श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १३ ]
रहता है, पर निद्रावस्थामें उसकी विस्मृति हो जाती है। इसलिये नींदसे जगनेपर साधक उस विवेकको पकड़ता है, जब कि सिद्ध महापुरुषका विवेक स्वाभाविक रूपसे रहता है।
(४) साधकमें पूज्यजनोंसे भी मान-आदर पानेकी इच्छा हो जाती है; जैसे—जब वह संतों या गुरुजनोंकी सेवा करता है, सत्संग आदिमें मुख्यतासे भाग लेता है, तब उसके भीतर ऐसा भाव पैदा होता है कि वे संत या गुरुजन मेरेको दूसरोंकी अपेक्षा श्रेष्ठ मानें। यह उसकी सूक्ष्म कमी ही है।
इस प्रकार साधकमें कई कमियोंके रहनेकी सम्भावना रहती है, जिनकी तरफ खयाल न रहनेसे वह अपने अधूरे ज्ञानको भी पूर्ण मान सकता है। इसलिये भगवान् ‘आचार्योपासनम्’ पदसे यह कह रहे हैं कि ज्ञानमार्गके साधकको आचार्यके पास रहकर उनकी अधीनतामें ही साधन करना चाहिये। चौथे अध्यायके चौतीसवें श्लोकमें भी भगवान्ने अर्जुनसे कहा है कि ‘तू तत्त्वज्ञ जीवन्मुक्त महापुरुषोंके पास जा, उनको दण्डवत्-प्रणाम कर, उनकी सेवा कर और अपनी जिज्ञासा-पूर्तिके लिये नम्रतापूर्वक प्रश्न कर तो वे तत्त्वदर्शी ज्ञानी महात्मा तेरेको ज्ञानका उपदेश देंगे।’ इस प्रकार साधन करनेपर वे महापुरुष उसकी उन सूक्ष्म कमियोंको, जिनको वह खुद भी नहीं जानता, दूर करके उसको सुगमतासे परमात्मतत्त्वका अनुभव करा सकते हैं।
साधकको शुरुमें ही सोच-समझकर आचार्य, संत-महापुरुषके पास जाना चाहिये। आचार्य (गुरु) कैसा हो? इस सम्बन्धमें ये बातें ध्यानमें रखनी चाहिये—
(१) अपनी दृष्टिमें जो वास्तविक बौधवान्, तत्त्वज्ञ दीखते हैं।
(२) जो कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग आदि साधनोंको ठीक-ठीक जाननेवाले हों।
(३) जिनके संगसे, वचनोंसे हमारे हृदयमें रहनेवाली शंकाएँ बिना पूछे ही स्वतः दूर हो जाती हों।
(४) जिनके पासमें रहनेसे प्रसन्नता, शान्तिका अनुभव होता हो।
(५) जो हमारे साथ केवल हमारे हितके लिये ही सम्बन्ध रखते हुए दीखते हों।
(६) जो हमारेसे किसी भी वस्तुकी किंचिन्मात्र भी आशा न रखते हों।
(७) जिनकी सम्पूर्ण चेष्टाएँ केवल साधकोंके हितके लिये ही होती हों।
(८) जिनके पासमें रहनेसे लक्ष्यकी तरफ हमारी लगन स्वतः बढ़ती हो।
(९) जिनके संग, दर्शन, भाषण, स्मरण आदिसे हमारे दुर्गुण-दुराचार दूर होकर स्वतः सदगुण-सदाचाररूप दैवी सम्पत्ति आती हो।
(१०) जिनके सिवाय और किसीमें वैसी अलौकिकता, विलक्षणता न दीखती हो।
ऐसे आचार्य, संतके पास रहना चाहिये और केवल अपने उद्धारके लिये ही उनसे सम्बन्ध रखना चाहिये। वे क्या करते हैं, क्या नहीं करते? वे ऐसी क्रिया क्यों करते हैं? वे कब किसके साथ कैसा बताव करते हैं? आदिमें अपनी बुद्धि नहीं लगानी चाहिये अर्थात् उनकी क्रियाओंमें तर्क नहीं लगाना चाहिये। साधकको तो उनके अधीन होकर रहना चाहिये, उनकी आज्ञा, रखके अनुसार मात्र क्रियाएँ करनी चाहिये और श्रद्धाभावपूर्वक उनकी सेवा करनी चाहिये। अगर वे महापुरुष न चाहते हों तो उनसे गुरु-शिष्यका व्यावहारिक सम्बन्ध भी जोड़नेकी आवश्यकता नहीं है। हाँ, उनको हृदयसे गुरु मानकर उनपर श्रद्धा रखनेमें कोई आपत्ति नहीं है।
अगर ऐसे महापुरुष न मिलें तो साधकको चाहिये कि वह केवल परमात्माके परायण होकर उनके ध्यान, चिन्तन आदिमें लग जाय और विश्वास रखे कि परमात्मा अवश्य गुरुकी प्राप्ति करा देंगे। वास्तवमें देखा जाय तो पूर्णतया परमात्मापर निर्भर हो जानेके बाद गुरुका काम परमात्मा ही पूर्ण कर देते हैं; क्योंकि गुरुके द्वारा भी वस्तुतः परमात्मा ही साधकका मार्ग-दर्शन करते हैं।
उपाय —जिस साधकका परमात्मप्राप्तिका ही उद्देश्य है, उसमें यह भाव रहना चाहिये कि आजतक जिस-किसीको जो कुछ भी मिला है, वह गुरुकी, सन्तोंकी सेवासे, उनकी प्रसन्नतासे, उनके अनुकूल बननेसे ही मिला है*; अतः मेरेको भी सच्चे हृदयसे सन्तोंकी सेवा करनी है।
विशेष बात
शिष्यका कर्तव्य है—गुरुकी सेवा करना। अगर शिष्य अपने कर्तव्यका तत्परतासे पालन करे तो उसका संसारसे
- इस विषयमें किसीने कहा है—
न कुछ हम हँपके सीखें हैं, न कुछ हम रोके सीखें हैं। जो कुछ थोड़ा-सा सीखें हैं, किसीके होके सीखें हैं।