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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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श्लोक १७ ]

  • साधक-संजीवनी *

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आदर-सत्कार आदिका भोग होगा, और मरनेके बाद स्वर्गादि लोकोंके भोगोंकी प्राप्ति होगी। परन्तु ये जितने भी सम्बन्धजन्य भोग हैं, वे सब-के-सब दुःखोंके ही कारण हैं—'ये हि संसर्पजा भोगा दुःखयोनय एव ते' (गीता ५।२२) अर्थात् जन्म-मरण देनेवाले हैं। इसी दृष्टिसे भगवान्ने यहाँ राजस कर्मका फल दुःख कहा है।

रजोगुणसे दो चीजें पैदा होती हैं—पाप और दुःख। रजोगुणी मनुष्य वर्तमानमें पाप करता है और परिणाममें उन पापोंका फल दुःख भोगता है। तीसरे अध्यायके छत्तीसवें श्लोकमें अर्जुनके द्वारा 'मनुष्य न चाहता हुआ भी पाप क्यों करता है?' ऐसा पूछनेपर उत्तरमें भगवान्ने रजोगुणसे उत्पन्न होनेवाली कामनाको ही पाप करनेमें हेतु बताया है!

'अज्ञानं तमसः फलम्'— तमोगुणका स्वरूप मोहान्तक है। अतः मोहवाला तामस कर्ता परिणाम, हिंसा, हानि और सामर्थ्यको न देखकर मूढ़तापूर्वक जो कुछ कर्म करेगा, वह कर्म तामस ही होगा और उस तामस कर्मका फल अज्ञान अर्थात् अज्ञानबहुल योनियोंकी प्राप्ति ही होगा। उस कर्मके अनुसार उसका पशु, पक्षी, कीट, पतंग, वृक्ष, लता, पहाड़ आदि मूढ़योनियोंमें जन्म होगा, जिनमें अज्ञान-(मूढ़ता-) की मुख्यता रहती है।

इस श्लोकका निष्कर्ष यह निकला कि सात्त्विक

परिशिष्ट भाव—रजोगुणका स्वरूप राग है और उस रागके कारण ही दुःख होता है—'रजसस्तु फलं दुःखम्'। संसारके सभी दुःख और पाप रागके कारण ही होते हैं। रागके कारण ही काम पैदा होता है—'काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः' (गीता ३।३७)।

'अज्ञानं तमसः फलम्'—तमोगुण ज्ञान, प्रकाश, विवेक नहीं होने देता; क्योंकि तमोगुण अज्ञानको उत्पन्न करनेवाला और अज्ञानसे ही उत्पन्न होनेवाला है (इसी अध्यायका आठवाँ और सत्रहवाँ श्लोक)।

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें भगवान्ने गुणोंकी तात्कालिक वृत्तियोंके बढ़नेपर जो गतियाँ होती हैं, उनके मूलमें सात्त्विक, राजस और तामस कर्म बताये। अब सात्त्विक, राजस और तामस कर्मोंके मूलमें गुणोंको बतानेके लिये भगवान् आगेका श्लोक कहते हैं।

सत्त्वात्सञ्जायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च। प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च ॥ १७ ॥

सत्त्वात्= सत्त्वगुणसेएव= हीअज्ञानम्= अज्ञान
ज्ञानम्= ज्ञानसञ्जायते= उत्पन्न होते हैं।एव= भी
= औरतमसः= तमोगुणसेभवतः= उत्पन्न होते हैं।
रजसः= रजोगुणसेप्रमादमोहौ= प्रमाद, मोह
लोभः= लोभ (आदि)= एवं

व्याख्या—'सत्त्वात्संजायते ज्ञानम्'—सत्त्वगुणसे ज्ञान होता है अर्थात् सुकृत-दुष्कृत कर्मोंका विवेक जाग्रत् होता है। उस विवेकसे मनुष्य सुकृत, सत्कर्म ही करता है। उन सुकृत कर्मोंका फल सात्त्विक, निर्मल होता है।