श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 926, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्लोक ८ ]
- साधक-संजीवनी *
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परिशिष्ट भाव —रजोगुण कर्माके संगसे मनुष्यको बाँधता है। अतः सात्त्विक कर्म भी संग होनेसे बाँधनेवाले हो जाते हैं। अगर संग न हो तो कर्म बन्धनकारक नहीं होते (गीता—अठारहवें अध्यायका सत्रहवाँ श्लोक)। इसलिये कर्मयोगसे मुक्ति हो जाती है; क्योंकि कर्माका और उनके फलका संग न होनेसे ही कर्मयोग होता है (गीता—छठे अध्यायका चौथा श्लोक)।
सम्बन्ध—तमोगुणका स्वरूप और उसके बाँधनेका प्रकार क्या है—इसको आगेके श्लोकमें बताते हैं।
तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम्।
प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति
भारत ॥ ८ ॥
| तु | = और | तमः | = तमोगुणको | प्रमादालस्यनिद्राभिः=प्रमाद, आलस्य |
|---|---|---|---|---|
| भारत | = हे भरतवंशी | (तुम) | और निद्राके द्वारा | |
| अर्जुन! | अज्ञानजम् | = अज्ञानसे उत्पन्न | निबध्नाति = (देहेके साथ | |
| सर्वदेहिनाम् | = सम्पूर्ण | होनेवाला | अपना सम्बन्ध | |
| देहधारियोंको | विद्धि | = समझो। | माननेवालों- | |
| मोहनम् | = मोहित करनेवाले | तत् | = वह | को) बाँधता है। |
व्याख्या —‘तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम्’—सत्त्वगुण और रजोगुण—इन दोनोंसे तमोगुणको अत्यन्त निकृष्ट बतानेके लिये यहाँ ‘तु’ पदका प्रयोग हुआ है।
यह तमोगुण अज्ञानसे अर्थात् बेसमझीसे, मूर्खतासे पैदा होता है और सम्पूर्ण देहधारियोंको मोहित कर देता है अर्थात् सत्-असत्, कर्तव्य-अकर्तव्यका ज्ञान (विवेक) नहीं होने देता। इतना ही नहीं, यह सांसारिक सुख-भोग और संग्रहमें भी नहीं लगने देता अर्थात् राजस सुखमें भी नहीं जाने देता, फिर सात्त्विक सुखकी तो बात ही क्या है!
वास्तवमें तमोगुणके द्वारा मोहित होनेकी बात केवल मनुष्योंके लिये ही है; क्योंकि दूसरे प्राणी तो स्वाभाविक ही तमोगुणसे मोहित हैं। फिर भी यहाँ ‘सर्वदेहिनाम्’ पद देनेका तात्पर्य है कि जिन मनुष्योंमें सत्-असत्, कर्तव्य-अकर्तव्यका ज्ञान (विवेक) नहीं है, वे मनुष्य होते हुए भी चौरासी लाख योनियोंवाले प्राणियोंके समान ही हैं अर्थात् जैसे पशु-पक्षी आदि प्राणी खा-पी लेते हैं और सो जाते हैं, ऐसे ही वे मनुष्य भी हैं।
‘प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत’—यह तमोगुण प्रमाद, आलस्य और निद्राके द्वारा सम्पूर्ण देहधारियोंको बाँध देता है।
‘प्रमाद’ दो तरहका होता है—(१) करनेलायक
कामको न करना अर्थात् जिस कामसे अपना और दुनियाका, अभी और परिणाममें हित होता है, ऐसे कर्तव्य-कर्माको प्रमादके कारण न करना; और (२) न करनेलायक कामको करना अर्थात् जिस कामसे अपना और दुनियाका अभी और परिणाममें अहित होता है, ऐसे कर्माको करना।
न करनेलायक काम भी दो तरहके होते हैं—१—व्यर्थ खर्च करना अर्थात् बीड़ी-सिगरेट, भाँग-गाँजा आदि पीनेमें और नाटक-सिनेमा, खेल आदि देखनेमें धन खर्च करना; और २—व्यर्थ क्रिया करना अर्थात् ताश-चौपड़ खेलना, खेल-कूद करना, बिना किसी कारणके पशु-पक्षी आदिको कष्ट देना, तंग करना, बिना किसी स्वार्थके छोटे-छोटे पेड़-पौधोंको नष्ट कर देना आदि व्यर्थ क्रियाएँ करना।
‘आलस्य’ भी दो प्रकारका होता है—(१) सोते रहना, निकम्मे बैठे रहना, आवश्यक काम न करना और ऐसा विचार रखना कि फिर कर लेंगे, अभी तो बैठे हैं—इस तरहका आलस्य मनुष्यको बाँधता है; और (२) निद्राके पहले शरीर भारी हो जाना, वृत्तियोंका भारी हो जाना, समझनेकी शक्ति न रहना—इस तरहका आलस्य दोषी नहीं है; क्योंकि यह आलस्य आता है, मनुष्य करता नहीं।
‘निद्रा’ भी दो तरहकी होती है—(१) आवश्यक निद्रा—जो निद्रा शरीरके स्वास्थ्यके लिये नियमितरूपसे ली जाती है और जिससे शरीरमें हलकापन आता है, वृत्तियाँ