श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 948, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्लोक २६ ]
- साधक-संजीवनी *
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अतः ये लक्षण गुणातीत मनुष्यको पहचाननेके संकेत-मात्र हैं।
प्रकृतिके कार्य गुण हैं और गुणोंके कार्य शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धि हैं। अतः मन-बुद्धि आदिके द्वारा अपने कारण गुणोंका भी पूरा वर्णन नहीं हो सकता, फिर गुणोंके भी कारण प्रकृतिका वर्णन हो ही कैसे सकता है? जो प्रकृतिसे भी सर्वथा अतीत (गुणातीत) है, उसका वर्णन करना तो उन मन-बुद्धि आदिके द्वारा सम्भव ही नहीं है। वास्तवमें गुणातीतके ये लक्षण स्वरूपमें तो होते ही नहीं; किन्तु अन्तःकरणमें मानी हुई अहंता-ममताके नष्ट हो जानेपर उसके कहे जानेवाले अन्तःकरणके माध्यमसे ही ये लक्षण—गुणातीतके लक्षण कहे जाते हैं।
यहाँ भगवान्ने सुख-दुःख, प्रिय-अप्रिय, निन्दा-स्तुति और मान-अपमान—ये आठ परस्पर विरुद्ध नाम लिये हैं,
परिशिष्ट भाव —राग-द्वेषादि विकार न जड़में रहते हैं, न चेतनमें रहते हैं और न ये अन्तःकरणके धर्म हैं, प्रत्युत ये देहाभिमानमें रहते हैं। देहाभिमान भी वास्तवमें है नहीं, प्रत्युत अविवेक-अविचारपूर्वक माना हुआ है। तात्पर्य है कि वास्तवमें विकार अपनेमें नहीं हैं, पर मनुष्य अविवेकके कारण अपनेमें मान लेता है। वह विकारोंके भाव और अभावका तथा स्वयंके भावका अनुभव तो करता है, पर इस अनुभवको महत्व नहीं देता। अगर वह विवेक-विचारपूर्वक अपनेमें विकारोंके अभावका अनुभव कर ले तो वह उनका भोक्ता (सुखी-दुःखी) नहीं बनेगा।
सम्बन्ध—अर्जुनने तीसरे प्रश्नके रूपमें गुणातीत होनेका उपाय पूछा था। उसका उत्तर भगवान् आगेके श्लोकमें देते हैं।
मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते।
स गुणात्ममतीत्यैतान्ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ २६ ॥
च = और यः = जो मनुष्य अव्यभिचारेण = अव्यभिचारी भक्तियोगेन = भक्तियोगके द्वारा
माम् = मेरा सेवते = सेवन करता है, सः = वह एतान् = इन
गुणान् = गुणोंका समतीत्य = अतिक्रमण करके ब्रह्मभूयाय = ब्रह्मप्राप्तिका कल्पते = पात्र हो जाता है।
व्याख्या —[यद्यपि भगवान्ने इसी अध्यायके उन्नीसवें-बीसवें श्लोकोंमें गुणोंका अतिक्रमण करनेका उपाय बता दिया था, तथापि अर्जुनने इक्कीसवें श्लोकमें गुणातीत होनेका उपाय पूछ लिया। इससे यह मालूम होता है कि अर्जुन उस उपायके सिवाय गुणातीत होनेके लिये दूसरा कोई उपाय जानना चाहते हैं। अतः अर्जुनको भक्तिका अधिकारी समझकर भगवान् उनको गुणातीत होनेका उपाय भक्ति बताते हैं।]
‘मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते’ —इन
जिनमें साधारण आदमियोंको तो विषमता हो ही जाती है, साधकोंकी भी कभी-कभी विषमता हो जाती है। ऐसे इन आठ कठिन स्थलोंमें जिसकी समता हो जाती है, उसके लिये अन्य सभी अवस्थाओंमें समता रखना सुगम हो जाता है। अतः यहाँ उन्हीं आठ कठिन स्थलोंका नाम लेकर भगवान् यह बताते हैं कि गुणातीत महापुरुषकी इन आठों स्थलोंमें स्वतः-स्वाभाविक समता होती है।
गुणातीत मनुष्यकी जो स्वतःसिद्ध निर्विकारता है, उसकी जो स्वाभाविक स्थिति है, उसमें अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियोंके आने-जानेका कुछ भी फरक नहीं पड़ता। उसकी निर्विकारता, समता ज्यों-की-त्यों अटल रहती है। उसकी शान्ति कभी भंग नहीं होती।
[चौबीसवें और पचीसवें—इन दो श्लोकोंमें भगवान्ने गुणातीत महापुरुषकी समताका वर्णन किया है।]
पदोंमें उपासक, उपास्य और उपासना—ये तीनों आ गये हैं अर्थात् ‘यः’ पदसे उपासक, ‘माम्’ पदसे उपास्य और ‘अव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते’ पदोंसे उपासना आ गयी है।
‘अव्यभिचारेण’ पदका तात्पर्य है कि दूसरे किसीका भी सहारा न हो। सांसारिक सहारा तो दूर रहा, ज्ञानयोग, कर्मयोग आदि योगों-(साधनों-) का भी सहारा न हो! और ‘भक्तियोगेन’ पदका तात्पर्य है कि केवल भगवान्का ही सहारा हो, आश्रय हो, आशा हो, बल हो, विश्वास हो।