श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 918, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्लोक ३ ]
- साधक-संजीवनी *
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प्रकृति और प्रकृतिजन्य गुणोंसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है। इसलिये प्रकृतिका सम्बन्ध रहनेसे जो जन्म-मरण
होता है, दुःख होता है, हलचल होती है, प्रकृतिके सम्बन्धसे रहित महापुरुषमें वह जन्म-मरण, दुःख आदि नहीं होते।
परिशिष्ट भाव —कारणशरीरके सम्बन्धसे 'निर्विकल्प स्थिति' होती है और कारणशरीरसे सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर (स्वयंमें) 'निर्विकल्प बोध' होता है। निर्विकल्प स्थिति तो सविकल्पमें बदल जाती है, पर निर्विकल्प बोध सविकल्पमें नहीं बदलता। तात्पर्य है कि निर्विकल्प स्थितिमें परिवर्तन होता है, पर निर्विकल्प बोधमें कभी परिवर्तन नहीं होता, वह सदा ज्यों-का-त्यों रहता है। इस बातको यहाँ 'सर्गोऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च' पदोंसे कहा गया है।
महासर्ग और महाप्रलय प्रकृतिमें होते हैं। प्रकृतिसे अतीत तत्त्व (परमात्मा)-की प्राप्ति होनेपर महासर्ग और महाप्रलयका कोई असर नहीं पड़ता; क्योंकि प्रकृतिसे सम्बन्ध ही नहीं रहता। प्रकृतिसे सम्बन्ध न रहनेको 'आत्यन्तिक प्रलय' भी कहा गया है। तात्पर्य है कि प्रकृतिके कार्य शरीरको पकड़नेसे मनुष्य परतन्त्र हो जाता है*, जन्म-मरणमें पड़ जाता है; परन्तु प्रकृतिके कार्यसे सम्बन्ध-विच्छेद करनेपर वह स्वतन्त्र हो जाता है, निरपेक्ष जीवन हो जाता है, जन्म-मरणसे सदाके लिये छूट जाता है।
'मम साधर्म्यमागताः' पदोंका तात्पर्य है कि जैसे परमात्मा सत्-चित्-आनन्दस्वरूप हैं, ऐसे ही उनको प्राप्त होनेवाले ज्ञानी महापुरुष भी सत्-चित्-आनन्दस्वरूप हो जाते हैं।
सम्बन्ध —जो भगवान्की सधर्मताको प्राप्त हो जाते हैं, वे तो महासर्गमें भी पैदा नहीं होते; परन्तु जो प्राणी महासर्गमें पैदा होते हैं, उनके उत्पन्न होनेकी क्या प्रक्रिया है—इसको आगेके श्लोकमें बताते हैं।
मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन्नार्भ दधाम्यहम्।
सम्भवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत ॥ ३ ॥
भारत | = हे भरतवंशोद्भव अर्जुन! | योनिः | = उत्पत्ति-स्थान है (और) | दधाभि | = स्थापन करता हूँ। ---|---|---|---|---|--- मम | = मेरी | अहम् | = मैं | ततः | = उससे महत, ब्रह्म | = मूल प्रकृति | तस्मिन् | = उसमें | सर्वभूतानाम् | = सम्पूर्ण प्राणियोंकी तो | | गर्भम् | = जीवरूप गर्भका | सम्भवः | = उत्पत्ति | | | | भवति | = होती है।
व्याख्या —'मम योनिर्महद्ब्रह्म'—यहाँ मूल प्रकृतिको 'महद्ब्रह्म' नामसे कहा गया है, इसके कई कारण हो सकते हैं; जैसे—
(१) परमात्मा छोटे-पन और बड़े-पनसे रहित हैं; अतः वे सूक्ष्म-से-सूक्ष्म भी हैं और महान्-से-महान् भी हैं—'अणोरणीयान्महतो महीयान्' (श्वेताश्वतरोपनिषद् ३।२०)। परन्तु संसारकी दृष्टिसे सबसे बड़ी चीज मूल प्रकृति ही है अर्थात् संसारमें सबसे बड़ा व्यापक तत्त्व मूल प्रकृति ही है। परमात्माके सिवाय संसारमें इससे बड़कर कोई व्यापक तत्त्व नहीं है। इसलिये इस मूल प्रकृतिको यहाँ 'महद्ब्रह्म' कहा गया है।
(२) 'महत' (महतत्त्व अर्थात् समष्टि बुद्धि) और 'ब्रह्म'-(परमात्मा- के बीचमें होनेसे मूल प्रकृतिको 'महद्ब्रह्म' कहा गया है।
(३) पीछेके (दूसरे) श्लोकमें 'सर्गोऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च' पदोंमें आये 'सर्ग' और 'प्रलय' शब्दोंका अर्थ क्रमशः ब्रह्माका दिन और ब्रह्माकी रात माना जा सकता है। अतः उनका अर्थ महासर्ग (ब्रह्माका प्रकट होना) और महाप्रलय (ब्रह्माका लीन होना) सिद्ध करनेके लिये यहाँ 'महद्ब्रह्म' शब्द दिया है। तात्पर्य है कि जीवन्मुक्त महापुरुषोंका इस मूल प्रकृतिसे ही सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है, इसलिये वे महासर्गमें भी पैदा
- 'कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः' (३।५)
'अवशं प्रकृतेर्वशात्' (१।८)
'रात्र्यागमेऽवशः पार्थ प्रभवत्यहगामे' (८।१९)