श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १४ ]
‘परां सिद्धिम्’ कहनेका तात्पर्य है कि सांसारिक कार्योंकी जितनी सिद्धियाँ हैं अथवा योग-साधनसे होनेवाली अणिमा, महिमा, गरिमा आदि जितनी सिद्धियाँ हैं, वे सभी वास्तवमें असिद्धियाँ ही हैं। कारण कि वे सभी जन्म-
मरण देनेवाली, बन्धनमें डालनेवाली, परमात्मप्राप्तिमें बाधा डालनेवाली हैं। परन्तु परमात्मप्राप्तिरूप जो सिद्धि है, वह सर्वोत्कृष्ट है; क्योंकि उसको प्राप्त होनेपर मनुष्य जन्म-मरणसे छूट जाता है।
परिशिष्ट भाव —(यह चौदहवाँ अध्याय तेरहवें अध्यायका ही परिशिष्ट है।) श्रेष्ठ-क्षेत्रज्ञके विभागका ज्ञान सम्पूर्ण लौकिक-पारलौकिक ज्ञानोंसे उत्तम तथा सर्वोत्कृष्ट है। यह ज्ञान परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिका रामबाण उपाय है, इसलिये इस ज्ञानको प्राप्त करनेवाले सब-के-सब साधक परमात्मतत्त्वको प्राप्त हो जाते अर्थात् मुक्त हो जाते हैं।
‘ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम्’ पदोंका तात्पर्य है—सात्विक, राजस और तामस ज्ञानसे तथा लौकिक-पारलौकिक ज्ञानसे भी उत्तम, आखिरी ज्ञान। इस ज्ञानके सिवाय दूसरा कोई ज्ञान परमसिद्धि प्राप्त नहीं करा सकता। एक परमात्मतत्त्वके सिवाय कुछ भी नहीं है—ऐसा अनुभव हो जाना ही परमसिद्धिकी प्राप्ति है। तात्पर्य है कि परमसिद्धि प्राप्त होनेपर क्रिया तथा पदार्थका अत्यन्त अभाव हो जाता है और एक चिन्मय सत्ताके सिवाय कोई जड़ वस्तु रहती ही नहीं, जो कि वास्तवमें है।
इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः।
सर्गैऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च ॥ २ ॥
इदम् = इस ज्ञानम् = ज्ञानका उपाश्रित्य = आश्रय लेकर मम = (जो मनुष्य) मेरी
साधर्म्यम् = सधर्माका आगताः = प्राप्त हो गये हैं, सर्गैः = (वे) महासर्गमें अपि = भी
न, उपजायन्ते = पैदा नहीं होते च = और प्रलये = महाप्रलयमें भी न, व्यथन्ति = व्यथित नहीं होते।
व्याख्या —‘इदं ज्ञानमुपाश्रित्य’—पूर्वश्लोकमें भगवान्ने उत्तम और पर—इन दो विशेषणोंसे जिस ज्ञानकी महिमा कही थी, उस ज्ञानका अनुभव करना ही उसका आश्रय लेना है। उस ज्ञानका अनुभव होनेसे मनुष्यके सम्पूर्ण संशय मिट जाते हैं और वह ज्ञानस्वरूप हो जाता है।
‘मम साधर्म्यमागताः’ —उस ज्ञानका आश्रय लेकर मनुष्य मेरी सधर्माका प्राप्त हो जाते हैं अर्थात् जैसे मेरेमें कर्तृत्व-भोक्तृत्व नहीं है, ऐसे ही उनमें भी कर्तृत्व-भोक्तृत्व नहीं रहता। जैसे मैं सदा ही निलिप्त-निर्विकार रहता हूँ, ऐसे ही उनको भी अपनी निलिप्तता-निर्विकारताका अनुभव हो जाता है।
ज्ञानी महापुरुष भगवान्के समान निलिप्त-निर्विकार तो हो जाते हैं, पर वे भगवान्के समान संसारकी उत्पत्ति, पालन और संहारका कार्य नहीं कर सकते। हाँ, योगाभ्यासके बलसे किसी योगीमें कुछ सामर्थ्य आ जाती है, पर वह सामर्थ्य भी भगवान्की सामर्थ्यके समान नहीं होती। कारण कि वह ‘युंजान योगी’ है अर्थात् उसने अभ्यास करके कुछ सामर्थ्य प्राप्त की है। परन्तु भगवान् ‘मुक्त योगी’ हैं अर्थात् भगवान्में सामर्थ्य सदासे स्वतःसिद्ध है। भगवान् सब कुछ करनेमें समर्थ हैं—‘कर्तुमकर्तुमन्यथा कर्तुं समर्थः।’
योगीकी सामर्थ्य तो सीमित होती है, पर भगवान्की सामर्थ्य असीम होती है।
‘सर्गैऽपि नोपजायन्ते’ —यहाँ ‘अपि’ पदसे यह मालूम होता है कि वे ज्ञानी महापुरुष महासर्गके आरम्भमें भी उत्पन्न नहीं होते। महासर्गके आदिमें चौदह लोकोंकी तथा उन लोकोंके अधिकारियोंकी उत्पत्ति होती है, पर वे महापुरुष उत्पन्न नहीं होते अर्थात् उनको फिर कर्मपरवश होकर शरीर धारण नहीं करना पड़ता।
‘प्रलये न व्यथन्ति च’ —महाप्रलयमें संवर्तक अगिन्से चर-अचर सभी प्राणी भस्म हो जाते हैं। समुद्रके बढ़ जानेसे पृथ्वी डूब जाती है। चौदह लोकोंमें हलचल, हाहाकार मच जाता है। सभी प्राणी दुःखी होते हैं, नष्ट होते हैं। परन्तु महाप्रलयमें उन ज्ञानी महापुरुषोंको कोई दुःख नहीं होता, उनमें कोई हलचल नहीं होती, विकार नहीं होता। वे महापुरुष जिस तत्त्वको प्राप्त हो गये हैं, उस तत्त्वमें हलचल, विकार है ही नहीं, तो फिर वे महापुरुष व्यथित कैसे हो सकते हैं? नहीं हो सकते।
महासर्गमें भी उत्पन्न न होने और महाप्रलयमें भी व्यथित न होनेका तात्पर्य यह है कि ज्ञानी महापुरुषका