सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

पृष्ठ 938, कुल 1299 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 938

श्लोक १८ ]

  • साधक-संजीवनी *

१३७

ऊर्ध्व गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः ।

जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः ॥ १८ ॥

सत्त्वस्थाः | = सत्त्वगुणमें स्थित | मध्ये | = मृत्युलोकमें | वृत्तिमें | ---|---|---|---|---|--- | मनुष्य | तिष्ठन्ति | = जन्म लेते हैं | स्थित | ऊर्ध्वम् | = ऊर्ध्वलोकोंमें | | (और) | तामसाः | = तामस गच्छन्ति | = जाते हैं, | जघन्यगुण- | | मनुष्य | राजसाः | = रजोगुणमें स्थित | वृत्तिस्थाः | = निन्दनीय | अधः | = अधोगतिमें मनुष्य | | | तमोगुणकी | गच्छन्ति | = जाते हैं ।

व्याख्या— 'ऊर्ध्व गच्छन्ति सत्त्वस्थाः'—जिनके जीवनमें सत्त्वगुणकी प्रधानता रही है और उसके कारण जिन्होंने भोगोंसे संयम किया है; तीर्थ, व्रत, दान आदि शुभ-कर्म किये हैं; दूसरोंके सुख-आरामके लिये प्याऊ, अन्नक्षेत्र आदि चलाये हैं; सड़के बनवायी हैं; पशु-पक्षियोंकी सुख-सुविधाके लिये पेड़-पौधे लगाये हैं; गौशालाएँ बनवायी हैं, उन मनुष्योंको यहाँ 'सत्त्वस्थाः' कहा गया है। जब सत्त्वगुणकी प्रधानतामें ही ऐसे मनुष्योंका शरीर छूट जाता है, तब वे सत्त्वगुणका संग होनेसे, सत्त्वगुणमें आसक्ति होनेसे स्वर्गादि ऊँचे लोकोंमें चले जाते हैं। उन लोकोंका वर्णन इसी अध्यायके चौदहवें श्लोकमें 'उत्तमविदां अमलान् लोकान्' पदोंसे किया गया है। ऊर्ध्वलोकोंमें जानेवाले मनुष्योंको तेजस्तत्त्वप्रधान शरीरकी प्राप्ति होती है।

'मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः' —जिन मनुष्योंके जीवनमें रजोगुणकी प्रधानता होती है और उसके कारण जो शास्त्रकी मर्यादामें रहते हुए ही संग्रह करना और भोग भोगना; ऐश-आराम करना; पदार्थमें ममता, आसक्ति रखना आदिमें लगे रहते हैं, उनको यहाँ 'राजसाः' कहा गया है। जब रजोगुणकी प्रधानतामें ही अर्थात् रजोगुणके कार्याके चिन्तनमें ही ऐसे मनुष्योंका शरीर छूट जाता है, तब वे पुनः इस मृत्युलोकमें ही जन्म लेते हैं। यहाँ उनको पृथ्वीतत्त्वप्रधान मनुष्यशरीरकी प्राप्ति होती है।

यहाँ 'तिष्ठन्ति' पद देनेका तात्पर्य है कि वे राजस मनुष्य अभी जैसे इस मृत्युलोकमें हैं, मरनेके बाद वे पुनः मृत्युलोकमें आकर ऐसे ही बन जाते हैं अर्थात् जैसे पहले थे, वैसे ही बन जाते हैं। वे अशुद्ध आचरण नहीं करते, शास्त्रकी मर्यादा भंग नहीं करते, प्रत्युत शास्त्रकी मर्यादामें ही रहते हैं और शुद्ध आचरण करते हैं; परन्तु पदार्थ, व्यक्तियों आदिमें राग, आसक्ति, ममता रहनेके कारण वे पुनः मृत्युलोकमें ही जन्म लेते हैं।

'जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः' —जिन मनुष्योंके जीवनमें तमोगुणकी प्रधानता रहती है और उसके कारण जिन्होंने प्रमाद आदिके वशमें होकर निरर्थक पैसा और समय बरबाद किया है; जो आलस्य तथा नींदमें ही पड़े रहे हैं; आवश्यक कार्योंको भी जिन्होंने समयपर नहीं किया है; जो दूसरोंका अहित ही सोचते आये हैं; जिन्होंने दूसरोंका अहित किया है, दूसरोंको दुःख दिया है; जिन्होंने झूठ, कपट, चोरी, डकैती आदि निन्दनीय कर्म किये हैं, ऐसे मनुष्योंको यहाँ 'जघन्यगुणवृत्तिस्थाः' कहा गया है। जब तमोगुणकी प्रधानतामें ही अर्थात् तमोगुणके कार्याके चिन्तनमें ही ऐसे मनुष्य मर जाते हैं, तब वे अधोगतिमें चले जाते हैं।

अधोगतिके दो भेद हैं—योनिविशेष और स्थान-विशेष। पशु, पक्षी, कीट, पतंग, साँप, बिच्छू, भूत-प्रेत आदि 'योनिविशेष' अधोगति है और वैतरिणी, असिपत्र, लालाभक्ष, कुम्भीपाक, रौरव, महारौरव आदि नरकके कुण्ड 'स्थानविशेष' अधोगति है। जिनके जीवनमें सत्त्वगुण अथवा रजोगुण रहते हुए भी अन्तसमयमें तात्कालिक तमोगुण बढ़ जाता है, वे मनुष्य मरनेके बाद 'योनिविशेष' अधोगतिमें अर्थात् मूढ़योनियोंमें चले जाते हैं (गीता—चौदहवें अध्यायका पन्द्रहवाँ श्लोक)। जिनके जीवनमें तमोगुणकी प्रधानता रही है और उसी तमोगुणकी प्रधानतामें जिनका शरीर छूट जाता है, वे मनुष्य मरनेके बाद 'स्थानविशेष' अधोगतिमें अर्थात् नरकोंमें चले जाते हैं (गीता—सोलहवें अध्यायका सोलहवाँ श्लोक)। तात्पर्य यह हुआ कि सात्त्विक, राजस अथवा तामस मनुष्यका अन्तिम चिन्तन और हो जानेसे उनकी गति तो अन्तिम चिन्तनके अनुसार ही होगी, पर सुख-दुःखका भोग उनके कर्मोंके अनुसार ही होगा। जैसे—कर्म तो अच्छे हैं, पर अन्तिम चिन्तन कुत्तेका हो गया, तो अन्तिम चिन्तनके अनुसार वह कुत्ता बन जायगा; परन्तु उस योनिमें भी उसको