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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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पृष्ठ 951

१५० * श्रीमद्भगवद्गीता * [ अध्याय १४

ब्रह्म कहो, चाहे कृष्ण कहो, और कृष्ण कहो, चाहे ब्रह्म

कहो; अविनाशी अमृत कहो, चाहे कृष्ण कहो, और कृष्ण

कहो चाहे अविनाशी अमृत कहो; शाश्वत धर्म कहो, चाहे

कृष्ण कहो और कृष्ण कहो चाहे शाश्वत धर्म कहो;

ऐकान्तिक सुख कहो चाहे कृष्ण कहो; और कृष्ण कहो चाहे

ऐकान्तिक सुख कहो; एक ही बात है। इसमें कोई आधार-

आधेय भाव नहीं है, एक ही तत्त्व है। इसलिये भगवान्‌की

उपासना करनेसे ब्रह्मकी प्राप्ति होती है—यह बात ठीक ही है।

परिशिष्ट भाव—'ब्रह्म तथा अविनाशी अमृतका आश्रय मैं हूँ'—यह निर्गुण-निराकारकी तथा ज्ञानयोगकी बात

है, 'शाश्वतधर्मका आश्रय मैं हूँ'—यह सगुण-साकारकी तथा कर्मयोगकी बात है और 'ऐकान्तिक सुखका आश्रय मैं

हूँ'—यह सगुण-निराकारकी तथा ध्यानयोगकी बात है। तात्पर्य यह हुआ कि मेरी (सगुण-साकारकी) उपासना करनेसे,

मेरा आश्रय लेनेसे ज्ञानयोग, कर्मयोग और ध्यानयोग—तीनों सिद्ध हो जाते हैं। तीनोंसे एक ही तत्त्वकी प्राप्ति होती

है, जिसको 'समग्र' कहते हैं।

जितनी भी विभूतियाँ हैं, वे सब भगवान्‌के ऐश्वर्य हैं। ब्रह्म भी भगवान्‌की एक विभूति है, ऐश्वर्य है। इसलिये

यहाँ भगवान्‌ने कहा है—'ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाऽहम्‌'। पद्मपुराणमें आया है कि भगवान्‌ श्रीकृष्णके ही नखकी एक किरण

'ब्रह्म' है—

यन्नखेनदुरुचिर्ब्रह्म ध्येयं ब्रह्मादिभिः सुरैः। गुणत्रयमतीतं तं वन्दे वृन्दावनेश्वरम्‌॥

(पाताल० ७७। ६०)

'( भगवान्‌ शंकर कहते हैं—) जिनके नखचन्द्रकी कान्तिरूप ब्रह्मका देवतागण ध्यान करते हैं, उन त्रिगुणातीत

वृन्दावनेश्वर भगवान्‌ श्रीकृष्णकी मैं वन्दना करता हूँ।'

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे गुणत्रयविभागयोगो नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥

इस प्रकार ॐ, तत्, सत्—इन भगवान्‌नामोंके उच्चारणपूर्वक ब्रह्मविद्या और योगशास्त्रमय श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषद्रूप

श्रीकृष्णार्जुनसंवादमें 'गुणत्रयविभागयोग' नामक चौदहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १४ ॥

इस अध्यायमें सत्त्व, रज और तम—इन तीनों गुणोंका

विभागपूर्वक वर्णन किया गया है। इन तीनों गुणोंसे अतीत

होनेपर, इनका सम्बन्ध छूटनेपर परमात्माके साथ नित्ययोगका

अनुभव हो जाता है। इसलिये इस अध्यायका नाम

'गुणत्रयविभागयोग' रखा गया है।

चौदहवें अध्यायके पद, अक्षर और उवाच

(१) इस अध्यायमें 'अथ चतुर्दशोऽध्यायः' के तीन,

'श्रीभगवानुवाच' आदि पदोंके छः, श्लोकोंके तीन सौ

बाईस और पुष्पिकाके तेरह पद हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण

पदोंका योग तीन सौ चौवालीस है।

(२) इस अध्यायमें 'अथ चतुर्दशोऽध्यायः' के

आठ, 'श्रीभगवानुवाच' आदि पदोंके बीस, श्लोकोंके

आठ सौ चौंसठ और पुष्पिकाके इक्यावन अक्षर हैं। इस

प्रकार सम्पूर्ण अक्षरोंका योग नौ सौ तैंतालीस है। इस

अध्यायके सभी श्लोक बत्तीस अक्षरोंके हैं।

(३) इस अध्यायमें तीन उवाच हैं—दो 'श्रीभगवानुवाच'

और एक 'अर्जुन उवाच'।

चौदहवें अध्यायमें प्रयुक्त छन्द

इस अध्यायके सत्ताईस श्लोकोंमेंसे—पाँचवें श्लोकके

प्रथम चरणमें 'नगण' प्रयुक्त होनेसे 'न-विपुला'; छठे

और दसवें श्लोकके प्रथम चरणमें 'रगण' प्रयुक्त होनेसे

'र-विपुला'; पन्द्रहवें और सत्रहवें श्लोकके तृतीय चरणमें

'भगण' प्रयुक्त होनेसे 'भ-विपुला'; उन्नीसवें श्लोकके

प्रथम चरणमें 'मगण' प्रयुक्त होनेसे 'म-विपुला'; और

नवें श्लोकके प्रथम चरणमें 'भगण' तथा तीसरे चरणमें

'नगण' प्रयुक्त होनेसे 'संकीर्ण-विपुला' संज्ञावाले छन्द

हैं। शेष बीस श्लोक ठीक 'पथ्यावक्त्र' अनुष्टुप् छन्दके

लक्षणोंसे युक्त हैं।