श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- साधक-संजीवनी *
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‘शान्तिः’ —शान्ति नाम सहनशीलता अर्थात् क्षमाका है। अपनेमें सामर्थ्य होते हुए भी अपराध करनेवालेको कभी किसी प्रकारसे किंचिन्मात्र भी दण्ड न मिले—ऐसा भाव रखना तथा उससे बदला लेने अथवा किसी दूसरेके द्वारा दण्ड दिलवानेका भाव न रखना ही ‘शान्ति’ है।
‘उपाय’ —(१) सहनशीलता अपने स्वरूपमें स्वतः—सिद्ध है; क्योंकि अपने स्वरूपमें कभी विकृति आती ही नहीं। अतः कभी ‘अमुकने दुःख दिया है, अपराध किया है’—ऐसी कोई वृत्ति आ भी जाय, तो उस समय यह विचार स्वतः आना चाहिये कि हमारा कोई बिगाड़ कर ही नहीं सकता, हमारेमें कोई विकृति आ ही नहीं सकती, वह हमारे स्वरूपतक पहुँच ही नहीं सकती। ऐसा विचार करनेसे क्षमाभाव स्वतः आ जाता है।
(२) जैसे भोजन करते समय अपने ही दाँतोंसे अपनी जीभ कट जाय, तो हम दाँतोंपर क्रोध नहीं करते, दाँतोंको दण्ड नहीं देते। हाँ, जीभ ठीक हो जाय—यह बात तो मनमें आती है, पर दाँतोंको तोड़ दें—यह भाव मनमें कभी आता ही नहीं। कारण कि दाँतोंको तोड़ने तो एक नयी पीड़ा और होगी अर्थात् पीड़ा दुगुनी होगी, जिससे हमारेको ही दुःख होगा, हमारा ही अनिष्ट होगा। ऐसे ही बिना कारण कोई हमारा अपराध करता है, हमें दुःख देता है, उसको अगर हम दण्ड देंगे, दुःख देंगे तो वास्तवमें हमारा ही अनिष्ट होगा; क्योंकि वह भी तो अपना ही स्वरूप है (गीता—छठे अध्यायका उन्तीसवाँ श्लोक)।
‘आर्जवम्’ —सरल-सीधेपनके भावको ‘आर्जव’ कहते हैं। साधकके शरीर, मन और वाणीमें सरल-सीधापन होना चाहिये। शरीरकी सजावटका भाव न होना, रहन-सहनमें सादगी तथा चाल-दालमें स्वाभाविक सीधापन होना, ऍठ-अकड़ न होना—यह ‘शरीरकी सरलता’ है। छल, कपट, ईर्ष्या, द्वेष आदिका न होना तथा निष्कपटता, सौम्यता, हितैषिता, दया आदिका होना—यह ‘मनकी सरलता’ है। व्यंग्य, निन्दा, चुगली आदि न करना, चुभनेवाले एवं अपमानजनक वचन न बोलना तथा सरल, प्रिय और हितकारक वचन बोलना—यह ‘वाणीकी सरलता’ है।
उपाय —अपनेको एक देशमें माननेसे अर्थात् स्थूल, सूक्ष्म और कारण-शरीरके साथ सम्बन्ध रखनेसे अपनेमें दूसरोंकी अपेक्षा विशेषता दीखती है। इससे व्यवहारमें भी चलते-फिरते, उठते-बैठते आदि क्रिया करते हुए कुछ टेंढापन, अकड़ आ जाती है। अतः शरीरके साथ अपना सम्बन्ध न माननेसे और अपने स्वरूपकी तरफ दृष्टि
रखनेसे यह अकड़ मिट जाती है और साधकमें स्वतः सरलता, नम्रता आ जाती है।
‘आचार्योपासनम्’ —विद्या और सदुपदेश देनेवाले गुरुका नाम भी आचार्य है और उनकी सेवासे भी लाभ होता है; परन्तु यहाँ ‘आचार्य’ पद परमात्मतत्त्वको प्राप्त जीवनमुक्त महापुरुषका ही वाचक है। आचार्यको दण्डवत् प्रणाम करना, उनका आदर-सत्कार करना और उनके शरीरको सुख पहुँचानेकी शास्त्रविहित चेष्टा करना भी उनकी उपासना है, पर वास्तवमें उनके सिद्धान्तों और भावोंके अनुसार अपना जीवन बनाना ही उनकी सच्ची उपासना है। कारण कि देहाभिमानीकी सेवा तो उसके देहकी सेवा करनेसे ही हो जाती है, पर गुणातीत महापुरुषके केवल देहकी सेवा करना उनकी पूर्ण सेवा नहीं है।
भगवान्ने दैवी सम्पत्तिके लक्षणोंमें ‘आचार्योपासनम्’ पद न देकर यहाँ ज्ञानके साधनोंमें उसे दिया है। इसमें एक विशेष रहस्यकी बात मालूम देती है कि ज्ञानमार्गमें गुरुकी जितनी आवश्यकता है, उतनी आवश्यकता भक्तिमार्गमें नहीं है। कारण कि भक्तिमार्गमें साधक सर्वथा भगवान्के आश्रित रहकर ही साधन करता है, इसलिये भगवान् स्वयं उसपर कृपा करके उसके योगक्षेमका वहन करते हैं (गीता—नवें अध्यायका बाईसवाँ श्लोक), उसकी कमियोंको, विघ्न-बाधाओंको दूर कर देते हैं (गीता—अठारहवें अध्यायका अठ्ठावनवाँ श्लोक) और उसको तत्त्वज्ञानकी प्राप्ति करा देते हैं (गीता—दसवें अध्यायका ग्यारहवाँ श्लोक)। परन्तु ज्ञानमार्गमें साधक अपनी साधनाके बलपर चलता है, इसलिये उसमें कुछ सूक्ष्म कर्मियाँ रह सकती हैं; जैसे—(१) शास्त्रों एवं संतोंके द्वारा ज्ञान प्राप्त करके जब साधक शरीरको (अपनी धारणासे) अपनेसे अलग मानता है, तब उसे शान्ति मिलती है। ऐसी दशामें वह यह मान लेता है कि मेरेको तत्त्वज्ञान प्राप्त हो गया! परन्तु जब मान-अपमानकी स्थिति सामने आती है अथवा अपनी इच्छाके अनुकूल या प्रतिकूल घटना घटती है, तब अन्तःकरणमें हर्ष-शोक पैदा हो जाते हैं, जिससे सिद्ध होता है कि अभी तत्त्वज्ञान हुआ नहीं।
(२) किसी आदमीके द्वारा अचानक अपना नाम सुनायी पड़नेपर अन्तःकरणमें ‘इस नामवाला शरीर मैं हूँ’—ऐसा भाव उत्पन्न हो जाता है, तो समझना चाहिये कि अभी मेरी शरीरमें ही स्थिति है।
(३) साधनाकी ऊँची स्थिति प्राप्त होनेपर जाग्रत्-अवस्थामें तो साधकको जड़-चेतनका विवेक अच्छी तरह