संसार क्षणभंगुर नहीं दीखता। जबतक संसारके प्राणी-पदार्थोंको स्थायी मानते रहते हैं, तभीतक सुखभोग, सुखकी आशा और कामना तथा संसारका आश्रय, महत्त्व, विश्वास बना रहता है। जिस समय यह अनुभव हो जाता है कि संसार प्रतिक्षण नष्ट हो रहा है, उसी समय उससे सुख लेनेकी इच्छा मिट जाती है और साधक उसके वास्तविक स्वरूपको जानकर (संसारसे विमुख और परमात्माके सम्मुख होकर) परमात्मासे अपनी अभिन्नताका अनुभव कर लेता है। परमात्मासे अभिन्नताका अनुभव होनेमें ही वेदोंका वास्तविक तात्पर्य है। जो मनुष्य संसारसे विमुख होकर परमात्मतत्त्वसे अपनी अभिन्नता (जो कि वास्तवमें है)—का अनुभव कर लेता है, वही वास्तवमें ‘वेदवित्’ है। वेदोंके अध्ययनमात्रसे मनुष्य वेदोंका विद्वान् तो हो सकता है, पर यथार्थ वेदवेत्ता नहीं। वेदोंका अध्ययन न होनेपर भी जिसको (संसारसे सम्बन्ध-विच्छेदपूर्वक) परमात्मतत्त्वकी अनुभूति हो गयी है, वही वास्तवमें वेदवेत्ता (वेदोंके तात्पर्यको अनुभवमें लानेवाला) है।
भगवान्ने इसी अध्यायके पन्द्रहवें श्लोकमें अपनेको ‘वेदवित्’ कहा है। यहाँ वे संसारके तत्त्वको जाननेवाले पुरुषको ‘वेदवित्’ कहकर उससे अपनी एकता प्रकट करते हैं। तात्पर्य यह है कि मनुष्य-शरीरमें मिले विवेककी इतनी महिमा है कि उससे जीव संसारके यथार्थ तत्त्वको जानकर भगवान्के सद्गुण वेदवेत्ता बन सकता है१)।
परमात्माका ही अंश होनेके कारण जीवका एकमात्र वास्तविक सम्बन्ध परमात्मासे है। संसारसे तो इसने भूलसे अपना सम्बन्ध माना है, वास्तवमें है नहीं। विवेकके द्वारा इस भूलको मिटाकर अर्थात् संसारसे माने हुए सम्बन्धका त्याग करके एकमात्र अपने अंशी परमात्मासे अपनी स्वतःसिद्ध अभिन्नताका अनुभव करनेवाला ही संसारवृक्षके यथार्थ तत्त्वको जाननेवाला है; और उसीको भगवान् यहाँ ‘वेदवित्’ कहते हैं।
१-‘सर्वे वेदा यत् पदमामनन्ति’ (कठोपनिषद् १।२।१५)
‘सम्पूर्ण वेद जिस परमपद परमात्माका बारम्बार प्रतिपादन करते हैं।’
२-‘मम साधर्म्यमागताः’ (गीता १४।२) में भी यही बात कही गयी है।