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भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १४ ]

स्वच्छ होती है, बुद्धिको विश्राम मिलता है, ऐसी आवश्यक निद्रा त्याज्य और दोषी नहीं है। भगवान्ने भी ऐसी नियमित निद्राको दोषी नहीं माना है, प्रत्युत योग-साधनमें सहायक माना है—‘युक्तस्वप्नावबोधस्थ ’ (६।१७) और (२) अनावश्यक निद्रा—जो निद्रा निद्राके लिये ली जाती है, जिससे बेहोशी ज्यादा आती है, नींदसे उठनेपर भी शरीर भारी रहता है, वृत्तियाँ भारी रहती हैं, पुरानी स्मृति नहीं होती, ऐसी अनावश्यक निद्रा त्याज्य और दोषी है। इस अनावश्यक निद्राको भगवान्ने भी त्याज्य बताया है—‘न चाति स्वप्नशीलस्य ’ (६।१६)।

इस तरह तमोगुण प्रमाद, आलस्य और निद्राके द्वारा मनुष्यको बाँध देता है अर्थात् उसकी सांसारिक और पारमार्थिक उन्नति नहीं होने देता।

विशेष बात

सत्त्व, रज और तम—ये तीनों गुण मनुष्यको बाँधते हैं, पर इन तीनोंके बाँधनेके प्रकारमें फरक है। सत्त्वगुण और रजोगुण ‘संग’ से बाँधते हैं अर्थात् सत्त्वगुण सुख और ज्ञानकी आसक्तिसे तथा रजोगुण कर्मोंकी आसक्तिसे बाँधता

है। अतः सत्त्वगुणमें ‘सुखसंग और ज्ञानसंग’ बताया तथा रजोगुणमें ‘कर्मसंग’ बताया। परन्तु तमोगुणमें ‘संग’ नहीं बताया; क्योंकि तमोगुण मोहनात्मक है। इसमें किसीका संग करनेकी जरूरत नहीं पड़ती। यह तो स्वरूपसे ही बाँधनेवाला है। तात्पर्य यह हुआ कि सत्त्वगुण और रजोगुण तो संग—(सुखासक्ति-) से बाँधते हैं, पर तमोगुण स्वरूपसे ही बाँधनेवाला है।

अगर सुखकी आसक्ति न हो और ज्ञानका अभिमान न हो तो सुख और ज्ञान बाँधनेवाले नहीं होते, प्रत्युत गुणातीत करनेवाले होते हैं। ऐसे ही कर्म और कर्मफलमें आसक्ति न हो, तो वह कर्म परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति करनेवाला होता है (गीता—तीसरे अध्यायका उन्नीसवाँ श्लोक)।

उपर्युक्त तीनों गुण प्रकृतिके कार्य हैं और जीव स्वयं प्रकृति और उसके कार्य गुणोंसे सर्वथा रहित है। गुणोंके साथ सम्बन्ध जोड़नेके कारण ही वह स्वयं निलिप्त, गुणातीत होता हुआ भी गुणोंके द्वारा बँध जाता है। अतः अपने वास्तविक स्वरूपका लक्ष्य रखनेसे ही साधक गुणोंके बन्धनसे छूट सकता है।

सम्बन्ध—बाँधनेसे पहले तीनों गुण क्या करते हैं—इसको आगेके श्लोकमें बताते हैं।

सत्त्वं सुखे सज्जयति रजः कर्मणि भारत।

ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे सज्जयत्युत ॥ १ ॥

भारत= हे भरतवंशोद्भव(मनुष्यपर)आवृत्य= ढककर
अर्जुन!सज्जयति= विजयउत
सत्त्वम्= सत्त्वगुणकरता है।प्रमादे
सुखे= सुखमें (और)तु= परन्तु
रजः= रजोगुणतमः= तमोगुणसज्जयति
कर्मणि= कर्ममें लगाकरज्ञानम्= ज्ञानको

व्याख्या —‘सत्त्वं सुखे सज्जयति ’—सत्त्वगुण साधकको सुखमें लगाकर अपनी विजय करता है, साधकको अपने वशमें करता है। तात्पर्य है कि जब सात्त्विक सुख आता है, तब साधककी उस सुखमें आसक्ति हो जाती है। सुखमें आसक्ति होनेसे वह सुख साधकको बाँध देता है अर्थात् उसके साधनको आगे नहीं बढ़ने देता, जिससे साधक सत्त्वगुणसे ऊँचा नहीं उठ सकता, गुणातीत नहीं हो सकता।

यद्यपि भगवान्ने पहले छठे श्लोकमें सत्त्वगुणके

द्वारा सुख और ज्ञानके संगसे बाँधनेकी बात बतायी है, तथापि यहाँ सत्त्वगुणकी विजय केवल सुखमें ही बतायी है, ज्ञानमें नहीं। इसका तात्पर्य यह है कि वास्तवमें साधक सुखकी आसक्तिसे ही बँधता है। ज्ञान होनेपर साधकमें एक अभिमान आ जाता है कि ‘मैं कितना जानकार हूँ!’ इस अभिमानमें भी एक सुख मिलता है, जिससे साधक बँध जाता है। इसलिये यहाँ सत्त्वगुणकी केवल सुखमें ही विजय बतायी है।