श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 952, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ें॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥
अथ पञ्चदशोऽध्यायः
अवतरणिका—
श्रीमद्भगवद्गीताके बारहवें अध्यायके पहले श्लोकमें ‘सगुण और निर्गुण-उपासकोंमें कौन श्रेष्ठ है?’—इस प्रश्नके उत्तरमें भगवान्ने सगुण-उपासकोंको सर्वश्रेष्ठ योगी बताया। पाँचवें श्लोकमें सगुण और निर्गुण-उपासनाकी तुलना करते हुए भगवान्ने कहा कि देहाभिमानियोंके लिये अत्यन्त अर्थात् निर्गुण-तत्त्वकी उपासना कठिन है। यह देहाभिमान-रूपी बाधा दूर कैसे हो—इस विषयका तथा निर्गुण-तत्त्वका विवेचन भगवान्ने तेरहवें और चौदहवें अध्यायमें किया।
चौदहवें अध्यायके इक्कीसवें श्लोकमें अर्जुनने गुणातीत पुरुषोंके लक्षणों और आचरणोंके साथ-ही-साथ गुणातीत होनेका उपाय पूछा। इसके उत्तरमें भगवान्ने बाईसवेंसे पचीसवें श्लोकतक गुणातीत पुरुषके लक्षणों और आचरणोंका वर्णन करके छब्बीसवें श्लोकमें सगुण-उपासकोंके लिये ‘अव्यभिचारी भक्तियोग’ को गुणातीत होनेका उपाय बताया। तात्पर्य यह है कि भगवान्का अनन्य भक्त (भगवान्पर ही आश्रित और भगवान्को ही अपना माननेके कारण) सुगमतापूर्वक गुणातीत भी हो जाता है। इस (छब्बीसवें) श्लोकमें भगवान्ने ‘अव्यभिचारेण भक्तियोगेन’ पदोंसे व्यभिचारदोष-(संसारके आश्रय-) से रहित भक्तियोगका, ‘यः’ पदसे जीवका और ‘माम्’ पदसे अपना (परमात्माका) सूक्ष्मरूपसे वर्णन किया। इसलिये इन्हीं तीनों विषयोंका अर्थात् संसार, जीव और परमात्माका विस्तृत विवेचन भगवान् इस (पन्द्रहवें) अध्यायमें करते हैं।
जीव स्वरूपतः (परमात्माका अंश होनेसे) गुणातीत होनेपर भी अनादि अज्ञानके कारण गुणोंके प्रभावसे प्रभावित होकर गुणोंके कार्यभूत शरीर-(संसार-) में तादात्म्य, ममता और कामना करके आबद्ध हुआ है। जबतक वह गुणोंसे अतीत (विलक्षण) तत्त्व परमात्माके प्रभावको नहीं जानता, तबतक वह प्रकृतिजन्य गुणोंके प्रभावसे सर्वथा मुक्त नहीं हो सकता। इसलिये भगवान् (अपनी प्राप्तिके प्रिय साधन ‘अव्यभिचारिणी भक्ति’ को प्राप्त कराने हेतु) अपना अत्यन्त गोपनीय और विशेष प्रभाव बतानेके लिये इस (पन्द्रहवें) अध्यायका आरम्भ करते हैं।
जीव परमात्माका अंश है (गीता—पन्द्रहवें अध्यायका सातवाँ श्लोक)। अतः इसका एकमात्र सम्बन्ध अपने अंशी परमात्मासे ही है। परन्तु भूलसे यह अपना सम्बन्ध प्रकृतिके कार्य शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदिसे मान लेता है, जिनसे उसका सम्बन्ध वास्तवमें कभी था नहीं, है नहीं, होगा नहीं और हो सकता ही नहीं। परमात्मासे अपने वास्तविक सम्बन्धको भूलकर शरीरादि विजातीय पदार्थोंको ‘मैं’, ‘मेरा’ और ‘मेरे लिये’ मानना ही व्यभिचार-दोष है। यह व्यभिचार-दोष ही अनन्य भक्तियोगमें खास बाधक है। इस बाधाको दूर करनेके लिये पन्द्रहवें अध्यायके पहले पाँच श्लोकोंके प्रकरणमें भगवान् संसार-वृक्षका वर्णन करके उसका छेदन करनेकी आज्ञा देते हैं।
श्रीभगवानुवाच
ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्। छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् ॥ १ ॥ *
- ऊर्ध्वमूलोऽवाक्शाख एषोऽश्वत्थः सनातनः। तदेव शुक्तं तद् ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते।
तस्मिन्म्लोकाः श्रिताः सर्वे तद्वा नाल्येति कश्चन। एतद्वैतत् ॥ (कठेपनिषद् २।३।१)