श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १४ ]
व्याख्या—‘रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत’— रजोगुणकी और तमोगुणकी वृत्तियोंको दबाकर सत्त्वगुण बढ़ता है अर्थात् रजोगुणकी लोभ, प्रवृत्ति, नये-नये कर्मोंका आरम्भ, अशान्ति, स्मृहा, सांसारिक भोग और संग्रहमें प्रियता आदि वृत्तियाँ और तमोगुणकी प्रमाद, आलस्य, अनावश्यक निद्रा, मूढ़ता आदि वृत्तियाँ—इन सबको ‘सत्त्वगुण’ दबा देता है और अन्तःकरणमें स्वच्छता, निर्मलता, वैराग्य, निःस्मृहता, उदारता, निवृत्ति आदि वृत्तियोंको उत्पन्न कर देता है।
‘रजः सत्त्वं तमश्चैव’— सत्त्वगुणकी और तमोगुणकी वृत्तियोंको दबाकर रजोगुण बढ़ता है अर्थात् सत्त्वगुणकी ज्ञान, प्रकाश, वैराग्य, उदारता आदि वृत्तियाँ और तमोगुणकी प्रमाद, आलस्य, अनावश्यक निद्रा, मूढ़ता आदि वृत्तियाँ—इन सबको ‘रजोगुण’ दबा देता है और अन्तःकरणमें लोभ, प्रवृत्ति, आरम्भ, अशान्ति, स्मृहा आदि वृत्तियोंको उत्पन्न कर देता है।
‘तमः सत्त्वं रजस्तथा’— वैैसे ही सत्त्वगुण और रजोगुणको दबाकर तमोगुण बढ़ता है अर्थात् सत्त्वगुणकी स्वच्छता, निर्मलता, प्रकाश, उदारता आदि वृत्तियाँ और रजोगुणकी चंचलता, अशान्ति, लोभ आदि वृत्तियाँ—इन सबको ‘तमोगुण’ दबा देता है और अन्तःकरणमें प्रमाद, आलस्य, अतिनिद्रा, मूढ़ता आदि वृत्तियोंको उत्पन्न कर देता है।
दो गुणोंको दबाकर एक गुण बढ़ता है, बढ़ा हुआ गुण मनुष्यपर विजय करता है और विजय करके मनुष्यको
परिशिष्ट भाव— जो गुण बढ़ता है, उसकी मुख्यता हो जाती है और दूसरे गुणोंकी गौणता हो जाती है। यह गुणोंका स्वभाव है।
सम्बन्ध— जब दो गुणोंको दबाकर एक गुण बढ़ता है, तब उस बढ़े हुए गुणके क्या लक्षण होते हैं—इसको बतानेके लिये पहले बढ़े हुए सत्त्वगुणके लक्षणोंका वर्णन करते हैं।
सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन्प्रकाश उपजायते। ज्ञानं यदा तदा विद्याद्विवृद्धं सत्त्वमित्युत ॥ ११ ॥
| यदा | = जब | प्रकाशः | = प्रकाश (स्वच्छता) | इति | = यह |
|---|---|---|---|---|---|
| अस्मिन् | = इस | उत | = और | विद्यात् | = जानना चाहिये |
| देहे | = मनुष्य-शरीरमें | ज्ञानम् | = विवेक | (कि) | |
| सर्वद्वारेषु | = सब द्वारों (इन्द्रियों और अन्तःकरण)में | उपजायते | = प्रकट हो जाता है, | सत्त्वम् | = सत्त्वगुण |
| तदा | = तब | विवृद्धम् | = बढ़ा हुआ है। |