श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 868, कुल 1299 में से
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- साधक-संजीवनी *
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‘पंच चैन्द्रियगोचराः’—शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध—ये (पाँच ज्ञानेन्द्रियोंके) पाँच विषय हैं। अर्पचीकृत महाभूतोंसे पैदा होनेसे और स्वयं किसीके भी कारण न होनेसे ये पाँचों विषय केवल ‘विकृति’ ही हैं।
इन सबका निष्कर्ष यह निकला कि पाँच महाभूत, एक अहंकार और एक बुद्धि—ये सात ‘प्रकृति-विकृति’
हैं, मूल प्रकृति केवल ‘प्रकृति’ है और दस इन्द्रियाँ, एक मन और पाँच ज्ञानेन्द्रियोंके विषय—ये सोलह केवल ‘विकृति’ हैं। इस तरह इन चौबीस तत्त्वोंके समुदायका नाम ‘क्षेत्र’ है। इसीका एक तुच्छ अंश यह मनुष्य-शरीर है, जिसको भगवान्ने पहले श्लोकमें ‘इदं शरीरम्’ और तीसरे श्लोकमें ‘तत्क्षेत्रम्’ पदसे कहा है।
इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं सङ्घातश्चेतना धृतिः ।
एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम् ॥ ६ ॥
| इच्छा | = इच्छा, | चेतना | = चेतना (प्राणशक्ति) | एतत् | = यह |
|---|---|---|---|---|---|
| द्वेषः | = द्वेष, | (और) | क्षेत्रम् | = क्षेत्र | |
| सुखम् | = सुख, | धृतिः | = धृति— | समासेन | = संक्षेपसे |
| दुःखम् | = दुःख, | सविकारम् | = इन विकारों— | उदाहृतम् | = कहा |
| सङ्घातः | = संघात (शरीर) | सहित | गया है। |
व्याख्या—‘इच्छा’—अमुक वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति आदि मिले—ऐसी जो मनमें चाहना रहती है, उसको इच्छा कहते हैं। क्षेत्रके विकारोंमें भगवान् सबसे पहले इच्छारूप विकारका नाम लेते हैं। इसका तात्पर्य यह है कि इच्छा मूल विकार है; क्योंकि ऐसा कोई पाप और दुःख नहीं है, जो सांसारिक इच्छाओंसे पैदा न होता हो अर्थात् सम्पूर्ण पाप और दुःख सांसारिक इच्छाओंसे ही पैदा होते हैं।
‘द्वेषः’—कामना और अभिमानमें बाधा लगनेपर क्रोध पैदा होता है। अन्तःकरणमें उस क्रोधका जो सूक्ष्म रूप रहता है, उसको ‘द्वेष’ कहते हैं। यहाँ ‘द्वेषः’ पदके अन्तर्गत क्रोधको भी समझ लेना चाहिये।
‘सुखम्’—अनुकूलताके आनेपर मनमें जो प्रसन्नता होती है अर्थात् अनुकूल परिस्थिति जो मनको सुहाती है, उसको ‘सुख’ कहते हैं।
‘दुःखम्’—प्रतिकूलताके आनेपर मनमें जो हलचल होती है अर्थात् प्रतिकूल परिस्थिति जो मनको सुहाती नहीं है, उसको ‘दुःख’ कहते हैं।
‘सङ्घातः’—चौबीस तत्त्वोंसे बने हुए शरीररूप समूहका नाम ‘संघात’ है। शरीरका उत्पन्न होकर सत्तारूपसे दीखना भी विकार है तथा उसमें प्रतिक्षण परिवर्तन होते रहना भी विकार है।
‘चेतना’—चेतना नाम प्राणशक्तिका है अर्थात् शरीरमें जो प्राण चल रहे हैं, उसका नाम ‘चेतना’ है। इस चेतनामें परिवर्तन होता रहता है, जैसे—सात्त्विक-वृत्ति आनेपर
प्राणशक्ति शान्त रहती है और चिन्ता, शोक, भय, उद्वेग आदि होनेपर प्राणशक्ति वैसी शान्त नहीं रहती, शुब्ध हो जाती है। यह प्राणशक्ति निरन्तर नष्ट होती रहती है। अतः यह भी विकाररूप ही है।
साधारण लोग प्राणवालोंको चेतन और निष्प्राण-वालोंको अचेतन कहते हैं, इस दृष्टिसे यहाँ प्राणशक्तिको ‘चेतना’ कहा गया है।
‘धृतिः’—धृति नाम धारणशक्तिका है। यह धृति भी बदलती रहती है। मनुष्य कभी धैर्यको धारण करता है और कभी (प्रतिकूल परिस्थिति आनेपर) धैर्यको छोड़ देता है। कभी धैर्य ज्यादा रहता है और कभी धैर्य कम रहता है। मनुष्य कभी अच्छी बातको धारण करता है और कभी विपरीत बातको धारण करता है। अतः धृति भी क्षेत्रका विकार है।
[अठारहवें अध्यायके तैंतीसवेंसे पैंतीसवें श्लोकतक धृतिके सात्त्विकी, राजसी और तामसी—इन तीन भेदोंका वर्णन किया गया है। परमात्माकी तरफ चलनेमें सात्त्विकी धृतिकी बड़ी आवश्यकता है।]
‘एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम्’—जैसे पहले श्लोकमें ‘इदं शरीरम्’ कहकर व्यक्ति शरीरसे अपनेको अलग देखनेके लिये कहा, ऐसे ही दृश्य—(क्षेत्र और उसमें होनेवाले विकार—) से द्रष्टाको अलग दिखानेके लिये यहाँ ‘एतत्’ पद आया है।
पाँचवें श्लोकमें भगवान्ने समष्टि संसारका वर्णन किया और यहाँ छठे श्लोकमें व्यक्ति शरीरके विकारोंका वर्णन