श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें९१४ * श्रीमद्भगवद्गीता * [ अध्याय १३
परन्तु प्रकाश होते ही ये सब भय मिट जाते हैं। ऐसे ही
सर्वत्र परिपूर्ण प्रकाशस्वरूप परमात्मासे विमुख
होनेपर अन्धकारस्वरूप संसारकी स्वतन्त्र सत्ता सर्वत्र
दीखने लग जाती है और तरह-तरहके भय सताने लग
जाते हैं। परन्तु वास्तविक बोध होनेपर संसारकी स्वतन्त्र
सत्ता नहीं रहती और सब भय मिट जाते हैं। एक
प्रकाशस्वरूप परमात्मा ही शेष रह जाता है। अँधेरेको
मिटानेके लिये तो प्रकाशको लाना पड़ता है, परमात्माको
कहींसे लाना नहीं पड़ता। वह तो सब देश, काल, वस्तु,
व्यक्ति, परिस्थिति आदिमें ज्यों-का-त्यों परिपूर्ण है।
इसलिये संसारसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर उसका
अनुभव अपने-आप हो जाता है।
परिशिष्ट भाव-क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके विभागका ज्ञान 'विवेक' कहलाता है। जो साधक इस विवेकको महत्त्व
देकर क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके विभागको ठीक-ठीक जान लेते हैं तथा प्रकृति और उसके कार्य (शरीर)-को स्वयंसे सर्वथा
अलग अनुभव कर लेते हैं, वे चिन्मय परमात्मतत्त्वको प्राप्त हो जाते हैं। उनकी दृष्टिमें एक चिन्मय तत्त्वके सिवाय
कुछ नहीं रहता।
भगवान्ने 'मद्भावायोपपद्यते' (१३।१८) पदसे सगुणकी प्राप्ति बतायी है और यहाँ 'ये विदुर्यान्ति ते परम्'
पदोंने निर्गुणकी प्राप्ति बतायी है। वास्तवमें 'मद्भाव' और 'परम्' की प्राप्ति एक ही है (गीता-आठवें अध्यायका
इक्कीसवाँ और चौदहवें अध्यायका सत्ताइसवाँ श्लोक)।
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे
क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोगो नाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥
इस प्रकार ॐ, तत्, सत्-इन भगवान्नामोंके उच्चारणपूर्वक ब्रह्मविद्या और योगशास्त्रमय
श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषदरूप श्रीकृष्णार्जुनसंवादमें 'क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग' नामक तेरहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १३ ॥
इस (तेरहवें) अध्यायमें क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके विभागका
वर्णन किया गया है। क्षेत्र अलग है और क्षेत्रज्ञ अलग है-
ऐसा अनुभव हो जानेसे क्षेत्रज्ञका परमात्माके साथ योग हो
जाता है, जो कि नित्य है। इसलिये इस अध्यायका नाम
'क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग' रखा गया है।
तेरहवें अध्यायके पद, अक्षर और उवाच
(१) इस अध्यायमें 'अथ त्रयोदशोऽध्यायः' के
तीन, 'श्रीभगवानुवाच' के दो, श्लोकोंके चार सौ आठ
और पुष्पिकाके तेरह पद हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण पदोंका
योग चार सौ छब्बीस है।
(२) इस अध्यायमें 'अथ त्रयोदशोऽध्यायः' के
आठ, 'श्रीभगवानुवाच' के सात, श्लोकोंके एक हजार
अठ्ठासी और पुष्पिकाके बावन अक्षर हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण
अक्षरोंका योग एक हजार एक सौ पचपन है। इस
अध्यायके सभी श्लोक बत्तीस अक्षरोंके हैं।
(३) इस अध्यायमें एक उवाच है-'श्रीभगवानुवाच'।
तेरहवें अध्यायमें प्रयुक्त छन्द
इस अध्यायके चौंतीस श्लोकोंमेंसे-पहले श्लोकके
प्रथम चरणमें तथा अठारहवें श्लोकके तृतीय चरणमें 'मगण'
प्रयुक्त होनेसे 'म-विपुला'; सत्रहवें श्लोकके तृतीय चरणमें
तथा इकतीसवें श्लोकके प्रथम चरणमें 'रगण' प्रयुक्त होनेसे
'र-विपुला'; और तेईसवें श्लोकके प्रथम चरणमें 'नगण'
प्रयुक्त होनेसे 'न-विपुला' संज्ञावाले छन्द हैं। शेष उनतीस
श्लोक ठीक 'पथ्यावक्त्र' अनुष्टुप् छन्दके लक्षणोंसे युक्त हैं।