श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीमद्भगवद्गीता
इस तरह 'अव्यभिचारेण' पदसे दूसरोंका आश्रय लेनेका निषेध करके 'भक्तियोगेन' पदसे केवल भगवान्का ही आश्रय लेनेकी बात कही गयी है।
'सेवते' पदका तात्पर्य है कि अव्यभिचारी भक्तियोगके द्वारा भगवान्का भजन करे, उनकी उपासना करे, उनके शरण हो जाय, उनके अनुकूल चले।
'स गुणान्समतीत्यैतान्'—जो अनन्यभावसे केवल भगवान्के ही शरण हो जाता है, उसको गुणोंका अतिक्रमण करना नहीं पड़ता, प्रत्युत भगवान्की कृपासे उसके द्वारा स्वतः गुणोंका अतिक्रमण हो जाता है (गीता—बारहवें अध्यायका छठाँ-सातवाँ श्लोक)।
'ब्रह्मभूयाय कल्पते'—वह गुणोंका अतिक्रमण करके ब्रह्मप्राप्तिका पात्र (अधिकारी) हो जाता है। भगवान्ने जब यहाँ भक्तिकी बात बतायी है, तो फिर भगवान्ने यहाँ ब्रह्मप्राप्तिकी बात न कहकर अपनी प्राप्तिकी बात बतानी चाहिये थी। परन्तु यहाँ ब्रह्मप्राप्तिकी बात बतानेका तात्पर्य यह है कि अर्जुनने गुणातीत होने-(निर्गुण ब्रह्मकी प्राप्ति-) का उपाय पूछा था। इसलिये भगवान्ने अपनी भक्तिको ब्रह्मप्राप्तिका उपाय बताया।
दूसरी बात, शास्त्रोंमें कहा गया है कि भगवान्की उपासना करनेवालेको ज्ञानकी भूमिकाओंकी सिद्धिके लिये दूसरा कोई साधन, प्रयत्न नहीं करना पड़ता, प्रत्युत उसके लिये ज्ञानकी भूमिकाएँ अपने-आप सिद्ध हो जाती हैं। उसी बातको लक्ष्य करके भगवान् यहाँ कह रहे हैं कि अव्यभिचारी भक्तियोगसे मेरा सेवन करनेवालेको ब्रह्मप्राप्तिका पात्र बननेके लिये दूसरा कोई साधन नहीं करना पड़ता, प्रत्युत वह अपने-आप ब्रह्मप्राप्तिका पात्र हो जाता है। परन्तु वह भक्त ब्रह्मप्राप्तिमें सन्तोष नहीं करता। उसका तो यही भाव रहता है कि भगवान् कैसे प्रसन्न हों? भगवान्की प्रसन्नतामें ही उसकी प्रसन्नता होती है। तात्पर्य यह निकला कि जो केवल भगवान्के ही परायण है, भगवान्में ही आकृष्ट है, उसके लिये ब्रह्मप्राप्ति स्वतःसिद्ध है। हाँ, वह ब्रह्मप्राप्तिको महत्त्व दे अथवा न दे—यह बात दूसरी है, पर वह ब्रह्मप्राप्तिका अधिकारी स्वतः हो जाता है।
तीसरी बात, जिस तत्त्वकी प्राप्ति ज्ञानयोग, कर्मयोग आदि साधनोंसे होती है, उसी तत्त्वकी प्राप्ति भक्तिसे भी होती है। साधनोंमें भेद होनेपर भी उस तत्त्वकी प्राप्तिमें कोई भेद नहीं होता।
परिशिष्ट भाव—भक्तिसे साधक जो भी चाहता है, उसीकी प्राप्ति हो जाती है। जो साधक मुख्यरूपसे ब्रह्मकी प्राप्ति अर्थात् मुक्ति, तत्त्वज्ञान चाहता है, उसको भक्ति करनेसे ब्रह्मकी प्राप्ति हो जाती है; क्योंकि ब्रह्मकी प्रतिष्ठा भगवान् ही हैं (इसी अध्यायका सत्ताईसवाँ श्लोक), ब्रह्म समग्र भगवान्का ही एक अंग है, स्वरूप है (गीता—सातवें अध्यायके उनतीसवाँ-तीसवाँ श्लोक)। तेरहवें अध्यायके दसवें श्लोकमें भी भक्तिको ज्ञानप्राप्तिका साधन बताया गया है।
श्रीमद्भागवतमें सगुणकी उपासनाको निर्गुण (गुणोंसे अतीत) बताया है; जैसे—'मन्निकेतं तु निर्गुणम्' (११। २५। २५), 'मत्सेवां तु निर्गुणा' (११। २५। २७) आदि। इसलिये सगुणकी उपासना करनेवाला तीनों गुणोंसे अतीत हो जाता है। सगुण भगवान् भी गुणोंके आश्रित नहीं हैं, प्रत्युत गुण उनके आश्रित हैं। जो सत्त्व-रज-तम गुणोंके वशमें है, उसका नाम 'सगुण' नहीं है, प्रत्युत जिसमें असीम ऐश्वर्य, माधुर्य, सौन्दर्य, औदार्य आदि अनन्त दिव्य गुण नित्य विद्यमान रहते हैं, उसका नाम 'सगुण' है। भगवान्के द्वारा सात्त्विक, राजस अथवा तामस क्रियाएँ हो सकती हैं, पर वे उन गुणोंके वशमें नहीं होते।
भगवान्की तरफ चलनेसे भक्त स्वतः और सुगमतासे गुणातीत हो जाता है। इतना ही नहीं, उसको भगवान्के समग्ररूपका भी ज्ञान हो जाता है।
सम्बन्ध—उपासना तो करे भगवान्की और पात्र बन जाय ब्रह्मप्राप्तिका—यह कैसे? इसका उत्तर आगेके श्लोकमें देते हैं।
ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाऽहममृतस्याव्ययस्य च। शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च॥ २७॥