श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- साधक-संजीवनी *
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मुक्त हैं। ब्रह्माजीके सिवाय दूसरे सम्पूर्ण जीव प्रकृति और उसके कार्य शरीरादिके साथ अहंता-ममतापूर्वक जितना-जितना अपना सम्बन्ध मानते हैं, उतने-उतने ही वे बन्धनमें पड़े हुए हैं और उनका बार-बार पतन (जन्म-मरण) होता रहता है अर्थात् उतनी ही शाखाएँ नीचेकी ओर फैलती रहती हैं। सात्त्विक, राजस और तामस—ये तीनों गतियाँ ‘अधःशाखम्’ के ही अन्तर्गत हैं (गीता—चौदहवें अध्यायका अठारहवाँ श्लोक)।
‘अश्वत्थम्’—‘अश्वत्थम्’ शब्दके दो अर्थ हैं—(१) जो कल दिनतक भी न रह सके और (२) पीपलका वृक्ष। पहले अर्थके अनुसार—‘अश्वत्थ’ पदका तात्पर्य यह है कि संसार एक क्षण’ भी स्थिर रहनेवाला नहीं है। केवल परिवर्तनके समूहका नाम ही संसार है। परिवर्तनका जो नया रूप सामने आता है, उसको उत्पत्ति कहते हैं; थोड़ा और परिवर्तन होनेपर उसको स्थितिरूपसे मान लेते हैं और जब उस स्थितिका स्वरूप भी परिवर्तित हो जाता है, तब उसको समाप्ति (प्रलय) कह देते हैं। वास्तवमें इसकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय होते ही नहीं। इसलिये इसमें प्रतिक्षण परिवर्तन होनेके कारण यह (संसार) एक क्षण भी स्थिर नहीं है। दृश्यमात्र प्रतिक्षण अदर्शनमें जा रहा है। इसी भावसे इस संसारको ‘अश्वत्थम्’ कहा गया है।
दूसरे अर्थके अनुसार—यह संसार पीपलका वृक्ष है। शास्त्रोंमें अश्वत्थ अर्थात् पीपलके वृक्षकी बहुत महिमा गायी गयी है। स्वयं भगवान् भी सब वृक्षोंमें ‘अश्वत्थ’ को अपनी विभूति कहकर उसको श्रेष्ठ एवं पूज्य बताते हैं—‘अश्वत्थः सर्ववृक्षाणाम्’ (गीता १०।२६)। पीपल, आँवला और तुलसी—इनकी भगवद्वाचपूर्वक पूजा करनेसे वह भगवान्की पूजा हो जाती है।
परमात्मासे संसार उत्पन्न होता है। वे ही संसारके अभिन्ननिमित्तोपादान कारण हैं। अतः संसाररूपी पीपलका वृक्ष भी तत्त्वतः परमात्मस्वरूप होनेसे पूजनीय है। इस संसाररूप पीपलवृक्षकी पूजा यही है कि इससे सुख लेनेकी इच्छाका त्याग करके केवल इसकी सेवा करना।
१-‘श्वः’ पर्यन्तं न तिष्ठतीति अश्वत्थः’—‘श्वम्’ अव्यय आनेवाले कलका वाचक है। जो कलतक स्थिर रहे, उसे ‘श्वत्थ’ तथा जो कलतक स्थिर न रहे, उसे ‘अश्वत्थ’ कहते हैं।
२-‘क्षण’ का विवेचन दार्शनिकोंने इस प्रकार किया है—कमलके पत्तेपर सूई मारी जाय तो सूईके दूसरी तरफ निकलनेमें तीन क्षण लगते हैं—पहले क्षणमें स्पर्श, दूसरे क्षणमें छेदन और तीसरे क्षणमें पार निकलना।
३-वेदोंमें सकाम मन्त्रोंकी संख्या तो अस्सी हजार है, पर मुक्त करनेवाले मन्त्रोंकी संख्या बीस हजार ही है, जिसमें चार हजार मन्त्र ज्ञानकाण्डके एवं सोलह हजार मन्त्र उपासनाकाण्डके हैं।
सुखकी इच्छा न रखनेवालेके लिये यह संसार साक्षात् भगवत्स्वरूप है—‘वासुदेवः सर्वम्’ (गीता ७।१९)। परन्तु संसारसे सुखकी इच्छा रखनेवालोंके लिये यह संसार दुःखोंका घर ही है। कारण कि स्वयं अविनाशी है और यह संसारवृक्ष प्रतिक्षण परिवर्तनशील होनेके कारण नाशवान्, अनित्य और क्षणभंगुर है। अतः स्वयंकी कभी इससे तृप्ति हो ही नहीं सकती; किंतु इससे सुखकी इच्छा करके यह बार-बार जन्मता-मरता रहता है। इसलिये संसारसे यत्किंचित् भी स्वार्थका सम्बन्ध न रखकर केवल उसकी सेवा करनेका भाव ही रखना चाहिये।
‘प्राहुरव्ययम्’—संसारवृक्षको अव्यय कहा जाता है। क्षणभंगुर अनित्य संसारका आदि और अन्त न जान सकेनेके कारण, प्रवाहकी निरन्तरता-(नित्यता)-के कारण तथा इसका मूल सर्वशक्तिमान् परमेश्वर नित्य अविनाशी होनेके कारण ही इसे अव्यय कहते हैं। जिस प्रकार समुद्रका जल सूर्यके तापसे भाप बनकर बादल बनता है। फिर आकाशमें ठण्डक पाकर वही जल बादलसे पुनः जलरूपसे पृथ्वीपर आ जाता है। फिर वही जल नदी-नालेका रूप धारण करके समुद्रमें चला जाता है, पुनः समुद्रका जल बादल बनकर बरसता है—ऐसे घूमते हुए जलके चक्रका कभी भी अन्त नहीं आता। इसी प्रकार इस संसार-चक्रका भी कभी अन्त नहीं आता। यह संसार-चक्र इतनी तेजीसे घूमता (बदलता) है कि चलचित्र-(सिनेमा)-के समान अस्थिर (प्रतिक्षण परिवर्तनशील) होते हुए भी स्थिरकी तरह प्रतीत होता है।
यह संसारवृक्ष अव्यय कहा जाता है। (प्राहुः), वास्तवमें यह अव्यय (अविनाशी) है नहीं। अगर यह अव्यय होता तो न तो इसी अध्यायके तीसरे श्लोकमें यह कहा जाता कि इस-(संसार)-का जैसा स्वरूप कहा जाता है, वैसा उपलब्ध नहीं होता; और न इस-(संसारवृक्ष)-को वैराग्यरूप दृढ़ शस्त्रके द्वारा छेदन करनेके लिये ही भगवान् प्रेरणा करते।
‘छन्दांसि यस्य पर्णानि’—वेद इस संसारवृक्षके पत्ते हैं। यहाँ वेदोंसे तात्पर्य वेदोंके उस अंशसे है, जिसमें सकामकर्मके अनुष्ठानोंका वर्णन है। तात्पर्य यह है कि