श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १३ ]
माला पहनायेंगे, हमारी पूजा करेंगे, हमें ऊँचे आसनपर बैठायेंगे आदिको लेकर अपनेमें वैसा गुण न होनेपर भी गुण दिखाना, अपनेमें गुण कम होनेपर भी उसे बाहरसे ज्यादा प्रकट करना—यह सब दम्भ है।
अपनेमें सदाचार है, शुद्धि है, पवित्रता है, पर अगर लोगोंके सामने हम पवित्रता रखेंगे तो वे हमारी हँसी उड़ायेंगे, हमारी निन्दा करेंगे—ऐसा सोचकर अपनी पवित्रता छोड़ देना और सामनेवालेकी तरह बन जाना भी दम्भ है। जैसे, आजकल विवाह आदिके अवसरोंपर, क्लबों-होटलोंके स्वागत-समारोहोंमें अथवा वायुयान आदिपर यात्रा करते समय पवित्र आचरणवाले सज्जन भी मान-सत्कार आदिके लिये अपवित्र खाद्य पदार्थ लेते देखे जाते हैं। यह भी दम्भ ही है। इसी तरह दुराचारी पुरुष भी अच्छे लोगोंके समुदायमें आनेपर मान, सत्कार, कीर्ति, प्रतिष्ठा आदिकी प्राप्तिकी इच्छासे अपनेको बाहरसे धर्मात्मा, भक्त, सेवक, दानी आदि प्रकट करने लगते हैं, तो यह भी दम्भ ही है।
कोई साधक एकान्तमें, बंद कमरेमें बैठकर जप, ध्यान, चिन्तन कर रहा है और साथमें आलस्य, नींद भी ले रहा है। परन्तु जब बाहरसे उसपर श्रद्धा, पूज्यभाव रखनेवाले आदमीकी आवाज आती है, तब उस आवाजको सुनते ही वह सावधान होकर जप-ध्यान करने लग जाता है और उसके नींद-आलस्य भाग जाते हैं। यह भी एक सूक्ष्म दम्भ है। इसमें भी देखा जाय तो आवाज सुनकर सावधान हो जाना कोई दोष नहीं है, पर उसमें जो दिखावटीपनका भाव आ जाता है कि यह आदमी मेरेमें अश्रद्धा न कर ले, यह भाव आना दोष है। इस भावके स्थानपर ऐसा भाव आना चाहिये कि भगवान्ने बड़ा अच्छा किया कि मेरेको सावधान करके जप-ध्यानमें लगा दिया। इन सब प्रकारके दम्भोंका अभाव होना 'अदभिभत्व' है।
'उपाय' —साधकको अपना उद्देश्य एकमात्र परमात्म-प्राप्तिका ही रखना चाहिये, लोगोंको दिखानेका किंचिन्मात्र भी नहीं। अगर उसमें दिखावटीपन आ जायगा तो उसके साधनमें शिथिलता आ जायगी, जिससे उद्देश्यकी सिद्धिमें बाधा लग जायगी। अतः उसको कोई अच्छा, बुरा, ऊँच, नीच जो कुछ भी समझे, इसकी तरफ खयाल न करके वह अपने साधनमें लगा रहे। ऐसी सावधानी रखनेसे दम्भ मिट जाता है।
'अहिंसा' —मन, वाणी और शरीरसे कभी किसीको किंचिन्मात्र भी दुःख न देनेका नाम 'अहिंसा' है। कर्ता-भेदसे हिंसा तीन प्रकारकी होती है—कृत (स्वयं हिंसा
करना), कारित (किसीसे हिंसा करवाना) और अनुमोदित (हिंसाका अनुमोदन-समर्थन करना)।
उपर्युक्त तीन प्रकारकी हिंसा तीन भावोंसे होती है—क्रोधसे, लोभसे और मोहसे। तात्पर्य है कि क्रोधसे भी कृत, कारित और अनुमोदित हिंसा होती है; लोभसे भी कृत, कारित और अनुमोदित हिंसा होती है तथा मोहसे भी कृत, कारित और अनुमोदित हिंसा होती है। इस तरह हिंसा नौ प्रकारकी हो जाती है।
उपर्युक्त नौ प्रकारकी हिंसामें तीन मात्राएँ होती हैं—मृदुमात्रा, मध्यमात्रा और अधिमात्रा। किसीको थोड़ा दुःख देना मृदुमात्रामें हिंसा है, मृदुमात्रासे अधिक दुःख देना मध्यमात्रामें हिंसा है और बहुत अधिक घायल कर देना अथवा खत्म कर देना अधिमात्रामें हिंसा है। इस तरह मृदु, मध्य और अधिमात्राके भेदसे हिंसा सत्ताईस प्रकारकी हो जाती है।
उपर्युक्त सत्ताईस प्रकारकी हिंसा तीन करणोंसे होती है—शरीरसे, वाणीसे और मनसे। इस तरह हिंसा इक्यासी प्रकारकी हो जाती है। इनमेंसे किसी भी प्रकारकी हिंसा न करनेका नाम 'अहिंसा' है।
अहिंसा भी चार प्रकारकी होती है—देशगत, कालगत, समयगत और व्यक्तिगत। अमुक तीर्थमें, अमुक मन्दिरमें, अमुक स्थानमें किसीको दुःख नहीं देना है—यह 'देशगत अहिंसा' है। अमावस्या, पूर्णिमा, व्यक्तिपात आदि पर्वोंके दिन किसीको दुःख नहीं देना है—यह 'कालगत अहिंसा' है। सन्तके मिलनेपर, पुत्रके जन्म-दिनपर, पिताके निधन-दिवसपर किसीको दुःख नहीं देना है—यह 'समयगत अहिंसा' है। गाय, हरिण आदिको तथा गुरुजन, माता-पिता, बालक आदिको दुःख नहीं देना है—यह 'व्यक्तिगत अहिंसा' है।
किसी भी देश, काल आदिमें क्रोध-लोभ-मोहपूर्वक किसीको भी शरीर, वाणी और मनसे किसी भी प्रकारसे दुःख न देनेसे यह सार्वभौम अहिंसा 'महाव्रत' कहलाती है।
उपाय —जैसे साधारण प्राणी अपने शरीरका सुख चाहता है, ऐसे ही साधकको सबके सुखमें अपना सुख, सबके हितमें अपना हित और सबकी सेवामें अपनी सेवा माननी चाहिये अर्थात् सबके सुख, हित और सेवासे अपना सुख, हित और सेवा अलग नहीं माननी चाहिये। 'सब अपने ही स्वरूप हैं'—ऐसा विवेक जाग्रत् रहनेसे उसके द्वारा किसीको दुःख देनेकी क्रिया होगी ही नहीं और उसमें अहिंसाभाव स्वतः आ जायगा।