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भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १३ ]

व्याख्या—‘पुरुषः प्रकृतिस्थो’ * हि भुङ्क्ते प्रकृतिजानुगुणान् —वास्तवमें पुरुष प्रकृति-(शरीर-) में स्थित है ही नहीं। परन्तु जब वह प्रकृति-(शरीर-) के साथ तादात्म्य करके शरीरको ‘मैं’ और ‘मेरा’ मान लेता है, तब वह प्रकृतिमें स्थित कहा जाता है। ऐसा प्रकृतिस्थ पुरुष ही (गुणोंके द्वारा रचित अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितिको सुखदायी-दुःखदायी मानकर) अनुकूल परिस्थितिके आने-पर सुखी होता है और प्रतिकूल परिस्थितिके आनेपर दुःखी होता है। यही पुरुषका प्रकृतिजन्म गुणोंका भोक्ता बनना है।

जैसे मोटर-दुर्घटनामें मोटर और चालक—दोनोंका हाथ रहता है। क्रियाके होनेमें तो केवल मोटरकी ही प्रधानता रहती है, पर दुर्घटनाका फल (दण्ड) मोटरसे अपना सम्बन्ध जोड़नेवाले चालक-(कर्ता-) को ही भोगना पड़ता है। ऐसे ही सांसारिक कार्योंको करनेमें प्रकृति और पुरुष—दोनोंका हाथ रहता है। क्रियाओंके होनेमें तो केवल शरीरकी ही प्रधानता रहती है, पर सुख-दुःखरूप फल शरीरसे अपना सम्बन्ध जोड़नेवाले पुरुष-(कर्ता-) को ही भोगना पड़ता है। अगर वह शरीरके साथ अपना सम्बन्ध न जोड़े और सम्पूर्ण क्रियाओंको प्रकृतिके द्वारा ही होती हुई माने (गीता—तेरहवें अध्यायका उन्तीसवाँ श्लोक), तो वह उन क्रियाओंका फल भोगनेवाला नहीं बनेगा।

‘कारणं गुणसंगोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु’ —जिन योनियोंमें सुखको बहुलता होती है, उनको ‘सत्-योनि’ कहते हैं और जिन योनियोंमें दुःखको बहुलता होती है, उनको ‘असत्-योनि’ कहते हैं। पुरुषका सत्-असत् योनियोंमें जन्म लेनेका कारण गुणोंका संग ही है।

सत्त्व, रज और तम—ये तीनों गुण प्रकृतिसे उत्पन्न

परिशिष्ट भाव —भगवान्ने उन्नीसवें श्लोकके उत्तरार्धमें एवं बीसवें श्लोकके पूर्वार्धमें ‘प्रकृति’ का वर्णन किया है और बीसवें श्लोकके उत्तरार्धमें और यहाँ इक्कीसवें श्लोकमें ‘पुरुष’ का वर्णन किया है।

वस्तु, व्यक्ति और क्रियाके साथ सम्बन्ध ही ‘गुणसंग’ है, जो जन्म-मरणका कारण है। गुणोंका संग अनित्य है और गुणोंसे असंगता नित्य है। असंगता हमारा स्वरूप है—‘असंगो ह्ययं पुरुषः ’ (बृहदा० ४।३।१५)। अगर हम अनित्य (गुणोंके संग)-को न पकड़ें तो जन्म-मरण हो ही नहीं सकता।

‘मैं’ जड़ (प्रकृति) है और ‘हूँ’ चेतन (पुरुष) है तथा ‘मैं हूँ’—यह जड़-चेतनका तादात्म्य है। इस ‘मैं हूँ’ में ही कर्तापन और भोक्तापन रहता है। अगर ‘मैं’ न रहे तो ‘हूँ’ नहीं रहेगा, प्रत्युत ‘है’ रहेगा। जैसे लोहे और अग्निमें तादात्म्य

  • यहाँ पुरुषको ‘प्रकृतिस्थ’ कहनेका तात्पर्य ‘शरीरस्थ’ कहना ही है। उन्नीसवें श्लोकसे प्रकृति-पुरुषका प्रकरण चल रहा है, इसीलिये यहाँ पुरुषको प्रकृतिस्थ कहा गया है। वास्तवमें पुरुष प्रकृतिस्थ अथवा शरीरस्थ नहीं है। अपनेको स्वस्थ न माननेसे अर्थात् ‘स्व’ में अपनी स्थितिका अनुभव न करनेसे ही वह अपनेको शरीरस्थ मानता है।

होते हैं। इन तीनों गुणोंसे ही सम्पूर्ण पदार्थों और क्रियाओंको उत्पत्ति होती है। प्रकृतिस्थ पुरुष जब इन गुणोंके साथ अपना सम्बन्ध मान लेता है, तब ये उसके ऊँच-नीच योनियोंमें जन्म लेनेका कारण बन जाते हैं।

प्रकृतिमें स्थित होनेसे ही पुरुष प्रकृतिजन्म गुणोंका भोक्ता बनता है और यह गुणोंका संग, आसक्ति, प्रियता ही पुरुषको ऊँच-नीच योनियोंमें ले जानेका कारण बनती है। अगर यह प्रकृतिस्थ न हो, प्रकृति-(शरीर-) में अहंता-ममता न करे, अपने स्वरूपमें स्थित रहे, तो यह पुरुष सुख-दुःखका भोक्ता कभी नहीं बनता, प्रत्युत सुख-दुःखमें सम हो जाता है, स्वस्थ हो जाता है (गीता—चौदहवें अध्यायका चौबीसवाँ श्लोक)। अतः यह प्रकृतिमें भी स्थित हो सकता है और अपने स्वरूपमें भी। अन्तर इतना ही है कि प्रकृतिमें स्थित होनेमें तो यह परतन्त्र है और स्वरूपमें स्थित होनेमें यह स्वाभाविक स्वतन्त्र है। बन्धनमें पड़ना इसका अस्वाभाविक है और मुक्त होना इसका स्वाभाविक है। इसलिये बन्धन इसको सुहाता नहीं है और मुक्त होना इसको सुहाता है।

जहाँ प्रकृति और पुरुष—दोनोंका भेद (विवेक) है, वहाँ ही प्रकृतिके साथ तादात्म्य करनेका, सम्बन्ध जोड़नेका अज्ञान है। इस अज्ञानसे ही यह पुरुष स्वयं प्रकृतिके साथ तादात्म्य कर लेता है। तादात्म्य कर लेनेसे यह पुरुष अपनेको प्रकृतिस्थ अर्थात् प्रकृति-(शरीर-) में स्थित मान लेता है। प्रकृतिस्थ होनेसे शरीरमें ‘मैं’ और ‘मेरा-पन’ हो जाता है। यही गुणोंका संग है। इस गुणसंगसे पुरुष बँध जाता है (गीता—चौदहवें अध्यायका पाँचवाँ श्लोक)। गुणोंके द्वारा बँध जानेसे ही पुरुषकी गुणोंके अनुसार गति होती है (गीता—चौदहवें अध्यायका अठारहवाँ श्लोक)।