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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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पृष्ठ 867

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १३ ]

युक्तियोंसे युक्त तथा अच्छी तरहसे निश्चित किये हुए ब्रह्म-सूत्रके पदोंद्वारा भी क्षेत्र-क्षेत्रज्ञके तत्त्वका वर्णन किया गया है। इस श्लोकमें भगवान्का आशय यह मालूम देता है कि

क्षेत्र-क्षेत्रज्ञका जो संक्षेपसे वर्णन मैं कर रहा हूँ, उसे अगर कोई विस्तारसे देखना चाहे तो वह उपर्युक्त ग्रन्थोंमें देख सकता है।

सम्बन्ध—तीसरे श्लोकमें क्षेत्र-क्षेत्रज्ञके विषयमें जिन छः बातोंको संक्षेपसे सुननेकी आज्ञा दी थी, उनमेंसे क्षेत्रकी दो बातोंका अर्थात् उसके स्वरूप और विकारोंका वर्णन आगेके दो श्लोकोंमें करते हैं।

महाभूतान्यहङ्कारो बुद्धिरव्यक्तमेव च।

इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चैन्द्रियगोचराः ॥ ५ ॥

अव्यक्तम् | = मूल प्रकृति | च | = और | इन्द्रिय- | ---|---|---|---|---|--- च | = और | दश | = दस | गोचराः | = इन्द्रियोंके बुद्धिः | = समष्टि बुद्धि (महतत्त्व), | इन्द्रियाणि | = इन्द्रियाँ, | | पाँच विषय— अहङ्कारः | = समष्टि अहंकार, | एकम् | = एक मन | एव | = यही (चौबीस महाभूतानि | = पाँच महाभूत | च | = तथा | | तत्त्वोंवाला | | पञ्च | = पाँचों | | क्षेत्र है।)

व्याख्या—‘अव्यक्तमेव च’ —अव्यक्त नाम मूल प्रकृतिका है। मूल प्रकृति समष्टि बुद्धिका कारण होनेसे और स्वयं किसीका भी कार्य न होनेसे केवल ‘प्रकृति’ ही है।

‘बुद्धिः’ —यह पद समष्टि बुद्धि अर्थात् महतत्त्वका वाचक है। इस बुद्धिसे अहंकार पैदा होता है, इसलिये यह ‘प्रकृति’ है और मूल प्रकृतिका कार्य होनेसे यह ‘विकृति’ है। तात्पर्य है कि यह बुद्धि ‘प्रकृति-विकृति’ है।

‘अहंकारः’ —यह पद समष्टि अहंकारका वाचक है। इसको अहंभाव भी कहते हैं। पंचमहाभूतका कारण होनेसे यह अहंकार ‘प्रकृति’ है और बुद्धिका कार्य होनेसे यह ‘विकृति’ है। तात्पर्य है कि यह अहंकार ‘प्रकृति-विकृति’ है।

महाभूतानि —पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश—ये पाँच महाभूत हैं। महाभूत दो प्रकारके होते हैं—पंचीकृत और अपंचीकृत। एक-एक महाभूतके पाँच विभाग होकर जो मिश्रण होता है, उसको ‘पंचीकृत महाभूत’ कहते हैं*।

  • आकाशके दो विभाग हैं, जिनमेंसे आधा भाग आकाश अपने स्वरूपसे रहा और दूसरे आधे भागके चार विभाग किये। उनमेंसे उसने एक भाग वायुको, एक भाग तेजको, एक भाग जलको और एक भाग पृथ्वीको दिया। वायुके दो विभाग हैं। उनमेंसे आधा भाग वायु अपने स्वरूपसे रही और दूसरे आधे भागके चार विभाग किये, जिनको क्रमशः आकाश, तेज, जल और पृथ्वीको दिया। तेजके दो विभाग हैं। उनमेंसे आधा भाग तेज अपने स्वरूपसे रहा और दूसरे आधे भागके चार विभाग करके क्रमशः एक-एक भाग आकाश, वायु, जल और पृथ्वीको दिया। जलके दो विभाग हैं। उनमेंसे आधा भाग जल अपने स्वरूपसे रहा और दूसरे आधे भागके चार विभाग करके क्रमशः एक-एक भाग आकाश, वायु, तेज और पृथ्वीको दिया। ऐसे ही पृथ्वीके दो विभाग हैं। उनमेंसे आधा भाग पृथ्वी अपने स्वरूपसे रही और दूसरे आधे भागके चार विभाग करके क्रमशः एक-एक भाग आकाश, वायु, तेज और जलको दिया। इस तरह पाँचों महाभूतोंका पंचीकरण—मिश्रण होनेसे इसको ‘पंचीकृत महाभूत’ कहते हैं।

इन पाँच महाभूतोंके विभाग न होनेपर इनको ‘अपंचीकृत महाभूत’ कहते हैं। यहाँ इन्हीं अपंचीकृत महाभूतोंका वाचक ‘महाभूतानि’ पद है। इन महाभूतोंको ‘पंचतन्मात्राएँ’ तथा ‘सूक्ष्ममहाभूत’ भी कहते हैं।

दस इन्द्रियाँ, एक मन और शब्दादि पाँच विषयोंके कारण होनेसे ये महाभूत ‘प्रकृति’ हैं और अहंकारके कार्य होनेसे ये ‘विकृति’ हैं। तात्पर्य है कि ये पंचमहाभूत ‘प्रकृति-विकृति’ हैं।

‘इन्द्रियाणि दश’ —श्रोत्र, त्वचा, नेत्र, रसना और घ्राण—ये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं तथा वाक्, पाणि, पाद, उपस्थ और पायु—ये पाँच कर्मनेन्द्रियाँ हैं। ये दसों इन्द्रियाँ अपंचीकृत महाभूतोंसे पैदा होनेसे और स्वयं किसीका भी कारण न होनेसे केवल ‘विकृति’ ही हैं।

‘एकं च’ —अपंचीकृत महाभूतोंसे पैदा होनेसे और स्वयं किसीका भी कारण न होनेसे मन केवल ‘विकृति’ ही है।