श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 908, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्लोक ३० ]
- साधक-संजीवनी *
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खाना-पीना, चलना-फिरना, उठना-बैठना, घटना-बढ़ना, हिलना-डुलना, सोना-जागना, चिन्तन करना, समाधिस्थ होना आदि जो कुछ भी क्रियाएँ होती हैं, वे सभी प्रकृतिके द्वारा ही होती हैं, स्वयंके द्वारा नहीं; क्योंकि स्वयंमें कोई क्रिया होती ही नहीं—ऐसा जो देखता है अर्थात् अनुभव करता है, वही वास्तवमें ठीक देखता है। कारण कि ऐसा देखनेसे अपनेमें अकर्तृत्व-(अकर्तापन-) का अनुभव हो जाता है।
परिशिष्ट भाव —जितनी भी क्रियाएँ होती हैं, वे सब-की-सब प्रकृति-विभागमें ही होती हैं। इसमें जीवका हाथ नहीं है। प्रकृतिके द्वारा होनेवाली क्रियाओंको ही गीतामें कहीं 'गुणोंसे होनेवाली क्रियाएँ' और कहीं 'इन्द्रियोंसे होनेवाली क्रियाएँ' कहा गया है; जैसे—सम्पूर्ण कर्म सब प्रकारसे प्रकृतिके गुणोंद्वारा किये जाते हैं—'प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणेः कर्माणि सर्वशः ' (३।२७); गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं—'गुणा गुणेषु वर्तन्ते ' (३।२८); गुणोंके सिवाय अन्य कोई कर्ता है ही नहीं—'नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति ' (१४।१९); इन्द्रियाँ ही इन्द्रियोंके विषयोंमें बरत रही हैं—'इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्ते ' (५।९) आदि। तात्पर्य है कि क्रियामात्र प्रकृतिजन्य ही है। अतः प्रकृति कभी किंचिन्मात्र भी अक्रिय नहीं होती और पुरुषमें कभी किंचिन्मात्र भी क्रिया नहीं होती। इसलिये गीतामें आया है कि तत्त्वको जाननेवाला सांख्ययोगी 'मैं (स्वयं) लेशमात्र भी कुछ नहीं करता हूँ'—ऐसा अनुभव करता है—'नैव किंचित्करोमीति युक्तो मन्यते तत्त्ववित् ' (५।८); स्वयं न करता है, न करवाता है—'नैव कुर्वन् कारयन् ' (५।१३); यह पुरुष शरीरमें रहता हुआ भी न करता है, न लिप्त होता है—'शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते ' (१३।३१); जो आत्माको कर्ता मानता है, वह दुर्मीत ठीक नहीं समझता; क्योंकि उसकी बुद्धि शुद्ध नहीं है—'तत्रैव सति कर्तारमात्मानं..... ' (१८।१६) आदि।
यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति।
तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा ॥ ३० ॥
| यदा | = जिस कालमें | स्थित | विस्तारम् | = विस्तार (देखता है), |
|---|---|---|---|---|
| (साधक) | अनुपश्यति | = देखता है | तदा | = उस कालमें |
| भूतपृथग्भावम् | = प्राणियोंके | च | = और | |
| अलग-अलग | ततः | = उस प्रकृतिसे | ब्रह्म | = ब्रह्मको |
| भावोंको | एव | = ही (उन | सम्पद्यते | = प्राप्त हो |
| एकस्थम् | = एक प्रकृतिमें ही | सबका) |
व्याख्या —[प्रकृतिके दो रूप हैं—क्रिया और पदार्थ। क्रियासे सम्बन्ध-विच्छेद करनेके लिये उन्तीसवों श्लोक कहा, अब पदार्थसे सम्बन्ध-विच्छेद करनेके लिये यह तीसवों श्लोक कहते हैं।]
'यदा भूतपृथग्भावं ..... ब्रह्म सम्पद्यते तदा '—जिस कालमें साधक सम्पूर्ण प्राणियोंके अलग-अलग भावोंको अर्थात् त्रिलोकीमें जितने जरायुज, अण्डज, उद्भिज्ज और स्वेदज प्राणी पैदा होते हैं, उन प्राणियोंके स्थूल, सूक्ष्म और कारण-शरीरोंको एक प्रकृतिमें ही स्थित
यहाँ क्रियाओंको प्रकृतिके द्वारा होनेवाली बताया है, कहीं गुणोंके द्वारा होनेवाली बताया है और कहीं इन्द्रियोंके द्वारा होनेवाली बताया है—ये तीनों बातें एक ही हैं। प्रकृति सबका कारण है, गुण प्रकृतिके कार्य हैं और गुणोंका कार्य इन्द्रियाँ हैं। अतः प्रकृति, गुण और इन्द्रियाँ—इनके द्वारा होनेवाली सभी क्रियाएँ प्रकृतिके द्वारा होनेवाली ही कही जाती हैं।
देखता है, उस कालमें वह ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है। त्रिलोकीके स्थावर-जंगम प्राणियोंके शरीर, नाम, रूप, आकृति, मनोवृत्ति, गुण, विकार, उत्पत्ति, स्थिति, प्रलय आदि सब एक प्रकृतिसे ही उत्पन्न हैं। सम्पूर्ण प्राणियोंके शरीर प्रकृतिसे ही उत्पन्न होते हैं, प्रकृतिमें ही स्थित रहते हैं और प्रकृतिमें ही लीन होते हैं। इस प्रकार देखनेवाला ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है अर्थात् प्रकृतिसे अतीत स्वतःसिद्ध अपने स्वरूप परमात्मतत्त्वको प्राप्त हो जाता है। वास्तवमें वह पहलेसे ही प्राप्त था, केवल प्रकृतिजन्य पदार्थोंके साथ