श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 893, कुल 1299 में से
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १३ ]
परमात्माकी सत्ता। यह सिद्धान्त है कि सत्ता एक ही होती है, दो नहीं होती। भगवान्ने गीतामें ज्ञान और भक्ति—दोनोंमें ही अपने भावकी प्राप्ति बतायी है। 'ज्ञान' में इसका तात्पर्य है—ब्रह्मसे साधर्म्य होना अर्थात् जैसे ब्रह्म सत्-चित्-आनन्दरूप है, ऐसे ही ज्ञानी महापुरुषका भी सत्-चित्-आनन्दरूप होना। 'भक्ति' में इसका तात्पर्य है—भक्तकी भगवान्के साथ आत्मीयता अर्थात् अभिन्नता होना।
सम्बन्ध—इसी अध्यायके पहले और दूसरे श्लोकमें जिस क्षेत्र और क्षेत्रज्ञका संक्षेपसे वर्णन किया था, उसीका विस्तारसे वर्णन करनेके लिये आगेका प्रकरण आरम्भ करते हैं।
प्रकृतिं पुरुषं चैव विदध्यनादी उभावपि।
विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसम्भवान् ॥ १९ ॥
कार्यकरणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते।
पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते ॥ २० ॥
| प्रकृतिम् | = प्रकृति | गुणान् | = गुणोंको | हेतुः | = हेतु |
|---|---|---|---|---|---|
| च | = और | अपि | = भी | उच्यते | = कही जाती है |
| पुरुषम् | = पुरुष | प्रकृतिसम्भवान्, एव | = प्रकृतिसे ही | (और) | |
| उभौ | = दोनोंको | उत्पन्न | सुखदुःखानाम् | = सुख- | |
| एव | = ही (तुम) | विद्धि | = समझो। | दुःखोंके | |
| अनादी | = अनादि | कार्यकरणकर्तृत्वे | = कार्य और | भोक्तृत्वे | = भोक्तापनमें |
| विद्धि | = समझो | करणके द्वारा होनेवाली | पुरुषः | = पुरुष | |
| च | = और | क्रियाओंको उत्पन्न | हेतुः | = हेतु | |
| विकारान् | = विकारोंको | करनेमें | उच्यते | = कहा | |
| च | = तथा | प्रकृतिः | = प्रकृति | जाता है। |
व्याख्या —[इसी अध्यायके तीसरे श्लोकमें भगवान्ने क्षेत्रके विषयमें 'यच्च' (जो है), 'यादृक् च' (जैसा है), 'यद्विकारि' (जिन विकारोंवाला है) और 'यतश्च यत्' (जिससे जो उत्पन्न हुआ है)—ये चार बातें सुननेकी आज्ञा दी थी। उनमेंसे 'यच्च' का वर्णन पाँचवें श्लोकमें और 'यद्विकारि' का वर्णन छठे श्लोकमें कर दिया। 'यादृक् च' का वर्णन आगे इसी अध्यायके छब्बीसवें-सत्ताईसवें श्लोकोंमें करेंगे। अब 'यतश्च यत्' का वर्णन करते हुए प्रकृतिसे विकारों और गुणोंको उत्पन्न हुआ बताते हैं। इसमें भी देखा जाय तो विकारोंका वर्णन पहले छठे श्लोकमें 'इच्छा द्वेषः' आदि पदोंसे किया जा चुका है। यहाँ गुण प्रकृतिसे उत्पन्न होते हैं—यह बात नयी बतायी है।
बारहवेंसे अठारहवें श्लोकतक 'ज्ञेय तत्त्व'-(परमात्मा-) का वर्णन है और यहाँ उन्नीसवेंसे चौतीसवें श्लोकतक 'पुरुष'-(क्षेत्रज्ञ-) का वर्णन है। वहाँ तो ज्ञेय
तत्त्वके अन्तर्गत ही सब कुछ है और यहाँ पुरुषके अन्तर्गत सब कुछ है अर्थात् वहाँ ज्ञेय तत्त्वके अन्तर्गत पुरुष है और यहाँ पुरुषके अन्तर्गत ज्ञेय तत्त्व है। तात्पर्य यह है कि ज्ञेय तत्त्व (परमात्मा) और पुरुष (क्षेत्रज्ञ)—दोनों तत्त्वसे दो नहीं हैं, प्रत्युत एक ही हैं।]
'प्रकृतिं पुरुषं चैव विदध्यनादी उभावपि' —यहाँ 'प्रकृतिम्' पद सम्पूर्ण क्षेत्र-(जगत्-)की कारणरूप मूल प्रकृतिका वाचक है। सात प्रकृति-विकृति (पंचमहाभूत, अहंकार और महत्त्व) तथा सोलह विकृति (दस, इन्द्रियाँ, मन और पाँच विषय)—ये सभी प्रकृतिके कार्य हैं और प्रकृति इन सबकी मूल कारण है।
'पुरुषम्' पद यहाँ क्षेत्रज्ञका वाचक है, जिसको इसी अध्यायके पहले श्लोकमें क्षेत्रको जाननेवाला कहा गया है।
प्रकृति और पुरुष—दोनोंको अनादि कहनेका तात्पर्य है कि जैसे परमात्माका अंश यह पुरुष (जीवात्मा) अनादि