श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १४ ]
‘रजसो लोभ एव च’—रजोगुणसे लोभ आदि पैदा होते हैं। लोभको लेकर मनुष्य जो कर्म करता है, उन कर्मोंका फल दुःख होता है।
जितना मिला है, उसकी वृद्धि चाहनेका नाम लोभ है। लोभके दो रूप हैं—उचित खर्च न करना और अनुचित रीतिसे संग्रह करना। उचित कामोंमें धन खर्च न करनेसे, उससे जी चुरानेसे मनुष्यके मनमें अशान्ति, हलचल रहती है और अनुचित रीतिसे अर्थात् झूठ, कपट आदिसे धनका संग्रह करनेसे पाप बनते हैं, जिससे नरकोंमें तथा चौरासी लाख योनियोंमें दुःख भोगना पड़ता है। इस दृष्टिसे राजस कर्मोंका फल दुःख होता है।
‘प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च’— तमोगुणसे प्रमाद, मोह और अज्ञान पैदा होता है। इन तीनोंके बुद्धिमें आनेसे विवेक-विरुद्ध काम होते हैं (गीता—अठारहवें अध्यायका बत्तीसवाँ श्लोक), जिससे अज्ञान ही बढ़ता है, दृढ़ होता है।
यहाँ तो तमोगुणसे अज्ञानका पैदा होना बताया है और इसी अध्यायके आठवें श्लोकमें अज्ञानसे तमोगुणका पैदा होना बताया है। इसका तात्पर्य यह है कि जैसे वृक्षसे बीज पैदा होते हैं और उन बीजोंसे आगे बहुत-से वृक्ष पैदा होते हैं, ऐसे ही तमोगुणसे अज्ञान पैदा होता है और अज्ञानसे तमोगुण बढ़ता है, पुष्ट होता है।
पहले आठवें श्लोकमें भगवान्ने प्रमाद, आलस्य और निद्रा—ये तीन बताये। परन्तु तेरहवें श्लोकमें और यहाँ प्रमाद तो बताया, पर निद्रा नहीं बतायी। इससे यह सिद्ध होता है कि आवश्यक निद्रा तमोगुणी नहीं है और निषिद्ध भी नहीं है तथा बाँधनेवाली भी नहीं है। कारण कि शरीरके लिये आवश्यक निद्रा तो सात्त्विक पुरुषको भी आती है और गुणातीत पुरुषको भी! वास्तवमें अधिक निद्रा ही बाँधनेवाली, निषिद्ध और तमोगुणी है; क्योंकि अधिक निद्रासे शरीरमें आलस्य बढ़ता है, पड़े रहनेका ही मन करता है, बहुत समय बरबाद हो जाता है।
परिशिष्ट भाव —ज्ञान (विवेक) सत्त्वगुणसे प्रकट होता है और संग न करनेपर बढ़ते-बढ़ते तत्त्वबोधतक चला जाता है अर्थात् तत्त्वबोधमें परिणत हो जाता है। परन्तु लोभ, प्रमाद, मोह, अज्ञान बढ़ते हैं तो कोई नुकसान बाकी नहीं रहता, कोई दुःख बाकी नहीं रहता, कोई मूढ़यौनि बाकी नहीं रहती, कोई नरक बाकी नहीं रहता।
सम्बन्ध—तात्कालिक गुणोंके बढ़नेपर मरनेवालोंकी गतिका वर्णन तो चौदहवें-पन्द्रहवें श्लोकोंमें कर दिया; परन्तु जिनके जीवनमें सत्त्वगुण, रजोगुण अथवा तमोगुणकी प्रधानता रहती है, उनकी (मरनेपर) क्या गति होती है—इसका वर्णन आगेके श्लोकमें करते हैं।
विशेष बात
यह जीव साक्षात् परमात्माका अंश होते हुए भी जब प्रकृतिके साथ सम्बन्ध जोड़ लेता है, तब इसका प्रकृतिजन्म गुणोंके साथ सम्बन्ध जुड़ जाता है। फिर गुणोंके अनुसार उसके अन्तःकरणमें वृत्तियाँ पैदा होती हैं। उन वृत्तियोंके अनुसार कर्म होते हैं और इन्हीं कर्मोंका फल ऊँच-नीच गतियाँ होती हैं। तात्पर्य है कि जीवित-अवस्थामें अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियाँ आती हैं और मरनेके बाद ऊँच-नीच गतियाँ होती हैं। वास्तवमें उन कर्मोंके मूलमें भी गुणोंकी वृत्तियाँ ही होती हैं, जो कि पुनर्जन्मके होनेमें खास कारण हैं (गीता—तेरहवें अध्यायका इक्कीसवाँ श्लोक)। तात्पर्य है कि गुणोंका संग कर्मोंसे कमजोर नहीं है। जैसे कर्म शुभ-अशुभ फल देते हैं, ऐसे ही गुणोंका संग भी शुभ-अशुभ फल देता है (गीता—आठवें अध्यायका छठा श्लोक)। इसीलिये पाँचवेंसे अठारहवें श्लोकतकके इस प्रकरणमें पहले चौदहवें-पन्द्रहवें श्लोकोंमें गुणोंकी तात्कालिक वृत्तियोंके बढ़नेका फल बताया और जीवित-अवस्थामें जो परिस्थितियाँ आती हैं, उनको सोलहवें श्लोकमें बताया तथा आगे अठारहवें श्लोकमें गुणोंकी स्थायी वृत्तियोंका फल बताये। अतः वृत्तियों और कर्मोंके होनेमें गुण ही मुख्य हैं। इस पूरे प्रकरणमें गुणोंकी मुख्य बात इसी (सत्रहवें) श्लोकमें कही गयी है।
जिसका उद्देश्य संसार नहीं है, प्रत्युत परमात्मा है, वह साधारण मनुष्योंकी तरह प्रकृतिमें स्थित नहीं है। अतः उसमें प्रकृतिजन्म गुणोंकी परवशता नहीं रहती और साधन करते-करते आगे चलकर जब अहंता परिवर्तित होकर लक्ष्यकी दृढ़ता हो जाती है, तब उसको अपने स्वतःसिद्ध गुणातीत स्वरूपका अनुभव हो जाता है। इसीका नाम बोध है। इस बोधके विषयमें भगवान्ने इस अध्यायका पहला-दूसरा श्लोक कहा और गुणातीतके विषयमें बाईसवेंसे छब्बीसवेंतकके पाँच श्लोक कहे। इस तरह यह पूरा अध्याय गुणोंसे अतीत स्वतःसिद्ध स्वरूपका अनुभव करनेके लिये ही कहा गया है।