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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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श्लोक २४-२५ ]

  • साधक-संजीवनी *

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ज्यों-की-त्यों रहती है। महापुरुषकी दृष्टि क्रियाओंपर न रहकर स्वतः एकमात्र चिन्मय सत्ता ('है') पर ही रहती है।

सम्बन्ध-इक्कीसवें श्लोकमें अर्जुनने दूसरे प्रश्नके रूपमें गुणातीत मनुष्यके आचरण पूछे थे। उसका उत्तर अब आगेके दो श्लोकोंमें देते हैं।

समदुःखसुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः ।

तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः ॥ २४ ॥

मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः ।

सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः स उच्यते ॥ २५ ॥

धीर: = जो धीर मनुष्य

समदुःख-

सुख: = दुःख-सुखमें

सम (तथा)

स्वस्थ: = अपने स्वरूपमें

स्थित रहता है;

समलोष्टाश्म-

काञ्चन: = जो मिट्टीके

ढेले, पत्थर और

सोनेमें सम रहता है;

तुल्यप्रियाप्रिय: = जो प्रिय-अप्रियमें

सम रहता है,

तुल्यनिन्दात्म-

संस्तुति: = जो अपनी

निन्दा-स्तुतिमें

सम रहता है;

मानापमानयो: = जो मान-अपमानमें

तुल्य: = सम रहता है;

मित्रारिपक्षयो: = जो मित्र-शत्रुके

पक्षमें

तुल्य: = सम रहता है (और)

सर्वारम्भपरित्यागी = जो सम्पूर्ण

कर्मोंके आरम्भका

त्यागी है,

स: = वह मनुष्य

गुणातीतः = गुणातीत

उच्यते = कहा जाता है।

व्याख्या-'धीरः, समदुःखसुखः' - नित्य-अनित्य, सार-असार आदिके तत्त्वको जानकर स्वतःसिद्ध स्वरूपमें स्थित होनेसे गुणातीत मनुष्य धैर्यवान् कहलाता है।

पूर्वकर्मोंके अनुसार आनेवाली अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितिका नाम सुख-दुःख है अर्थात् प्रारब्धके अनुसार शरीर, इन्द्रियों आदिके अनुकूल परिस्थितिको 'सुख' कहते हैं और शरीर, इन्द्रियों आदिके प्रतिकूल परिस्थितिको 'दुःख' कहते हैं। गुणातीत मनुष्य इन दोनोंमें सम रहता है। तात्पर्य है कि सुख-दुःखरूप बाह्य परिस्थितियाँ उसके कहे जानेवाले अन्तःकरणमें विकार पैदा नहीं कर सकतीं, उसको सुखी-दुःखी नहीं कर सकतीं।

ढेलेकी जगह रखता है, पत्थरको पत्थरकी जगह रखता है और स्वर्णको स्वर्णकी जगह (तिजोरी आदिमें) रखता है। तात्पर्य है कि यद्यपि उनकी प्राप्ति-अप्राप्तिमें उसको हर्ष-शोक नहीं होते, वह सम रहता है, तथापि उनसे व्यवहार तो यथायोग्य ही करता है।

ढेले, पत्थर और स्वर्णका ज्ञान न होना समता नहीं कहलाती। समता वही है कि इन तीनोंका ज्ञान होते हुए भी इनमें राग-द्वेष न हों। ज्ञान कभी दोषी नहीं होता, विकार ही दोषी होते हैं।

'स्वस्थः' - स्वरूपमें सुख-दुःख है ही नहीं। स्वरूपसे तो सुख-दुःख प्रकाशित होते हैं। अतः गुणातीत मनुष्य आने-जानेवाले सुख-दुःखका भोक्ता नहीं बनता, प्रत्युत अपने नित्य-निरन्तर रहनेवाले स्वरूपमें स्थिर रहता है।

'तुल्यप्रियाप्रियः' - क्रियमाण कर्मोंकी सिद्धि-असिद्धिमें अर्थात् उनके तात्कालिक फलकी प्राप्ति-अप्राप्तिमें भी वह सम रहता है।

'समलोष्टाश्मकाञ्चनः' - उसका मिट्टीके ढेले, पत्थर और स्वर्णमें न तो आकर्षण (राग) होता है और न विकर्षण (द्वेष) होता है। परन्तु व्यवहारमें वह ढेलेको

'तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः' - निन्दा और स्तुतिमें नामकी मुख्यता होती है। गुणातीत मनुष्यका नामके साथ कोई सम्बन्ध नहीं रहता; अतः कोई निन्दा करे तो उसके चित्तमें खिन्नता नहीं होती और कोई स्तुति करे तो उसके चित्तमें प्रसन्नता नहीं होती। इसी प्रकार निन्दा करनेवालोंके प्रति उसका द्वेष नहीं होता और स्तुति करनेवालोंके प्रति उसका राग नहीं होता।