श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 945, कुल 1299 में से
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १४ ]
उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते।
गुणा वर्तन्त इत्येव योऽवतिष्ठति नेङ्गते ॥ २३ ॥
| यः | = जो | (तथा) | यः | = जो (अपने स्वरूपमें) |
|---|---|---|---|---|
| उदासीनवत् | = उदासीनकी तरह | गुणाः | = गुण | ही) |
| आसीनः | = स्थित है (और) | एव | = ही | अवतिष्ठति |
| गुणैः | = (जो) गुणोंके द्वारा | (गुणोंमें) | = स्थित रहता है | |
| न, विचाल्यते | = विचलित नहीं | वर्तन्ते | = बरत रहे हैं— | (और स्वयं कोई भी) |
| किया जा सकता | इति | = इस भावसे | न, इङ्गते | |
| = चेष्टा नहीं करता। |
व्याख्या—‘उदासीनवदासीनः’ —दो व्यक्ति परस्पर विवाद करते हों, तो उन दोनोंमेंसे किसी एकका पक्ष लेनेवाला ‘पक्षपाती’ कहलाता है और दोनोंका न्याय करनेवाला ‘मध्यस्थ’ कहलाता है। परन्तु जो उन दोनोंको देखता तो है, पर न तो किसीका पक्ष लेता है और न किसीसे कुछ कहता ही है, वह ‘उदासीन’ कहलाता है। ऐसे ही संसार और परमात्मा—दोनोंको देखनेसे गुणाती मनुष्य उदासीनकी तरह दीखता है।
वास्तवमें देखा जाय तो संसारकी स्वतन्त्र सत्ता है ही नहीं। सत्-स्वरूप परमात्माकी सत्तासे ही संसार सत्तावाला दीख रहा है। अतः जब गुणातीत मनुष्यकी दृष्टिमें संसारकी सत्ता है ही नहीं, केवल एक परमात्माकी सत्ता ही है, तो फिर वह उदासीन किससे हो? परन्तु जिनकी दृष्टिमें संसार और परमात्माकी सत्ता है, ऐसे लोगोंकी दृष्टिमें वह गुणातीत मनुष्य उदासीनकी तरह दीखता है।
‘गुणैर्यो न विचाल्यते’ —उसके कहलानेवाले अन्तःकरणमें सत्त्व, रज, और तम—इन गुणोंकी वृत्तियाँ तो आती हैं, पर वह इनसे विचलित नहीं होता। तात्पर्य है कि जैसे अपने सिवाय दूसरोंके अन्तःकरणमें गुणोंकी वृत्तियाँ आनेपर अपनेमें कुछ भी फरक नहीं पड़ता, ऐसे
ही उसके कहलानेवाले अन्तःकरणमें गुणोंकी वृत्तियाँ आनेपर उसमें कुछ भी फरक नहीं पड़ता अर्थात् वह उन वृत्तियोंके द्वारा विचलित नहीं किया जा सकता। कारण कि उसके कहे जानेवाले अन्तःकरणमें अन्तःकरणसहित सम्पूर्ण संसारका अत्यन्त अभाव एवं परमात्मतत्त्वका भाव निरन्तर स्वतः—स्वाभाविक जाग्रत् रहता है।
‘गुणा वर्तन्त इत्येव योऽवतिष्ठति’ —गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं (गीता—तीसरे अध्यायका अष्टाईसवाँ श्लोक) अर्थात् गुणोंमें ही सम्पूर्ण क्रियाएँ हो रही हैं—ऐसा समझकर वह अपने स्वरूपमें निर्विकाररूपसे स्थित रहता है।
‘न इंगते’ —पहले ‘गुणा वर्तन्त इत्येव’ पदोंसे उसका गुणोंके साथ सम्बन्धका निषेध किया, अब ‘न इंगते’ पदोंसे उसमें क्रियाओंका अभाव बताते हैं। तात्पर्य है कि गुणातीत पुरुष खुद कुछ भी चेष्टा नहीं करता। कारण कि अविनाशी शुद्ध स्वरूपमें कभी कोई क्रिया होती ही नहीं।
[बाईसवें और तेईसवें—इन दो श्लोकोंमें भगवान्ने गुणातीत महापुरुषकी तटस्थता, निलिप्तताका वर्णन किया है।]
परिशिष्ट भाव—‘न विचाल्यते’, ‘अवतिष्ठति’ और ‘नेङ्गते’—ये तीनों पद वास्तवमें एक ही अर्थ रखते हैं। फिर भी ये तीनों पद देनेका तात्पर्य है कि गुणातीत महापुरुष स्वतः—स्वाभाविक अचल (स्थिरतामें) रहता है। वह न तो स्वयं विचलित होता है और न किसीसे विचलित किया जा सकता है।
‘करना’, ‘होना’ और ‘है’—ये तीन विभाग हैं। ‘करना’ होनेमें और ‘होना’ ‘है’ में बदल जाय तो अहंकार सर्वथा नष्ट हो जाता है। जिसके अन्तःकरणमें क्रिया और पदार्थका महत्त्व है, ऐसा असाधक (संसारी मनुष्य) मानता है कि ‘मैं क्रिया कर रहा हूँ’—‘अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते’ (गीता ३।२७)। जो कर्ता बनता है, उसको भीका बनना ही पड़ता है। जिसमें विवेककी प्रधानता है, ऐसा साधक अनुभव करता है कि ‘क्रिया हो रही है’—‘गुणा गुणेषु वर्तन्ते’ (गीता ३।२८) अर्थात् ‘मैं कुछ भी नहीं करता हूँ’—‘नैव किंचित्करोमीति’ (गीता ५।८)। परन्तु जिसको तत्त्वज्ञान हो गया है, ऐसा सिद्ध महापुरुष केवल सत्ता तथा ज्ञप्तिमात्र (‘है’) का ही अनुभव करता है—‘योऽवतिष्ठति नेङ्गते’। वह चिन्मय सत्ता सम्पूर्ण क्रियाओंमें ज्यों-की-त्यों परिपूर्ण है। क्रियाओंका तो अन्त हो जाता है, पर चिन्मय सत्ता