श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 898, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्लोक २२ ]
- साधक-संजीवनी *
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न रहनेसे लोहा पृथ्वीपर ही रह जाता है और अग्नि निराकार अग्नि-तत्त्वमें लीन हो जाती है, ऐसे ही अहम् तो प्रकृतिमें ही रह जाता है और 'हूँ' ('है' का स्वरूप होनेसे) 'है' में ही विलीन हो जाता है। 'है' में कर्तापन और भोक्तापन नहीं है। तात्पर्य है कि भोगोंमें 'हूँ' खिंचता है, 'है' नहीं खिंचता। 'हूँ' ही कर्ता-भोक्ता बनता है, 'है' 'कर्ता-भोक्ता' नहीं बनता। अतः साधक 'हूँ' को न मानकर 'है' को ही माने अर्थात् अनुभव करे।
सुख-दुःखके आने-जानेका और स्वयंके रहनेका अनुभव सबको है। पापी-से-पापी मनुष्यको भी इसका अनुभव है। ऐसा अनुभव होनेपर भी मनुष्य आगन्तुक सुख-दुःखके साथ मिलकर सुखी-दुःखी हो जाता है। इसका कारण यह है कि सुखकी आसक्ति और दुःखका भय रहनेसे 'मैं अलग हूँ और सुख-दुःख अलग हूँ'—यह विवेक काम नहीं करता। वास्तवमें स्वयं सुखी-दुःखी नहीं होता, प्रत्युत शरीरके साथ मिलकर अपनेको सुखी-दुःखी मान लेता है। तात्पर्य है कि सुख-दुःख केवल अविवेकपूर्वक की गयी मान्यतापर टिके हुए हैं।
सम्बन्ध—उन्नीसवें, बीसवें और इक्कीसवें श्लोकमें प्रकृति और पुरुषका वर्णन हुआ। अब आगेके श्लोकमें पुरुषका विशेषतासे वर्णन करते हैं।
उपद्रष्टानुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः।
परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन् पुरुषः परः ॥ २२ ॥
यह पुरुष—
| उपद्रष्टा | = (शरीरके साथ सम्बन्ध रखनेसे) | भोक्ता | = (उसके संगसे सुख-दुःख भोगनेसे) | परमात्मा | = 'परमात्मा'— |
|---|---|---|---|---|---|
| 'उपद्रष्ट', | 'भोक्ता' | इति | = इस नामसे | ||
| अनुमन्ता | = (उसके साथ मिलकर सम्मति, अनुमति देनेसे) | च | = और | उक्तः | = कहा जाता है। |
| 'अनुमन्ता', | महेश्वरः | = (अपनेको उसका स्वामी माननेसे) | (यह) | ||
| भर्ता | = (अपनेको उसका भरण-पोषण करनेवाला माननेसे) | 'महेश्वर' (बन जाता है)। | अस्मिन् | = इस | |
| 'भर्ता', | च | = परन्तु | देहे, अपि | = देहमें रहता हुआ भी | |
| पुरुषः | = (स्वरूपसे यह) | (देहसे) | |||
| पुरुष | परः | = पर (सर्वथा सम्बन्धरहित) | |||
| ही है। |
व्याख्या —'उपद्रष्टानुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः'—यह पुरुष स्वरूपसे नित्य है, सब जगह परिपूर्ण है, स्थिर है, अचल है, सदा रहनेवाला है (गीता—दूसरे अध्यायका चौबीसवाँ श्लोक)। ऐसा होता हुआ भी जब यह प्रकृति और उसके कार्य शरीरकी तरफ दृष्टि डालता है अर्थात् उनके साथ अपना सम्बन्ध मानता है, तब इसकी 'उपद्रष्टा' संज्ञा हो जाती है।
यह हरेक कार्यके करनेमें सम्मति, अनुमति देता है। अतः इसका नाम 'अनुमन्ता' है।
यह एक व्यक्ति शरीरके साथ मिलकर, उसके साथ तादात्म्य करके अन्न-जल आदिसे शरीरका पालन-पोषण करता है; शीत-उष्ण आदिसे उसका संरक्षण करता है।
अतः इसका नाम 'भर्ता' हो जाता है।
यह शरीरके साथ मिलकर अनुकूल परिस्थितिके आनेसे अपनेको सुखी मानता है और प्रतिकूल परिस्थितिके आनेसे अपनेको दुःखी मानता है। अतः इसकी 'भोक्ता' संज्ञा हो जाती है।
यह अपनेको शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि तथा धन, सम्पत्ति आदिका मालिक मानता है। अतः यह 'महेश्वर' नामसे कहा जाता है।
'परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन् पुरुषः परः'—पुरुष सर्वोत्कृष्ट है, परम आत्मा है, इसलिये शास्त्रोंमें इसको 'परमात्मा' नामसे कहा गया है। यह देहमें रहता हुआ भी देहके सम्बन्धसे स्वतः रहित है। आगे इसी अध्यायके