श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 953, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ें१५२
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १५ ]
श्रीभगवान् बोले—
ऊर्ध्वमूलम् | = ऊपरकी ओर मूलवाले (तथा) | प्राहुः | = कहते हैं (और) | वृक्षको | यः | = जो ---|---|---|---|---|---|--- अधःशाखम् | = नीचेकी ओर शाखावाले | छन्दांसि | = वेद | | वेद | = जानता है, अश्वत्थम् | = (जिस) संसाररूप अश्वत्थवृक्षको | यस्य | = जिसके | | सः | = वह अव्ययम् | = (प्रवाहरूपसे) | पणीनि | = पते हैं, | | वेदवित् | = सम्पूर्ण वेदोंको | | तम् | = उस संसार— | | | जाननेवाला है।
व्याख्या —‘ऊर्ध्वमूलमधःशाखम्’— [तेरहवें अध्यायके आरम्भके दो श्लोकोंकी तरह यहाँ पन्द्रहवें अध्यायके पहले श्लोकमें भी भगवान्ने अध्यायके सम्पूर्ण विषयोंका दिर्दर्शन कराया है और ‘ऊर्ध्वमूलम्’ पदसे परमात्माका, ‘अधःशाखम्’ पदसे सम्पूर्ण जीवोंके प्रतिनिधि ब्रह्माजीका तथा ‘अश्वत्थम्’ पदसे संसारका संकेत करके (संसाररूप अश्वत्थवृक्षके मूल) सर्वशक्तिमान् परमात्माको यथार्थरूपसे जाननेवालेको ‘वेदवित्’ कहा है। ]
साधारणतया वृक्षोंका मूल नीचे और शाखाएँ ऊपरकी ओर होती हैं; परन्तु यह संसारवृक्ष ऐसा विचित्र वृक्ष है कि इसका मूल ऊपर तथा शाखाएँ नीचेकी ओर हैं!
जहाँ जानेपर मनुष्य लौटकर संसारमें नहीं आता, ऐसा भगवान्का परमधाम ही सम्पूर्ण भौतिक संसारसे ऊपर (सर्वोपरि) है। संसारवृक्षकी प्रधान शाखा (तना) ब्रह्माजी हैं; क्योंकि संसारवृक्षकी उत्पत्तिके समय सबसे पहले ब्रह्माजीका उद्भव होता है। इस कारण ब्रह्माजी ही इसकी प्रधान शाखा हैं। ब्रह्मलोक भगवद्भामकी अपेक्षा नीचे है। स्थान, गुण, पद, आयु आदि सभी दृष्टियोंसे परमधामकी अपेक्षा निम्न श्रेणीमें होनेके कारण ही इन्हें ‘अधः’ (नीचेकी ओर) कहा गया है।
यह संसाररूपी वृक्ष ऊपरकी ओर मूलवाला है। वृक्षमें मूल ही प्रधान होता है। ऐसे ही इस संसाररूपी वृक्षमें परमात्मा ही प्रधान हैं। उनसे ब्रह्माजी प्रकट होते हैं, जिनका वर्णन ‘अधःशाखम्’ पदसे हुआ है।
सबके मूल प्रकाशक और आश्रय परमात्मा ही हैं। देश, काल, भाव, सिद्धान्त, गुण, रूप, विद्या आदि सभी दृष्टियोंसे परमात्मा ही सबसे श्रेष्ठ हैं। उनसे ऊपर अथवा श्रेष्ठकी तो बात ही क्या है, उनके समान भी दूसरा कोई नहीं है’ (गीता—न्यारहवें अध्यायका तैतालसीसर्वो श्लोक)। संसारवृक्षके मूल सर्वोपरि परमात्मा हैं। जैसे ‘मूल’ वृक्षका आधार होता है, ऐसे ही ‘परमात्मा’ सम्पूर्ण जगत्के आधार हैं। इसीलिये उस वृक्षको ‘ऊर्ध्वमूलम्’ कहा गया है।
‘मूल’ शब्द कारणका वाचक है। इस संसारवृक्षकी उत्पत्ति और इसका विस्तार परमात्मासे ही हुआ है। वे परमात्मा नित्य, अनन्त और सबके आधार हैं तथा सगुणरूपसे सबसे ऊपर नित्य-धाममें निवास करते हैं, इसलिये वे ‘ऊर्ध्व’ नामसे कहे जाते हैं। यह संसारवृक्ष उन्हीं परमात्मासे उत्पन्न हुआ है, इसलिये इसको ऊपरकी ओर मूलवाला (ऊर्ध्वमूल) कहते हैं।
वृक्षके मूलसे ही तने, शाखाएँ, कोंपलें निकलती हैं। इसी प्रकार परमात्मासे ही सम्पूर्ण जगत् उत्पन्न होता है, उन्हींसे विस्तृत होता है और उन्हींमें स्थित रहता है। उन्हींसे शक्ति पाकर सम्पूर्ण जगत् चेष्टा करता है। ऐसे सर्वोपरि परमात्माकी शरण लेनेसे मनुष्य सदाके लिये कृतार्थ हो जाता है। (शरण लेनेकी बात आगे चौथे श्लोकमें ‘तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये’ पदोंमें कही गयी है)।
सृष्टि-रचनाके लिये ब्रह्माजी प्रकृतिको स्वीकार करते हैं। परन्तु वास्तवमें वे (प्रकृतिसे सम्बन्धरहित होनेके कारण)
१-यहाँ ‘अधःशाखम्’ पदमें ब्रह्माजीसे लेकर कीटपर्यन्त सभी जीवोंका समावेश है।
२-‘न तत्समशचाभ्यधिकश्च दुश्यते।’ (श्वेताश्वतरोपनिषद् ६।८)
उस-(परमात्मा-) से बड़ा और उसके समान भी दूसरा नहीं दीखता।
३-जैसे गीतामें कहा है—‘अहं कृतनस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा’ (७।६), ‘प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम्’ (१।१८); ‘अहं सर्वस्य प्रभवो मतः सर्वं प्रवर्तते’ (१०।८); ‘यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी’ (१५।४) और ‘यतः प्रवृत्तिर्भूतानाम्’ (१८।४६)।