श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 928, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्लोक १० ]
- साधक-संजीवनी *
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‘रजः कर्मणि भारत’—रजोगुण मनुष्यको कर्ममें लगाकर अपनी विजय करता है। तात्पर्य है कि मनुष्यको क्रिया करना अच्छा लगता है, प्रिय लगता है। जैसे छोटा बालक पड़े-पड़े हाथ-पैर हिलाता है तो उसको अच्छा लगता है और उसका हाथ-पैर हिलाना बंद कर दिया जाय तो वह रोने लगता है। ऐसे ही मनुष्य कोई क्रिया करता है तो उसको अच्छा लगता है और उसकी उस क्रियाको बीचमें कोई छुड़ा दे तो उसको बुरा लगता है। यही क्रियाके प्रति आसक्ति है, प्रियता है, जिससे रजोगुण मनुष्यपर विजय करता है।
‘कर्मके फलमें तेरा अधिकार नहीं है’ (गीता—दूसरे अध्यायका सैंतालीसवाँ श्लोक) आदि वचनोंसे फलमें आसक्ति न रखनेकी तरफ तो साधकका खयाल जाता है, पर कर्मोंमें आसक्ति न रखनेकी तरफ साधकका खयाल नहीं जाता। वह ‘तेरा कर्म करनेमें ही अधिकार है; कर्म न करनेमें तेरी आसक्ति न हो’ (गीता—दूसरे अध्यायका सैंतालीसवाँ श्लोक), ‘जो योगारूढ़ होना चाहता है, उसके लिये निष्कामभावसे कर्म करना कारण है’ (गीता—छठे अध्यायका तीसरा श्लोक) आदि वचनोंसे यही समझ लेता है कि कर्म तो करने ही चाहिये। अतः वह कर्म करता है, तो कर्मोंको करते-करते उसकी उन कर्मोंमें आसक्ति,
परिशिष्ट भाव—सत्त्वगुण केवल सुख होनेपर विजय नहीं करता, प्रत्युत सुखका संग होनेपर विजय करता है—‘सुखसंगेन बध्नाति’ (गीता १४।६)। इसी तरह रजोगुण भी कर्मका संग होनेपर विजय करता है—‘तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसंगेन देहिन्म’ (१४।७)। परन्तु तमोगुण स्वरूपसे ही विजय करता है। इसलिये तमोगुणमें ‘संग’ शब्द नहीं आया है।
‘मैं सुखी हूँ’—यह सुखका संग है और ‘मैं अच्छे कर्म करनेवाला हूँ, मेरे कर्म बड़े अच्छे हैं’—यह कर्मका संग है। संग करनेसे अर्थात् अपना सम्बन्ध जोड़नेसे ही मनुष्य बँधता है।
सम्बन्ध—एक-एक गुण मनुष्यपर कैसे विजय करता है—इसको आगेके श्लोकमें बताते हैं।
रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत।
रजः सत्त्वं तमश्चैव तमः सत्त्वं रजस्तथा ॥ १० ॥
| भारत | = हे भरतवंशोद्भव | सत्त्वम् | = सत्त्वगुण | रजः | = रजोगुण (बद्धता है) |
|---|---|---|---|---|---|
| अर्जुन! | भवति | = बद्धता है, | तथा, एव | = वैसे ही | |
| रजः | = रजोगुण | सत्त्वम् | = सत्त्वगुण | सत्त्वम् | = सत्त्वगुण (और) |
| च | = और | च | = और | रजः | = रजोगुणको |
| तमः | = तमोगुणको | तमः | = तमोगुणको | (दबाकर) | |
| अभिभूय | = दबाकर | (दबाकर) | तमः | = तमोगुण (बद्धता है)। |