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भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

पृष्ठ 916, कुल 1299 में से

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पृष्ठ 916

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥

अथ चतुर्दशोऽध्यायः

अवतरणिका—

श्रीभगवान्ने तेरहवें अध्यायके अन्तमें कहा कि ज्ञानचक्षुसे क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके भेदको देखनेवाला परमात्माको प्राप्त हो जाता है। अब प्रश्न होता है कि वह ज्ञान क्या है और उसकी क्या महिमा है तथा उस ज्ञानकी प्राप्तिका सरल उपाय क्या है? इसका वर्णन करनेके लिये भगवान् चौदहवें अध्यायका विषय आरम्भ करते हैं।

बन्धन दोसे होता है—प्रकृतिसे और प्रकृतिके कार्य गुणोंसे। प्रकृतिके बन्धनसे छूटनेके लिये भगवान्ने तेरहवें अध्यायका विषय बता दिया। अब प्रकृतिके कार्य गुणोंके बन्धनसे छूटनेके लिये भगवान् चौदहवें अध्यायका विषय आरम्भ करते हुए पहले दो श्लोकोंमें ज्ञानकी महिमाका वर्णन करते हैं।

श्रीभगवानुवाच

परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम्। यज्ञात्वा मुनयः सर्वे परां सिद्धिमितो गताः ॥ १ ॥

श्रीभगवान् बोले—

ज्ञानानाम्= सम्पूर्ण ज्ञानोंमेंप्रवक्ष्यामि= कहूँगा,इतः= इस संसारसे
उत्तमम्= उत्तम (और)यत्= जिसको(मुक्त होकर)
परम्= श्रेष्ठज्ञात्वा= जानकरपराम्= परम
ज्ञानम्= ज्ञानको (में)सर्वे= सब-के-सबसिद्धिम्= सिद्धिको
भूयः= फिरमुनयः= मुनिलोगगताः= प्राप्त हो गये हैं।

व्याख्या—‘परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम्’ —तेरहवें अध्यायके अठारहवें, तेईसवें और चौतीसवें श्लोकमें भगवान्ने क्षेत्र-क्षेत्रज्ञका, प्रकृति-पुरुषका जो ज्ञान (विवेक) बताया था, उसी ज्ञानको फिर बतानेके लिये भगवान् ‘भूयः प्रवक्ष्यामि’ पदोंसे प्रतिज्ञा करते हैं। लौकिक और पारलौकिक जितने भी ज्ञान हैं अर्थात् जितनी भी विद्याओं, कलाओं, भाषाओं, लिपियों आदिका ज्ञान है, उन सबसे प्रकृति-पुरुषका भेद बतानेवाला, प्रकृतिसे अतीत करनेवाला, परमात्माकी प्राप्ति करानेवाला यह ज्ञान श्रेष्ठ है, सर्वोत्कृष्ट है। इसके समान दूसरा कोई ज्ञान है ही नहीं, हो सकता ही नहीं और होना सम्भव भी नहीं। कारण कि दूसरे सभी ज्ञान संसारमें फैसानेवाले हैं, बन्धनमें डालनेवाले हैं।

यद्यपि ‘उत्तम’ और ‘पर’—इन दोनों शब्दोंका एक ही अर्थ होता है, तथापि जहाँ एक अर्थके दो शब्द एक

साथ आ जाते हैं, वहाँ उनके दो अर्थ होते हैं। अतः यहाँ ‘उत्तम’ शब्दका अर्थ है कि यह ज्ञान प्रकृति और उसके कार्य संसार-शरीरसे सम्बन्ध-विच्छेद करानेवाला होनेसे श्रेष्ठ है; और ‘पर’ शब्दका अर्थ है कि यह ज्ञान परमात्माकी प्राप्ति करानेवाला होनेसे सर्वोत्कृष्ट है।

‘यज्ञात्वा मुनयः सर्वे परां सिद्धिमितो गताः’ —जिस ज्ञानको जानकर अर्थात् जिसका अनुभव करके बड़े-बड़े मुनिलोग इस संसारसे मुक्त होकर परमात्माको प्राप्त हो गये हैं, उसको मैं कहूँगा। उस ज्ञानको प्राप्त करनेपर कोई मुक्त हो और कोई मुक्त न हो—ऐसा होता ही नहीं, प्रत्युत इस ज्ञानको प्राप्त करनेवाले सब-के-सब मुनिलोग मुक्त हो जाते हैं, संसारके बन्धनसे, संसारकी परवशतासे छूट जाते हैं और परमात्माको प्राप्त हो जाते हैं।

तत्त्वका मनन करनेवाले जिस मनुष्यका शरीरके साथ अपनापन नहीं रहा, वह ‘मुनि’ कहलाता है।