श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 947, कुल 1299 में से
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १४ ]
साधारण मनुष्योंकी यह एक आदत बन जाती है कि उनको अपनी निन्दा बुरी लगती है और स्तुति अच्छी लगती है। परन्तु जो गुणोंसे ऊँचे उठ जाते हैं, उनको निन्दा-स्तुतिका ज्ञान तो होता है और वे बर्ताव भी सबके साथ यथोचित ही करते हैं, पर उनमें निन्दा-स्तुतिको लेकर खिन्नता-प्रसन्नता नहीं होती। कारण कि वे जिस तत्त्वमें स्थित हैं, वहाँ गुणोंवाली परकृत निन्दा-स्तुति पहुँचती ही नहीं।
निन्दा और स्तुति—ये दोनों ही परकृत क्रियाएँ हैं। उन क्रियाओंसे राजी-नाराज होना गलती है। कारण कि जिसका जैसा स्वभाव है, जैसी धारणा है, वह उसके अनुसार ही बोलता है। वह हमारे अनुकूल ही बोले, हमारी निन्दा न करे—यह न्याय नहीं है अर्थात् उसको बोलनेमें बाध्य करनेका भाव न्याय नहीं है, अन्याय है। दूसरोंपर हमारा क्या अधिकार है कि तुम हमारी निन्दा मत करो ? हमारी स्तुति ही करो ? दूसरी बात, कोई निन्दा करता है तो उसमें साधकको प्रसन्न होना चाहिये कि इससे मेरे पाप कट रहे हैं, मैं शुद्ध हो रहा हूँ। अगर कोई हमारी प्रशंसा करता है, तो उससे हमारे पुण्य नष्ट होते हैं। अतः प्रशंसामें राजी नहीं होना चाहिये; क्योंकि राजी होनेमें खतरा है !
‘मानापमानयोस्तुल्यः’ —मान और अपमान होनेमें शरीरकी मुख्यता होती है। गुणातीत मनुष्यका शरीरके साथ तादात्म्य नहीं रहता। अतः कोई उसका आदर करे या निरादर करे, मान करे या अपमान करे, इन परकृत क्रियाओंका उसपर कोई असर नहीं पड़ता।
निन्दा-स्तुति और मान-अपमान—इन दोनों ही परकृत क्रियाओंमें गुणातीत मनुष्य सम रहता है। इन दोनों परकृत क्रियाओंका ज्ञान होना दोषी नहीं है, प्रत्युत निन्दा और अपमानमें दुःखी होना तथा स्तुति और मानमें हर्षित होना दोषी है; क्योंकि ये दोनों ही प्रकृतिके विकार हैं। गुणातीत पुरुषको निन्दा-स्तुति और मान-अपमानका ज्ञान तो होता है, पर गुणोंसे सम्बन्ध-विच्छेद होनेसे, नाम और शरीरके साथ तादात्म्य न रहनेसे वह सुखी-दुःखी नहीं होता। कारण कि वह जिस तत्त्वमें स्थित है, वहाँ ये विकार नहीं हैं। वह तत्त्व गुणरहित है, निर्विकार है।
‘तुल्यो मित्रारिपक्षयोः’ —वह मित्र और शत्रुके पक्षमें सम रहता है। यद्यपि गुणातीत मनुष्यकी दृष्टिमें कोई मित्र और शत्रु नहीं होता, तथापि दूसरे लोग अपनी भावनाके अनुसार उसे अपना मित्र अथवा शत्रु भी मान
सकते हैं। साधारण मनुष्यको भी दूसरे लोग अपनी भावनाके अनुसार मित्र या शत्रु मान सकते हैं; किन्तु इस बातका पता लगनेपर उस मनुष्यपर इसका असर पड़ता है, जिससे उसमें राग-द्वेष उत्पन्न हो सकते हैं। परन्तु गुणातीत मनुष्यपर इस बातका पता लगनेपर भी कोई असर नहीं पड़ता। वस्तुतः मित्र और शत्रुकी भावनाके कारण ही व्यवहारमें पक्षपात होता है। गुणातीत मनुष्यके कहलानेवाले अन्तःकरणमें मित्र-शत्रुकी भावना ही नहीं होती; अतः उसके व्यवहारमें पक्षपात नहीं होता।
एक व्यक्ति उस महापुरुषके साथ मित्रता रखता है और दूसरा व्यक्ति अपने स्वभाववश उस महापुरुषके साथ शत्रुता रखता है। जब उन दोनों व्यक्तियोंकी किसी बातको लेकर न्याय करनेका अवसर आ जाय, तब (व्यवहारमें) वह मित्रता रखनेवालेकी अपेक्षा शत्रुता रखनेवालेका कुछ अधिक पक्ष लेता है। जैसे—पदार्थादिका बँटवारा करते समय वह मित्रता रखनेवालेको कम (उतना ही, जितना वह प्रसन्नतापूर्वक सहन कर सकता हो) और शत्रुता रखने-वालोंको कुछ ज्यादा पदार्थ देता है। यह भी समता ही कहलाती है; क्योंकि अपने पक्षवालोंके साथ न्याय और विपक्षवालोंके साथ उदारता होनी चाहिये।
‘सर्वारम्भपरित्यागी’ —वह महापुरुष सम्पूर्ण कर्मोंके आरम्भका त्यागी होता है। तात्पर्य है कि धन-सम्पत्तिके संग्रह और भोगोंके लिये वह किसी तरहका कोई नया कर्म आरम्भ नहीं करता। स्वतः प्राप्त परिस्थितिके अनुसार ही उसकी प्रवृत्ति और निवृत्ति होती है अर्थात् क्रियाओंमें उसकी प्रवृत्ति कामना, वासना, ममतासे रहित होती है और निवृत्ति भी मान-बड़ाई आदिकी इच्छासे रहित होती है।
‘गुणातीतः स उच्यते’ —यहाँ ‘उच्यते’ पदसे यही ध्वनि निकलती है कि उस महापुरुषकी ‘गुणातीत’ संज्ञा नहीं है; किन्तु उसके कहे जानेवाले शरीर, अन्तःकरणके लक्षणोंको लेकर ही उसको गुणातीत कहा जाता है।
वास्तवमें देखा जाय तो जो गुणातीत है, उसके लक्षण नहीं हो सकते। लक्षण तो गुणोंसे ही होते हैं; अतः जिसके लक्षण होते हैं, वह गुणातीत कैसे हो सकता है ? परन्तु अर्जुनने भी गुणातीतके ही लक्षण पूछे हैं और भगवान्ने भी गुणातीतके ही लक्षण कहे हैं। इसका तात्पर्य यह है कि लोग पहले उस गुणातीतकी जिस शरीर और अन्तःकरणमें स्थिति मानते थे, उसी शरीर और अन्तःकरणके लक्षणोंको लेकर वे उसमें आरोप करते हैं कि यह गुणातीत मनुष्य है।