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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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पृष्ठ 950

श्लोक २७ ]

  • साधक-संजीवनी *

१४९

हि= क्यौंक= तथासुखस्य= सुखका
ब्रह्मणः= ब्रह्मकाशाश्वतस्य= शाश्वतप्रतिष्ठा= आश्रय
= औरधर्मस्य= धर्मकाअहम्= मैं
अव्ययस्य= अविनाशी= और(ही हूँ)।
अमृतस्य= अमृतकाऐकान्तिकस्य= ऐकान्तिक

व्याख्या—‘ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहम्’ —मैं ब्रह्मकी प्रतिष्ठा, आश्रय हूँ—ऐसा कहनेका तात्पर्य ब्रह्मसे अपनी अभिन्नता बतानेमें है। जैसे जलती हुई अग्नि साकार है और काष्ठ आदिमें रहनेवाली अग्नि निराकार है—ये अग्निके दो रूप हैं, पर तत्त्वतः अग्नि एक ही है। ऐसे ही भगवान् साकार-रूपसे हैं और ब्रह्म निराकार-रूपसे हैं—ये दो रूप साधकोंकी उपासनाकी दृष्टिसे हैं, पर तत्त्वतः भगवान् और ब्रह्म एक ही हैं, दो नहीं। जैसे भोजनमें एक सुगन्ध होती है और एक स्वाद होता है; नासिकाकी दृष्टिसे सुगन्ध होती है और रसनाकी दृष्टिसे स्वाद होता है, पर भोजन तो एक ही है। ऐसे ही ज्ञानकी दृष्टिसे ब्रह्म है और भक्तिकी दृष्टिसे भगवान् हैं, पर तत्त्वतः भगवान् और ब्रह्म एक ही हैं। भगवान् कृष्ण अलग हैं और ब्रह्म अलग है—यह भेद नहीं है; किन्तु भगवान् कृष्ण ही ब्रह्म हैं और ब्रह्म ही भगवान् कृष्ण हैं। गीतामें भगवान्ने अपने लिये ‘ब्रह्म’ शब्दका भी प्रयोग किया है—‘ब्रह्मण्याधाय कर्माणि ’ (५।१०) और अपनेको ‘अव्यक्तमूर्ति ’ भी कहा है—‘मया तत्तमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना ’ (९।४)। तात्पर्य है कि साकार और निराकार एक ही हैं, दो नहीं।

‘अमृतस्याव्ययस्य च’ —अविनाशी अमृतका अधिष्ठान मैं ही हूँ और मेरा ही अधिष्ठान अविनाशी अमृत है। तात्पर्य है कि अविनाशी अमृत और मैं—ये दो तत्त्व नहीं हैं, प्रत्युत

एक ही हैं। इसी अविनाशी अमृतकी प्राप्तिको भगवान्ने ‘अमृतमश्नुते ’ (१३।१२; १४।२०) पदसे कहा है।

‘शाश्वतस्य च धर्मस्य’ —सनातन धर्मका आधार मैं हूँ और मेरा आधार सनातन धर्म है। तात्पर्य है कि सनातन धर्म और मैं—ये दो नहीं हैं, प्रत्युत एक ही हैं। सनातन धर्म मेरा ही स्वरूप है*। गीतामें अर्जुनने भगवान्को शाश्वतधर्मका गोप्ता (रक्षक) बताया है (ग्यारहवें अध्यायका अठारहवाँ श्लोक)। भगवान् भी अवतार लेकर सनातन धर्मकी रक्षा किया करते हैं (चौथे अध्यायका आठवाँ श्लोक)।

‘सुखस्यैकान्तिकस्य च’ —ऐकान्तिक सुखका आधार मैं हूँ और मेरा आधार ऐकान्तिक सुख है अर्थात् मेरा ही स्वरूप ऐकान्तिक सुख है। भगवान्ने इसी ऐकान्तिक सुखको ‘अक्षय सुख’ (५।२१), ‘आत्यन्तिक सुख’ (६।२१) और ‘अत्यन्त सुख’ (६।२८) नामसे कहा है।

इस श्लोकमें ‘ब्रह्मणः ’, ‘अमृतस्य ’ आदि पदोंमें ‘राहोः शिरः ’ की तरह अभिन्नतामें षष्ठी विभक्तिका प्रयोग किया गया है। तात्पर्य है कि ‘राहुका सिर’—ऐसा जो प्रयोग होता है, उसमें राहु अलग है और सिर अलग है—ऐसी बात नहीं है, प्रत्युत राहुका नाम ही सिर है और सिरका नाम ही राहु है। ऐसे ही यहाँ ब्रह्म, अविनाशी अमृत आदि ही भगवान् कृष्ण हैं और भगवान् कृष्ण ही ब्रह्म, अविनाशी अमृत आदि हैं।

  • हिन्दू (सनातन), बौद्ध, ईसाई और मुस्लिम—ये चार धर्म वर्तमान समयमें संसारमें मुख्य माने जाते हैं। इन चारोंमेंसे एक-एक धर्मको माननेवालोंकी संख्या करोड़ोंकी है। इनमें बौद्ध, ईसाई और मुस्लिम-धर्मको चलानेवाले क्रमशः बुद्ध, ईसा और मोहम्मद माने जाते हैं। ये तीनों ही धर्म अर्वाचीन हैं। परन्तु हिन्दूधर्म किसी मनुष्यके द्वारा चलाया हुआ नहीं है अर्थात् यह किसी मानवीय बुद्धिकी उपज नहीं है। यह तो विभिन्न ऋषियोंद्वारा किया गया अन्वेषण है, खोज है। खोज उसीकी होती है, जो पहलेसे ही मौजूद हो। हिन्दूधर्म अनादि, अनन्त एवं शाश्वत है। जैसे भगवान् शाश्वत (सनातन) हैं, ऐसे ही हिन्दूधर्म भी शाश्वत है। इसीलिये भगवान्ने यहाँ (गीता १४।२७ में) सनातन हिन्दूधर्मको अपना स्वरूप बताया है। जब-जब हिन्दूधर्मका ह्रास होता है, तब-तब भगवान् अवतार लेकर इसकी संस्थापना करते हैं (गीता—चौथे अध्यायका सातवाँ-आठवाँ श्लोक)। तात्पर्य है कि भगवान् भी इसकी संस्थापना, रक्षा करनेके लिये ही अवतार लेते हैं, इसको बनानेके लिये, उत्पन्न करनेके लिये नहीं। वास्तवमें अन्य सभी धर्म तथा मत-मतान्तर भी इसी सनातन धर्मसे उत्पन्न हुए हैं। इसलिये उन धर्मोंमें मनुष्योंके कल्याणके लिये जो साधन बताये गये हैं, उनको भी हिन्दूधर्मकी ही देन मानना चाहिये। अतः उन धर्मोंमें बताये गये अनुष्ठानोंका भी निष्काषभावसे कर्तव्य समझकर पालन किया जाय, तो कल्याण होनेमें सन्देह नहीं मानना चाहिये। प्राणिमात्रके कल्याणके लिये जितना गहरा विचार हिन्दूधर्ममें किया गया है, उतना दूसरे धर्मोंमें नहीं मिलता। हिन्दूधर्मके सभी सिद्धान्त पूर्णतः वैज्ञानिक और कल्याण करनेवाले हैं।