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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १३ ]

अपना सम्बन्ध माननेसे ही उसको अपने स्वरूपका अनुभव नहीं होता था। परन्तु जब वह सबको प्रकृतिमें ही स्थित और प्रकृतिसे ही उत्पन्न देखता है, तब उसको अपने स्वतःसिद्ध स्वरूपका अनुभव हो जाता है।

जैसे पृथ्वीसे उत्पन्न होनेवाले स्थावर-जंगम जितने भी शरीर हैं तथा उन शरीरोंमें जो कुछ भी परिवर्तन होता है, रूपान्तर होता है१ क्रियाएँ होती हैं२ वे सब पृथ्वीपर ही होती हैं। ऐसे ही प्रकृतिसे उत्पन्न होनेवाले जितने गुण, विकार हैं तथा उनमें जो कुछ परिवर्तन होता है, घट-बद्ध होती है, वह सब-की-सब प्रकृतिमें ही होती है। तात्पर्य है कि जैसे पृथ्वीसे पैदा होनेवाले पदार्थ पृथ्वीमें ही स्थित रहनेसे और पृथ्वीमें लीन होनेसे पृथ्वीरूप ही हैं, ऐसे ही प्रकृतिसे पैदा होनेवाला सब संसार प्रकृतिमें ही स्थित रहनेसे और प्रकृतिमें ही लीन होनेसे प्रकृतिरूप ही है। इसी प्रकार स्थावर-जंगम प्राणियोंके रूपमें जो चेतन-तत्त्व है, वह निरन्तर परमात्मामें

परिशिष्ट भाव— पूर्वश्लोकमें व्यक्ति की बात और प्रस्तुत श्लोकमें कालकी बात आयी है।

भक्तिके प्रकरणमें भगवान्ने सम्पूर्ण भावोंको अपनेमें बताया है—‘भवन्ति भावा भूतानां मत् एव पृथग्विधाः’ (१०।५), पर यहाँ ज्ञानके प्रकरणमें सम्पूर्ण भावोंको प्रकृतिमें बताया है। तात्पर्य है कि जहाँ सत्-असत्का विभाग किया है, वहाँ सब भाव असत्में कहे हैं और जहाँ समग्रकी बात कही है, वहाँ सब भाव अपनेमें कहे हैं। समग्रमें सत्-असत् सब कुछ परमात्मा ही हैं—‘सदसच्चाहम्’ (१।१९)

सम्बन्ध—बाईसवें श्लोकमें जिसको देहसे पर बताया है और पीछेके (तीसवें) श्लोकमें जिसका ब्रह्मको प्राप्त होना बताया है, उस पुरुष-(चेतन-) के वास्तविक स्वरूपका वर्णन आगेके श्लोकमें करते हैं।

अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः ।

शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते ॥ ३१ ॥

कौन्तेय= हे कुन्तीनन्दन!अव्ययः= अविनाशी= न
अयम्= यह (पुरुष स्वयं)परमात्मा= परमात्मस्वरूपकरोति= करता है
अनादित्वात्= अनादि होनेसेही है।(और)
(और)शरीरस्थः= यह शरीरमें= न
निर्गुणत्वात्= गुणोंसे रहितरहता हुआलिप्यते= लिप्त
होनेसेअपि= भीहोता है।

१-पहले मिट्टी और बीजको तौल ले और एक पात्रमें वह तुली हुई मिट्टी बिछाकर बीज बो दे और पानी सींच दे। फसल होनेपर उसको काटकर अनाज तैयार कर ले और मिट्टीको सूखने दे। सूखनेके बाद मिट्टी और अनाजको तौलकर देखे तो मिट्टीका वजन कम तथा अनाजका वजन ज्यादा होगा। यह मिट्टी-(पृथ्वी-) का अनाजमें रूपान्तर होना है

२-क्रियाएँ दो तरह की होती हैं—होना और करना। बालकका जवान और बूढ़ा होना आदि क्रियाएँ ‘होती’ हैं और खाना-पीना आदि क्रियाएँ ‘करते’ हैं। ये सब क्रियाएँ शरीरमें ही होती हैं।